By the end of this chapter you'll be able to…

  • 1यह पहचानना कि 'ममता' निबंध नहीं, कहानी है, और यह भेद क्यों महत्वपूर्ण है
  • 2जयशंकर प्रसाद का जीवन-परिचय और नाटक, उपन्यास, कहानी, काव्य — चारों विधाओं में उनकी प्रमुख रचनाएँ बताना
  • 3कहानी की दो ऐतिहासिक पृष्ठभूमियाँ — रोहतासगढ़-विजय और चौसा-युद्ध — पहचानना
  • 4कहानी के तीन कालखंडों का कथासार क्रम से बताना
  • 5ममता के केंद्रीय द्वंद्व — घृणा बनाम कर्तव्य — को उदाहरण सहित समझाना
  • 6कहानी के अंत में हुमायूँ की पहचान खुलने की घटना और उसका महत्व बताना
  • 7काशी के धर्मचक्र विहार-वर्णन में प्रसाद की परिवेश-चित्रण शैली और स्तरित ऐतिहासिकता को पहचानना
  • 8कहानी की अंतिम पंक्ति ('पर उसमें ममता का कहीं नाम नहीं') का भावार्थ स्पष्ट करना
  • 9दिए गए किसी गद्यांश का प्रसंग, वक्ता और आशय बताना
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Why this chapter matters
'ममता' गद्य खण्ड की एकमात्र ऐसी रचना है जो निबंध नहीं, कहानी है — इसलिए विधा-पहचान वाले प्रश्नों में यह बार-बार आती है। यह छायावाद के चार स्तंभों में से एक, जयशंकर प्रसाद, के गद्य-लेखन का प्रतिनिधि उदाहरण भी है, जिससे जीवन-परिचय के प्रश्न में नाटक, कहानी और काव्य तीनों विधाओं का उल्लेख किया जा सकता है।

ममता — जयशंकर प्रसाद

"मैं ब्राह्मण-कुमारी हूँ; सब अपना धर्म छोड़ दें, तो मैं भी क्यों छोड़ दूँ?" — ममता, जयशंकर प्रसाद की कहानी 'ममता' में

1. इस अध्याय में क्या है

'ममता' यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी के गद्य खण्ड (यूनिट 1 ii) के सात निर्धारित पाठों में से एक है। यूनिट 1 (ii) का कुल भार 11 अंक है, सातों पाठों में साझा — 6 अंक गद्यांश पर (किसी भी पाठ से) और 5 अंक जीवन-परिचय पर (किसी भी एक लेखक का)। पूरी शर्त और शेष छह पाठों की सूची यूनिट के पहले चरण — 'क्या लिखूँ' अध्याय — में दी गई है; यहाँ केवल इसकी पुनरावृत्ति नहीं की जा रही।

विधा पर एक ज़रूरी स्पष्टीकरण। 'ममता' निबंध नहीं, कहानी है — प्रसाद के कहानी-संग्रह में संकलित एक ऐतिहासिक कथा। बोर्ड इसे 'गद्य खण्ड' के अंतर्गत रखता है क्योंकि यह खण्ड निबंध और कहानी दोनों विधाओं की गद्य-रचनाओं को एक साथ समेटता है। परीक्षा में विधा पूछी जा सकती है, इसलिए यह अंतर याद रखना ज़रूरी है।

2. लेखक-परिचय — जयशंकर प्रसाद

  • जन्म-मृत्यु। जयशंकर प्रसाद (1889-1937), काशी के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्म।
  • कार्यक्षेत्र। हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक (प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी) — पर प्रसाद की पहचान कविता तक सीमित नहीं। वे श्रेष्ठ नाटककार और कहानीकार भी हैं।
  • प्रमुख कृतियाँ। नाटक — 'स्कंदगुप्त', 'अजातशत्रु', 'चन्द्रगुप्त', 'ध्रुवस्वामिनी'। उपन्यास — 'कंकाल', 'तितली', 'इरावती'। कहानी-संग्रह — 'छाया', 'प्रतिध्वनि', 'आकाशदीप', 'आँधी', 'इन्द्रजाल' — इन्हीं में 'ममता' संकलित है। काव्य — 'कामायनी' (महाकाव्य), 'आँसू', 'लहर'।
  • शुक्ल जी का मूल्यांकन। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अपनी हिन्दी साहित्य का इतिहास में लिखते हैं कि तृतीय उत्थान (शुक्ल युग) के दो सबसे ऊँचे नाटककारों में जयशंकर प्रसाद और हरिकृष्ण प्रेमी थे। बोर्ड के मॉडल प्रश्नपत्र में भी 1918-1936 के इसी काल का एक नाम 'प्रसाद युग' पूछा गया है — प्रसाद की देन नाटक, कहानी और छायावादी काव्य तीनों में है।
  • कहानी-लेखन की विशेषता। प्रसाद की कहानियाँ प्रायः ऐतिहासिक अथवा भावुकता-प्रधान होती हैं, और उनमें एक स्त्री-चरित्र प्रायः केंद्र में होता है जो कर्तव्य और भावना के द्वंद्व से गुज़रता है — 'ममता' इसका प्रतिनिधि उदाहरण है।

3. कहानी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

कहानी की घटनाएँ दो ऐतिहासिक बिंदुओं के बीच फैली हैं, और दोनों को पहचानना बोर्ड के प्रसंग-आधारित प्रश्नों के लिए ज़रूरी है।

घटनाऐतिहासिक संदर्भ
रोहतासगढ़ पर शेरशाह का अधिकारशेरशाह सूरी द्वारा राजपूत-शासित रोहतासगढ़ दुर्ग पर विजय (सोलहवीं शताब्दी)
चौसा का मुगल-पठान युद्ध1539 ई0 में हुमायूँ और शेरशाह के बीच चौसा का युद्ध, जिसमें हुमायूँ पराजित हुए

कहानी दिखाती है कि एक बड़ी ऐतिहासिक घटना (शेरशाह की विजय) एक छोटे, नामहीन व्यक्ति (मंत्री चूड़ामणि की पुत्री) के जीवन को किस तरह पूरी तरह बदल देती है — यही ऐतिहासिक कहानी-शैली की पहचान है।

शेरशाह और हुमायूँ का संघर्ष, संक्षेप में। शेरशाह सूरी ने चौसा (1539) और फिर कन्नौज (1540) में हुमायूँ को हराकर उन्हें भारत से पंद्रह वर्ष के लिए निर्वासित कर दिया था, और स्वयं सूर साम्राज्य की स्थापना की। कहानी में जो सैनिक ममता से आश्रय माँगता है, वह इसी चौसा-पराजय के तुरंत बाद, भागते हुए हुमायूँ के रूप में सामने आता है — यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रसाद की कल्पना और वास्तविक इतिहास को जोड़ने वाली कड़ी है।

4. कथासार — पहला भाग: रोहतासगढ़ में

ममता, रोहतासगढ़-दुर्गपति के ब्राह्मण मंत्री चूड़ामणि की एकमात्र पुत्री है। वह विधवा है, और लेखक इसी बिंदु पर समाज की क्रूरता की ओर संकेत करते हैं —

"वह विधवा थी — हिन्दू-विधवा संसार में सबसे तुच्छ निराश्रय प्राणी है।"

चूड़ामणि आने वाले संकट को भाँपकर ममता के लिए चाँदी के थालों में स्वर्ण भरकर लाते हैं — "उस दिन के लिए, बेटी! जब मंत्रित्व न रहेगा।" ममता स्वर्ण देखकर चौंक उठती है और पूछती है यह म्लेच्छ (शेरशाह के पक्ष) का उत्कोच (घूस) तो नहीं।

पिता की व्याकुलता में छिपा डर सच निकलता है — अगले ही दिन डोलियों की जाँच के विवाद में चूड़ामणि मारे जाते हैं, दुर्ग शेरशाह के हाथ पड़ता है, और अफरा-तफरी में ममता निकल भागती है।

5. कथासार — दूसरा भाग: काशी में, मुगल राजकुमार के साथ

वर्षों बाद ममता काशी के धर्मचक्र विहार के खंडहर में एक झोपड़ी में साधनारत जीवन बिताती है। एक रात एक थका, भयभीत सैनिक उसकी कुटी में आश्रय माँगता है — वह चौसा-युद्ध में शेरशाह से हारकर भागा हुआ मुगल है।

यहीं कहानी का मूल द्वंद्व खुलता है। ममता के मन में दो विचार टकराते हैं —

"ये सब विधर्मी दया के पात्र नहीं — मेरे पिता का वध करने वाले आततायी!"

और साथ ही —

"मैं ब्राह्मणी हूँ, मुझे तो अपने धर्म — अतिथिदेव की उपासना — का पालन करना चाहिए।"

कर्तव्य घृणा पर विजय पाता है। ममता मुगल को जल देती है, और अंततः आश्रय भी — "मैं तुम्हें आश्रय देती हूँ। मैं ब्राह्मण-कुमारी हूँ; सब अपना धर्म छोड़ दें, तो मैं भी क्यों छोड़ दूँ?" प्रभात में सैकड़ों अश्वारोही खोज में आते हैं। जाते समय वह मुगल राजकुमार अपने साथी से कहता है — "उस स्त्री को मैं कुछ दे न सका। उसका घर बनवा देना... यह स्थान भूलना मत।"

6. कथासार — तीसरा भाग: पहचान का अंतिम क्षण

कहानी का अंत सैंतालीस वर्ष बाद घटित होता है। ममता अब सत्तर वर्ष की वृद्धा है, अपनी झोपड़ी में मृत्युशय्या पर। एक अश्वारोही उसी स्थान को खोजते हुए आता है, यह पूछते हुए कि किसी दिन "शाहंशाह हुमायूँ" इसी छप्पर के नीचे ठहरे थे। ममता अपने अंतिम शब्दों में सत्य प्रकट करती है —

"मैंने सुना था कि वह मेरा घर बनवाने की आज्ञा दे चुका था! भगवान् ने सुन लिया, मैं आज इसे छोड़े जाती हूँ।"

वह उसी क्षण प्राण त्यागती है। कहानी की सबसे मार्मिक पंक्ति उसका अंत है — हुमायूँ के पुत्र अकबर उस स्थान पर एक भव्य अष्टकोण मंदिर बनवाते हैं, जिस पर शिलालेख है कि "सातों देश के नरेश हुमायूँ ने एक दिन यहाँ विश्राम किया था।" पर कहानी इसी वाक्य पर समाप्त होती है —

"पर उसमें ममता का कहीं नाम नहीं।"

'ममता' की तीन कड़ियाँ रोहतासगढ़ पिता चूड़ामणि की मृत्यु दुर्ग शेरशाह के हाथ ममता का पलायन काशी भागा हुआ मुगल आश्रय माँगता घृणा बनाम कर्तव्य कर्तव्य की विजय — आश्रय मिलता है 47 वर्ष बाद वृद्धा ममता की मृत्यु अकबर मंदिर बनवाते हैं पर नाम हुमायूँ का, ममता का नहीं केंद्रीय द्वंद्व "ये सब विधर्मी दया के पात्र नहीं — आततायी!" बनाम "मैं ब्राह्मणी हूँ, अतिथिदेव की उपासना ही मेरा धर्म है" — कर्तव्य जीतता है

7. काशी के खंडहर का वर्णन — प्रसाद की परिवेश-चित्रण शैली

जिस स्थान पर ममता मुगल सैनिक से भेंट करती है, उसका वर्णन प्रसाद की गद्य-शैली का सबसे समृद्ध नमूना है। यह स्थान है काशी का धर्मचक्र विहार, जहाँ कभी गौतम बुद्ध ने अपने पहले पाँच शिष्यों (पंचवर्गीय भिक्षु) को उपदेश दिया था — प्रसाद इस स्थल को इन शब्दों में चित्रित करते हैं —

"काशी के उत्तर धर्मचक्र विहार, मौर्य और गुप्त सम्राटों की कीर्ति का खंडहर था। भग्न चूड़ा, तृण-गुल्मों से ढके हुए प्राचीर, ईंटों की ढेर में बिखरी हुई भारतीय शिल्प की विभूति, ग्रीष्म की चन्द्रिका में अपने को शीतल कर रही थी।"

एक ही वाक्य में तीन कालखंड परत-दर-परत खुलते हैं — बौद्ध युग (जहाँ बुद्ध ने उपदेश दिया), मौर्य-गुप्त साम्राज्यों का वैभव (जिनके खंडहर अब घास से ढके हैं), और उसी खंडहर में अब ममता का वर्तमान जीवन।

इसी भग्नावशेष की झोपड़ी में, दीपक की मंद रोशनी में, ममता जब मुगल के आने से पहले पाठ कर रही होती है, तो वह पाठ भी सोच-समझकर चुना गया है — भगवद्गीता का श्लोक "अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते..." (जो लोग अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं)।

यह विवरण दिखाता है कि ममता केवल एक साधारण स्त्री नहीं, संस्कृत-ज्ञाता और धर्मपरायण स्त्री है — जिससे आगे उसके अतिथि-धर्म के निर्णय की नींव पहले ही रखी जा चुकी होती है।

8. पात्र-परिचय

पात्रपरिचय
ममतारोहतासगढ़ के ब्राह्मण मंत्री चूड़ामणि की विधवा पुत्री; कहानी की नायिका
चूड़ामणिरोहतासगढ़-दुर्गपति के मंत्री, ममता के पिता; दुर्ग-पतन के समय मारे जाते हैं
भागा हुआ मुगलचौसा-युद्ध में हारकर भागा सैनिक, वास्तव में स्वयं हुमायूँ — कहानी के अंत में यह पहचान खुलती है
अकबर (अप्रत्यक्ष)हुमायूँ का पुत्र, जो अंत में स्मारक-मंदिर बनवाता है

9. भाषा और शैली

प्रसाद की भाषा इस कहानी में तत्सम-प्रधान, संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है — यह छायावादी गद्य की पहचान है। कुछ विशेषताएँ —

विशेषताउदाहरण
संस्कृत तत्सम शब्दावलीप्रकोष्ठ, अनिष्ट, तीक्ष्ण, निराश्रय, अभ्युदयशील
छोटे, प्रभावशाली संवाद"मूर्ख है" — कहकर चूड़ामणि चले गये।
भावात्मक वाक्य-रचना"मन में वेदना, मस्तक में आँधी, आँखों में पानी की बरसात लिये"
ऐतिहासिक यथार्थ के साथ काव्यात्मक वर्णनधर्मचक्र विहार के खंडहर का वर्णन (देखें भाग 7)

यह शैली प्रसाद के नाटकों और 'कामायनी' जैसे काव्य में भी मिलती है — भावुकता, संक्षिप्तता और तत्सम शब्दावली का यह संयोजन उनकी पहचान है।

10. कहानी का केंद्रीय भाव

कहानी का शीर्षक 'ममता' दोहरे अर्थ में काम करता है — यह नायिका का नाम भी है और उसके भीतर के वात्सल्य-भाव, करुणा और आतिथ्य-धर्म का भी प्रतीक है। कहानी दिखाती है कि —

  • धार्मिक कर्तव्य व्यक्तिगत घृणा से बड़ा हो सकता है। ममता अपने पिता के हत्यारों की जाति के ही एक व्यक्ति को आश्रय देती है, केवल इसलिए कि अतिथि-धर्म उसका अपना मूल्य है, बदले की भावना नहीं।
  • इतिहास बड़े नामों को याद रखता है, छोटे बलिदानों को नहीं। अंतिम पंक्ति — "पर उसमें ममता का कहीं नाम नहीं" — यही कहानी का सबसे तीखा सामाजिक भाष्य है। मंदिर हुमायूँ के नाम पर बनता है, उस स्त्री के नाम पर नहीं जिसने उसे शरण दी और जीवन भर वह गुप्त रहस्य छुपाए रखा।
  • प्रतीक्षा और मौन त्याग। ममता सैंतालीस वर्ष तक इस घटना का उल्लेख किसी से नहीं करती, और अंतिम श्वास पर ही सत्य कहती है — यह उसके चरित्र की गहराई दिखाता है।

11. गद्यांश-आधारित अभ्यास

गद्यांश। "मैं ब्राह्मणी हूँ, मुझे तो अपने धर्म — अतिथिदेव की उपासना — का पालन करना चाहिए। परन्तु यहाँ... नहीं-नहीं ये सब विधर्मी दया के पात्र नहीं। परन्तु यह दया तो नहीं... कर्तव्य करना है। तब?"

शब्दार्थ। अतिथिदेव — अतिथि को देवता मानने की भारतीय परंपरा। विधर्मी — भिन्न धर्म का व्यक्ति। उपासना — पूजा, पालन।

प्रश्न 1 (2 अंक)। यह पंक्ति किस पात्र के मन की उधेड़बुन दिखाती है, और उसका द्वंद्व क्या है? उत्तर संकेत — ममता के मन की उधेड़बुन — एक ओर पिता के हत्यारों की जाति के प्रति घृणा, दूसरी ओर अतिथि-धर्म का कर्तव्य।

प्रश्न 2 (2 अंक)। ममता अंततः किस निर्णय पर पहुँचती है, और उसका आधार क्या है? उत्तर संकेत — वह मुगल को आश्रय देने का निर्णय लेती है; आधार यह है कि यह दया नहीं, कर्तव्य है — वह ब्राह्मण-कुमारी होने के नाते अपना धर्म नहीं छोड़ेगी, चाहे सामने वाला व्यक्ति कोई भी हो।

प्रश्न 3 (2 अंक)। कहानी के अंत से इस निर्णय का क्या संबंध जुड़ता है? उत्तर संकेत — वह भागा हुआ मुगल वास्तव में हुमायूँ था; ममता का यह कर्तव्य-पालन ही आगे चलकर मुगल सम्राट अकबर द्वारा उस स्थान पर मंदिर बनवाए जाने की घटना से जुड़ जाता है — यद्यपि उस मंदिर पर ममता का नाम कहीं नहीं है।

सारांश

'ममता' जयशंकर प्रसाद की एक ऐतिहासिक कहानी है, जो यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी के गद्य खण्ड (यूनिट 1 ii, 11 अंक, सात पाठों में साझा) में निर्धारित है। यह निबंध नहीं, कहानी है — यह भेद परीक्षा में पूछा जा सकता है।

कहानी तीन कालखंडों में फैली है। पहले भाग में रोहतासगढ़ के पतन में ममता के पिता चूड़ामणि मारे जाते हैं और वह पलायन करती है। दूसरे भाग में काशी के एक खंडहर में वह चौसा-युद्ध से भागे एक मुगल सैनिक को आश्रय देती है — यहाँ घृणा और कर्तव्य का द्वंद्व होता है, और अतिथि-धर्म जीतता है।

तीसरे भाग में, सैंतालीस वर्ष बाद, पता चलता है कि वह सैनिक स्वयं सम्राट हुमायूँ था, और उसके पुत्र अकबर उस स्थान पर एक भव्य मंदिर बनवाते हैं — पर उस मंदिर पर ममता का नाम कहीं नहीं है।

कहानी का केंद्रीय भाव यही है — धार्मिक कर्तव्य व्यक्तिगत घृणा से बड़ा हो सकता है, और इतिहास बड़े नामों को याद रखता है, उन्हें सहारा देने वाले छोटे बलिदानों को नहीं।

परिशिष्ट — क्या इस अध्याय का नहीं है

  • गद्यांश के प्रश्न किसी भी पाठ से आ सकते हैं। यह अध्याय केवल एक पाठ (ममता) कवर करता है। मित्रता, भारतीय संस्कृति, अजन्ता, क्या लिखूँ, ईर्ष्या तू न गयी मेरे मन से, पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी इसमें नहीं हैं।
  • प्रसाद की अन्य कहानियाँ और नाटक। उनके संग्रहों में 'आकाशदीप', 'पुरस्कार' जैसी अन्य प्रसिद्ध कहानियाँ भी हैं, और 'स्कंदगुप्त', 'अजातशत्रु' जैसे नाटक भी — पर पाठ्यक्रम में इस यूनिट के लिए केवल 'ममता' निर्धारित है।
  • कामायनी का विश्लेषण। प्रसाद का महाकाव्य 'कामायनी' छायावाद और उच्चतर कक्षाओं में पढ़ाया जाता है; कक्षा-10 के इस पाठ्यक्रम का विषय नहीं है।

Key formulas & results

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विधा
'ममता' = कहानी, निबंध नहीं
गद्य खण्ड निबंध और कहानी दोनों विधाओं को समेटता है
प्रसाद की चार विधाएँ
नाटक (स्कंदगुप्त, अजातशत्रु) · उपन्यास (कंकाल, तितली) · कहानी (छाया, आकाशदीप — यहीं ममता) · काव्य (कामायनी, आँसू)
जीवन-परिचय के प्रश्न में चारों का उल्लेख अंक बढ़ाता है
दो ऐतिहासिक बिंदु
रोहतासगढ़-विजय (शेरशाह) → चौसा-युद्ध 1539 ई0 (शेरशाह बनाम हुमायूँ)
कहानी दोनों घटनाओं को जोड़ती है
तीन कालखंड
रोहतासगढ़ (पिता की मृत्यु) → काशी (मुगल को आश्रय) → 47 वर्ष बाद (पहचान और मृत्यु)
कथासार इसी क्रम में लिखिए
केंद्रीय द्वंद्व
घृणा ('आततायी') बनाम कर्तव्य ('अतिथिदेव की उपासना') — कर्तव्य जीतता है
यही कहानी का मूल तनाव-बिंदु है
छिपी पहचान
भागा हुआ 'मुगल सैनिक' = स्वयं सम्राट हुमायूँ
यह कहानी के अंत में ही खुलती है — मंदिर पर शिलालेख से
कहानी का अंतिम वाक्य
"पर उसमें ममता का कहीं नाम नहीं।"
इतिहास बड़े नामों को याद रखता है, सहारा देने वालों को नहीं — यही सामाजिक भाष्य है
⚠️

Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

WATCH OUT
'ममता' को निबंध समझ लेना
यह कहानी है, प्रसाद के कहानी-संग्रह में संकलित। 'गद्य खण्ड' शीर्षक के भीतर निबंध और कहानी दोनों आते हैं — यह भेद विधा-पहचान प्रश्नों में सीधे पूछा जा सकता है।
WATCH OUT
यह सोचना कि ममता पहले ही जान जाती है कि सैनिक हुमायूँ है
कहानी में ममता को कभी पता नहीं चलता — पाठक को भी अंत में ही, मंदिर के शिलालेख के प्रसंग से पता चलता है। ममता जीवन-भर इस रहस्य को छुपाए रखती है, बिना यह जाने कि वह व्यक्ति कौन था।
WATCH OUT
ममता के निर्णय को केवल 'दया' कहना
ममता स्वयं स्पष्ट करती है कि यह दया नहीं, कर्तव्य है — 'यह दया तो नहीं... कर्तव्य करना है।' वह अतिथि-धर्म का पालन कर रही है, दयालुता दिखाने के लिए नहीं।
WATCH OUT
मंदिर के निर्माण को कहानी का सुखद अंत मानना
मंदिर हुमायूँ की स्मृति में बना है, ममता के बलिदान की स्मृति में नहीं — कहानी की अंतिम पंक्ति ('पर उसमें ममता का कहीं नाम नहीं') इसे विडंबना के रूप में प्रस्तुत करती है, उत्सव के रूप में नहीं।
WATCH OUT
प्रसाद को केवल कवि (कामायनी के रचयिता) के रूप में जानना
जीवन-परिचय में नाटक (स्कंदगुप्त, अजातशत्रु), उपन्यास और कहानी तीनों का उल्लेख करना आवश्यक है — बोर्ड जीवन-परिचय में 'प्रमुख रचना' पूछता है, केवल काव्य नहीं।

Practice problems

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Readiness check

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8 questions~6 min

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • 'ममता' — जयशंकर प्रसाद की ऐतिहासिक कहानी, निबंध नहीं
  • गद्य खण्ड (यूनिट 1 ii) कुल 11 अंक, सात पाठों में साझा
  • प्रसाद (1889-1937) — छायावाद के चार स्तंभों में से एक; नाटककार और कहानीकार भी
  • नाटक — स्कंदगुप्त, अजातशत्रु, चन्द्रगुप्त; उपन्यास — कंकाल, तितली; काव्य — कामायनी, आँसू
  • कहानी-संग्रह — छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, इन्द्रजाल — इन्हीं में ममता संकलित
  • शुक्ल जी — तृतीय उत्थान के दो ऊँचे नाटककार प्रसाद और हरिकृष्ण प्रेमी
  • ममता — रोहतासगढ़ के ब्राह्मण मंत्री चूड़ामणि की विधवा पुत्री
  • पहला कालखंड — शेरशाह की रोहतासगढ़-विजय, चूड़ामणि की मृत्यु, ममता का पलायन
  • दूसरा कालखंड — काशी में चौसा-युद्ध (1539 ई0) से भागे मुगल को आश्रय
  • केंद्रीय द्वंद्व — घृणा ('आततायी') बनाम कर्तव्य ('अतिथिदेव की उपासना')
  • ममता का निर्णय — 'मैं ब्राह्मण-कुमारी हूँ; सब अपना धर्म छोड़ दें, तो मैं भी क्यों छोड़ दूँ?'
  • तीसरा कालखंड — 47 वर्ष बाद पहचान खुलती है कि वह सैनिक स्वयं सम्राट हुमायूँ था
  • अकबर उस स्थान पर अष्टकोण मंदिर बनवाता है, शिलालेख हुमायूँ के नाम पर
  • कहानी का अंतिम वाक्य — 'पर उसमें ममता का कहीं नाम नहीं' — इतिहास की विडंबना

Uttar Pradesh (UPMSP) marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: यूनिट 1 (ii) गद्य खण्ड — कुल 11 अंक, सात पाठों में साझा। किसी एक पाठ के लिए निश्चित अंक-विभाजन नहीं है।

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
गद्यांश पर आधारित (खण्ड-ब, प्रश्न 1)23गद्यांश का प्रसंग, वक्ता, आशय — किसी भी एक निर्धारित पाठ से लिया जा सकता है
जीवन परिचय एवं प्रमुख रचना (खण्ड-ब, प्रश्न 6-क)3+21किसी भी एक लेखक का जीवन-वृत्त और उनकी प्रमुख रचना का नाम
बहुविकल्पीय (खण्ड-अ, प्रश्न 6-11 क्षेत्र में)10-2लेखक-कृति मिलान, विधा-पहचान — मॉडल प्रश्नपत्र में इसी श्रेणी के प्रश्न मिलान (मिलान कीजिए) रूप में आए थे
Prep strategy
  • पहले प्रसाद का जीवन-परिचय कंठस्थ कीजिए — चारों विधाओं (नाटक, उपन्यास, कहानी, काव्य) के नाम साथ रखिए
  • कहानी को तीन कालखंडों में बाँटकर याद कीजिए — रोहतासगढ़, काशी, 47 वर्ष बाद
  • 'ममता' कहानी है, निबंध नहीं — यह एक पंक्ति परीक्षा में सीधे अंक बचा सकती है
  • केंद्रीय द्वंद्व (घृणा बनाम कर्तव्य) को उद्धरण सहित याद रखिए — गद्यांश-प्रश्न में यही सबसे अधिक पूछा जाएगा

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

गद्यांश-आधारित प्रश्नों के लिए एक तैयार, प्रामाणिक उदाहरण

गद्यांश-आधारित प्रश्नों के लिए एक तैयार, प्रामाणिक उदाहरण — प्रसंग, वक्ता और आशय तीनों तरह के प्रश्नों के लिए उपयुक्त

जीवन-परिचय प्रश्न के लिए तैयार सामग्री

जीवन-परिचय प्रश्न के लिए तैयार सामग्री — प्रसाद, उनकी चारों विधाओं की रचनाएँ और शुक्ल युग/प्रसाद युग से जुड़ाव

ऐतिहासिक कथा-लेखन शैली की समझ

ऐतिहासिक कथा-लेखन शैली की समझ — वास्तविक इतिहास (शेरशाह, हुमायूँ, अकबर) और काल्पनिक पात्र (ममता) को कैसे बुना जाता है

यूनिट 1 (i) के 'प्रसाद युग' और गद्य-इतिहास से सीधा जुड़ाव

यूनिट 1 (i) के 'प्रसाद युग' और गद्य-इतिहास से सीधा जुड़ाव — जीवन-परिचय के उत्तर में दोनों यूनिट का ज्ञान एक साथ काम आता है

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

1
जीवन-परिचय में केवल कवि न लिखें — नाटककार और कहानीकार के रूप में भी प्रसाद का उल्लेख कीजिए, इससे 'प्रमुख रचना' वाले 2 अंक पूरे प्रामाणिक बनते हैं
2
गद्यांश आधारित प्रश्न में सबसे पहले प्रसंग (पाठ, लेखक, कहानी में स्थान) लिखिए, फिर आशय
3
कथासार लिखते समय तीन कालखंडों (रोहतासगढ़ → काशी → 47 वर्ष बाद) का क्रम मत तोड़िए — यही उत्तर की स्पष्टता बनाए रखता है
4
अंतिम पंक्ति ('पर उसमें ममता का कहीं नाम नहीं') को शब्दशः उद्धृत करना उत्तर को प्रामाणिक और प्रभावी बनाता है

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

STRETCH
यह कहानी 'नामहीन बलिदान' (unnamed sacrifice) के आदर्श पर बनी है — विश्व-साहित्य में ऐसी अन्य कहानियाँ खोजिए जहाँ इतिहास किसी सहायक चरित्र का नाम भुला देता है
STRETCH
ममता के निर्णय की तुलना भारतीय साहित्य के अन्य 'अतिथि-धर्म' प्रसंगों से कीजिए — जैसे रामायण या महाभारत के आतिथ्य-प्रसंग
STRETCH
यह विचार कीजिए कि यदि ममता को पहले से पता होता कि सामने वाला सैनिक सम्राट हुमायूँ है, तो क्या उसका निर्णय बदल सकता था — इससे कहानी के नैतिक तर्क की गहराई समझ में आती है
STRETCH
ऐतिहासिक कहानी (historical fiction) और इतिहास-लेखन के बीच का अंतर — प्रसाद वास्तविक घटनाओं (चौसा-युद्ध) में काल्पनिक पात्र (ममता) कैसे जोड़ते हैं, इसका विश्लेषण कीजिए

Where else this chapter is tested

CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

यू0पी0 बोर्ड हाईस्कूल परीक्षा — हिन्दी (विषय कोड 901), खण्ड-ब गद्यांश एवं जीवन-परिचय प्रश्न
यू0पी0 बोर्ड कक्षा-9 हिन्दी — समान गद्य-खण्ड ढाँचा
अन्य राज्य बोर्डों की हिन्दी परीक्षाएँ जहाँ प्रसाद की कहानियाँ पाठ्यक्रम में हों

Questions students ask

The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

कहानी है — जयशंकर प्रसाद के कहानी-संग्रह में संकलित एक ऐतिहासिक कथा। गद्य खण्ड शीर्षक के अंतर्गत निबंध और कहानी दोनों विधाएँ आती हैं, इसलिए यह भेद परीक्षा में विधा-पहचान के प्रश्न के रूप में पूछा जा सकता है।

नहीं। ममता उसे केवल एक भागा हुआ, थका हुआ मुगल सैनिक समझकर आश्रय देती है — पूरी तरह अतिथि-धर्म के आधार पर, न कि उसकी पहचान जानकर। सच्चाई कहानी के अंत में, 47 वर्ष बाद, पाठक और गाँव वालों दोनों के सामने एक साथ खुलती है।

दोहरे अर्थ में — यह नायिका का नाम भी है, और उसके भीतर के वात्सल्य, करुणा तथा अतिथि-धर्म के भाव का प्रतीक भी। वह भाव ही उसे अपने पिता के हत्यारों की जाति के प्रति घृणा पर विजय दिलाता है।

जयशंकर प्रसाद के मूल कहानी-संग्रह से — archive.org पर उपलब्ध 'Jaishankar Prasad Kahani Sangrah' में यह कहानी पूर्ण रूप से संकलित है। इस अध्याय की पूरी कथा-वस्तु, संवाद और उद्धरण उसी मूल पाठ से लिए गए हैं।
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Last reviewed on 14 September 2026. Written and reviewed by subject-matter experts — read about our process.
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