क्या लिखूँ — पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
"असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं। इसी तरह मन के भाव ही तो यथार्थ वस्तु है, विषय नहीं।" — पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, 'क्या लिखूँ ?', कुछ (1945)
1. इस अध्याय में क्या है
'क्या लिखूँ ?' यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी के गद्य खण्ड (यूनिट 1 ii) के सात निर्धारित पाठों में से एक है। यूनिट 1 (ii) का कुल भार 11 अंक है, और यह किसी एक पाठ का हिस्सा नहीं बँटा — मॉडल प्रश्नपत्र दिखाता है कि यह अंक दो हिस्सों में आता है —
| खण्ड-ब प्रश्न | विषय | अंक |
|---|---|---|
| प्रश्न 1 | गद्य हेतु निर्धारित पाठ्यवस्तु से गद्यांश पर आधारित प्रश्न | 3×2=6 |
| प्रश्न 6 (क) | गद्य खण्ड के लेखकों का जीवन परिचय एवं प्रमुख रचना का नाम | 3+2=5 |
अर्थात् गद्यांश किसी भी एक पाठ से आ सकता है, और जीवन-परिचय किसी भी एक लेखक का पूछा जा सकता है। सातों पाठ पढ़ना आदर्श है; यह अध्याय उनमें से एक — बख्शी जी के 'क्या लिखूँ ?' — को मूल पुस्तक से सीधे प्रस्तुत करता है।
सातों निर्धारित पाठ, संदर्भ के लिए —
| पाठ | लेखक |
|---|---|
| मित्रता | रामचन्द्र शुक्ल |
| ममता | जयशंकर प्रसाद |
| भारतीय संस्कृति | राजेन्द्र प्रसाद |
| अजन्ता | भगवत शरण उपाध्याय |
| क्या लिखूँ | पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी |
| ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से | रामधारी सिंह दिनकर |
| पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी | जय प्रकाश भारती |
2. लेखक-परिचय — पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
बोर्ड जीवन-परिचय के लिए 3+2=5 अंक रखता है, इसलिए यह भाग पूरा कंठस्थ करने योग्य है।
- पूरा नाम। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, बी0ए0 — यही नाम उनके अपने संग्रह 'कुछ' के मुखपृष्ठ पर छपा है।
- कार्यक्षेत्र। निबंधकार, आलोचक और शिक्षक। हिन्दी के ललित निबंध (व्यक्तिगत, आत्मकथात्मक शैली के निबंध) के प्रमुख लेखकों में गिने जाते हैं।
- प्रमुख रचना — 'कुछ' (1945)। निबंधों का एक संग्रह, जिसका पहला निबंध यही 'क्या लिखूँ ?' है। संग्रह में 'रामलाल पण्डित', 'प्रेमचन्द', 'पण्डित महावीरप्रसाद द्विवेदी', 'सुमित्रानन्दन पंत' जैसे संस्मरणात्मक निबंध भी हैं।
- अन्य रचना। 'विश्वसाहित्य' — योरोपीय साहित्य के विकास और पाश्चात्य काव्य-समीक्षकों के मतों का परिचय देने वाली पुस्तक। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी हिन्दी साहित्य का इतिहास में इसी पुस्तक का उल्लेख किया है।
- युग। शुक्लोत्तर युग (1936 ई0 के बाद) के निबंधकार — शुक्ल जी की पुस्तक 1939-40 पर समाप्त हो जाती है, और बख्शी जी का यह संग्रह 1945 में छपा, यानी उसके बाद का।
- शैली की विशेषता। आत्म-कथन (स्वयं को केंद्र में रखकर लिखना), हल्का व्यंग्य, और निबंध-रचना की औपचारिक शर्तों पर ही व्यंग्य करने की प्रवृत्ति।
3. निबंध की पृष्ठभूमि — दो विद्यार्थी, दो विषय
निबंध का आरंभ एक विचित्र कठिनाई से होता है। लेखक अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध निबंधकार ए0 जी0 गार्डिनर के इस कथन से शुरू करते हैं कि लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है, जिसमें भाव अपने-आप उठते हैं और विषय की चिंता नहीं रहती। लेखक स्वीकार करते हैं —
"मुझे तो सोचना पड़ता है, चिन्ता करनी पड़ती है, परिश्रम करना पड़ता है, तब कहीं मैं एक निबन्ध लिख सकता हूँ।"
आज की कठिनाई दोहरी है। दो विद्यार्थी — नमिता और अमिता — आदर्श निबंध की माँग करते हैं, पर दोनों के विषय बिल्कुल अलग हैं —
| विद्यार्थी | विषय |
|---|---|
| नमिता | 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' |
| अमिता | 'समाज-सुधार' |
लेखक की समस्या यह है कि दो घंटे में दो अलग निबंध लिखना है, और दोनों विषय ऐसे हैं जिन पर पहले से विचार करने का अवसर नहीं मिला था।
4. निबंध-शास्त्र की पंडिताऊ शर्तों पर व्यंग्य
निबंध का सबसे रोचक भाग वह है जहाँ लेखक "निबंध-शास्त्र के आचार्यों" की बताई शर्तों को एक-एक करके परखते हैं, और हर शर्त में कोई-न-कोई विरोधाभास दिखा देते हैं।
शर्त — निबंध छोटा होना चाहिए। लेखक इसे स्वीकार कर लेते हैं, क्योंकि इसमें उनका ही लाभ है।
शर्त — पहले रूप-रेखा बनानी चाहिए। लेखक इसे असंभव बताते हैं और गार्डिनर का ही उदाहरण देते हैं, जिन्हें अपने लेखों का शीर्षक बनाने में इतनी कठिनाई होती थी कि वे यह काम मित्रों पर छोड़ देते थे। लेखक आगे लिखते हैं —
"शेक्सपीयर को भी नाटक लिखने में जितनी कठिनता न हुई होगी उतनी कठिनता नाटकों के नामकरण में हुई होगी। तभी तो घबड़ाकर नाम न रख सकने के कारण उन्होंने अपने एक नाटक का नाम रख दिया 'जैसा तुम चाहो'।"
शर्त — भाषा में प्रवाह हो, वाक्य छोटे-छोटे हों। यहाँ लेखक सबसे तीखा व्यंग्य करते हैं — वे "मास्टर" हैं, इसलिए विद्वत्ता दिखाने के लिए लंबे वाक्य लिखने का बहाना गढ़ते हैं, और वाणभट्ट की कादम्बरी के आधे-आधे पृष्ठ के वाक्यों का उदाहरण देते हैं।
फिर संस्कृत के कवि श्रीहर्ष का उल्लेख करते हैं, जिन्होंने जान-बूझकर अपने काव्य में ऐसी गुत्थियाँ डालीं जो साधारण पाठकों से न सुलझ सकें, और सेनापति का भी, जिनकी कविता मूर्खों के लिए जान-बूझकर दुर्बोध है। यह पूरी सूची निबंध-शास्त्र की गंभीर सलाह का मज़ाक है, गंभीर सलाह नहीं।
5. दो पद्धतियाँ — पंडिताऊ बनाम अंग्रेज़ी निबंधकार
इन शर्तों से निराश होकर लेखक एक दूसरी पद्धति की ओर मुड़ते हैं — अंग्रेज़ी के निबंधकारों की, जिनके "जन्मदाता मानहेन (मॉन्तेन) समझे जाते हैं।" इस पद्धति की विशेषता लेखक इस तरह बताते हैं —
"उन्होंने स्वयं जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया उसी को अपने प्रबन्धों में लिपिबद्ध कर दिया।"
ऐसे निबंधों में न कवि की उदात्त कल्पना होती है, न आख्यायिका-लेखक की सूक्ष्म दृष्टि, न विज्ञों का गंभीर तर्क — केवल लेखक की सच्ची अनुभूति और सच्ची अभिव्यक्ति। लेखक इसी पद्धति को अपनाने का निर्णय लेते हैं — पर समस्या बनी रहती है: दो निबंध लिखने हैं, समय एक ही है।
6. अमीर ख़ुसरो की युक्ति — दो विषय, एक निबंध
समाधान के लिए लेखक अमीर ख़ुसरो की एक कहानी याद करते हैं। एक बार प्यास लगने पर ख़ुसरो एक कुएँ के पास पहुँचे, जहाँ चार स्त्रियाँ पानी भर रही थीं। पानी माँगने पर हरेक ने एक अलग विषय पर कविता सुनने की शर्त रखी — खीर, चरखा, कुत्ता, ढोल। ख़ुसरो ने एक ही दोहे में चारों की इच्छा पूरी कर दी —
"खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला; आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।"
लेखक इसी युक्ति को अपनाते हैं — एक ही निबंध में दोनों विषयों को साध लेते हैं, "एक ही ढेले से दो चिड़ियाँ" मारते हुए।
7. मुख्य विषय — दूर के ढोल सुहावने क्यों होते हैं
निबंध का वास्तविक विषय अब आरंभ होता है, और यहीं लेखक समाज-सुधार को भी इसी तर्क में पिरो देते हैं।
पहला तर्क — दूरी कर्कशता को मधुर बना देती है। ढोल के पास बैठे व्यक्ति के कान के पर्दे फटते हैं, पर वही शब्द दूर किसी नदी-तट पर संध्या के समय किसी और के हृदय में विवाह-उत्सव का चित्र अंकित कर देते हैं। लेखक लिखते हैं —
"ढोल की ध्वनि के साथ आनन्द का कलरव, उत्सव का प्रमोद और प्रेम का संगीत ये तीनों मिले रहते हैं। तभी उनकी कर्कशता समीपस्थ लोगों को भी कटु नहीं प्रतीत होती और दूरस्थ लोगों के लिए तो वह अत्यन्त मधुर बन जाती है।"
दूसरा तर्क — तरुणों के लिए भविष्य दूर है, इसलिए मधुर। जो तरुण जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र मनोमोहक लगता है — प्रेम ही उनका सर्वस्व है, रोग और मृत्यु भी उन्हें सुखद लगते हैं क्योंकि उनमें प्रेम की मधुरता घुली रहती है। संसार में प्रवेश करते ही यह कल्पित संसार विलीन हो जाता है।
तीसरा तर्क — वृद्धों के लिए अतीत दूर है, इसलिए मधुर। जो अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आए हैं, उन्हें अतीत की स्मृति सुखद लगती है। लेखक इस विषमता को एक पंक्ति में बाँधते हैं —
"तरुण भविष्य के वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं। तरुण क्रान्ति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक।"
समाज-सुधार से जुड़ाव। इन्हीं दो विरोधी खिंचावों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है, और इसीलिए वर्तमान काल सदैव सुधारों का केंद्र बना रहता है। लेखक भारत के सुधारकों की एक सूची देते हैं — बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी — और कहते हैं कि सुधारकों का यह क्रम कभी समाप्त नहीं होता, क्योंकि जो आज सुधार है वही कल दोष बन जाता है।
निबंध का अंतिम मोड़। लेखक भविष्यवाणी करते हैं कि आज का प्रगतिशील साहित्य भी कुछ समय बाद अतीत का स्मारक बन जाएगा, और आज के तरुण ही वृद्ध होकर उसी अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे। निबंध उसी पंक्ति पर लौटकर समाप्त होता है जिससे उसका शीर्षक बना —
"…ऐसे ही स्वप्न सुखद होते हैं, क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।"
8. निबंध-शैली की विशेषताएँ
| विशेषता | उदाहरण |
|---|---|
| आत्म-कथन शैली | लेखक स्वयं को केंद्र में रखकर पूरा निबंध बुनते हैं |
| विद्वत्तापूर्ण उद्धरण | गार्डिनर, शेक्सपीयर, वाणभट्ट, श्रीहर्ष, सेनापति, अमीर ख़ुसरो |
| हल्का आत्म-व्यंग्य | "मैं तो मास्टर हूँ" — अपनी ही दुर्बलता पर हँसी |
| तर्क की शृंखला | ढोल → तरुण का भविष्य → वृद्ध का अतीत → समाज-सुधार — एक तर्क से दूसरे तक स्वाभाविक बहाव |
| उद्देश्य और शीर्षक की एकता | निबंध जिस पंक्ति से चलता है, उसी पर लौटकर समाप्त होता है |
9. गद्यांश-आधारित अभ्यास
बोर्ड के खण्ड-ब प्रश्न 1 का ढाँचा है — किसी गद्यांश पर 3 प्रश्न, 2-2 अंक के। नीचे एक प्रतिनिधि गद्यांश और उसी ढाँचे पर प्रश्न दिए गए हैं।
गद्यांश। "दूर के ढोल सुहावने होते हैं, क्योंकि उनकी कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती। जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर, संध्या समय, किसी दूसरे के कान से वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं।"
शब्दार्थ। कर्कशता — कठोरता, कटु ध्वनि। संचार करना — फैलाना, भर देना।
प्रश्न 1 (2 अंक)। गद्यांश के अनुसार दूर के ढोल सुहावने क्यों लगते हैं? उत्तर संकेत — क्योंकि दूरी उनकी कर्कशता को कम कर देती है और वही ध्वनि निकट सुनने वाले को कटु, पर दूर सुनने वाले को मधुर लगती है।
प्रश्न 2 (2 अंक)। इस गद्यांश का प्रसंग स्पष्ट कीजिए — यह किस निबंध से और किस संदर्भ में लिया गया है? उत्तर संकेत — यह पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के निबंध 'क्या लिखूँ ?' से है, जहाँ लेखक 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' विषय पर निबंध लिखते हुए इस भौतिक उदाहरण से अपनी बात आरंभ करते हैं।
प्रश्न 3 (2 अंक)। लेखक इसी तर्क को आगे किस विषय तक ले जाते हैं? उत्तर संकेत — तरुणों के लिए भविष्य, वृद्धों के लिए अतीत — दोनों दूर होने के कारण मधुर लगते हैं, और यही खिंचाव समाज को निरंतर सुधार की ओर धकेलता रहता है।
दूसरा गद्यांश। "तरुण भविष्य के वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत के खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं। तरुण क्रान्ति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक। इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है।"
शब्दार्थ। क्षुब्ध — अशांत, असंतुष्ट। संरक्षक — रक्षा करने वाला, बचाए रखने वाला।
प्रश्न 1 (2 अंक)। तरुण और वृद्ध के स्वभाव में लेखक क्या विरोधाभास दिखाते हैं? उत्तर संकेत — तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और क्रांति के समर्थक होते हैं, जबकि वृद्ध अतीत को वर्तमान में खींचना चाहते हैं और अतीत-गौरव के संरक्षक होते हैं।
प्रश्न 2 (2 अंक)। वर्तमान 'सदैव क्षुब्ध' क्यों रहता है, गद्यांश के आधार पर बताइए। उत्तर संकेत — क्योंकि दो विपरीत दिशाओं में खींचने वाली शक्तियाँ (तरुणों की क्रांति-चाह और वृद्धों की अतीत-रक्षा) एक साथ वर्तमान पर काम करती हैं, जिससे वह कभी स्थिर या संतुष्ट नहीं हो पाता।
प्रश्न 3 (2 अंक)। निबंध में यह विरोधाभास अंततः किस निष्कर्ष तक पहुँचाता है? उत्तर संकेत — यही विरोधाभास समाज को निरंतर सुधार की ओर धकेलता है, और इसीलिए इतिहास में बुद्ध से गांधी तक सुधारकों की शृंखला कभी समाप्त नहीं होती।
सारांश
'क्या लिखूँ ?' पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के संग्रह 'कुछ' (1945) का पहला निबंध है, और यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी के गद्य खण्ड (यूनिट 1 ii, 11 अंक) के सात पाठों में से एक। निबंध की चतुराई यह है कि वह स्वयं इस समस्या पर है कि निबंध लिखा कैसे जाए — दो विद्यार्थियों के परस्पर-विरोधी विषयों को अमीर ख़ुसरो की एक चतुर युक्ति से एक साथ साध लिया जाता है।
रास्ते में लेखक निबंध-शास्त्र की पंडिताऊ शर्तों — छोटे वाक्य, रूप-रेखा, प्रवाह — पर हल्का व्यंग्य करते हैं, और अंग्रेज़ी निबंधकारों (मॉन्तेन-परंपरा) की आत्म-कथात्मक शैली को अपनाने का निर्णय लेते हैं।
मुख्य विषय — दूर के ढोल सुहावने क्यों होते हैं — तीन तर्कों में खुलता है: दूरी कर्कशता को मधुर बनाती है; तरुणों के लिए दूर भविष्य मधुर है; वृद्धों के लिए दूर अतीत मधुर है। इसी विरोधाभास से निबंध समाज-सुधार तक पहुँचता है — वर्तमान सदा क्षुब्ध रहता है क्योंकि तरुण भविष्य को खींचना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को, और यही खिंचाव सुधारकों की अनवरत शृंखला — बुद्ध से गांधी तक — को जन्म देता है।
परिशिष्ट — क्या इस अध्याय का नहीं है
- गद्यांश के प्रश्न किसी भी पाठ से आ सकते हैं। यह अध्याय केवल एक पाठ (क्या लिखूँ) कवर करता है। शेष छह — मित्रता, ममता, भारतीय संस्कृति, अजन्ता, ईर्ष्या तू न गयी मेरे मन से, पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी — इसमें नहीं हैं।
- 'कुछ' के अन्य निबंध। संग्रह में 'रामलाल पण्डित', 'प्रेमचन्द', 'पण्डित महावीरप्रसाद द्विवेदी' जैसे अन्य संस्मरणात्मक निबंध भी हैं, पर पाठ्यक्रम में केवल 'क्या लिखूँ ?' निर्धारित है।
- 'विश्वसाहित्य' का विस्तृत विवरण। बख्शी जी की यह दूसरी पुस्तक जीवन-परिचय में नाम लेने के लिए पर्याप्त है; उसकी विषय-वस्तु पाठ्यक्रम में नहीं माँगी गई।
