काव्य सौन्दर्य के तत्व — रस, अलंकार और छन्द
"दोहा उलटे सोरठा।" — जगन्नाथ प्रसाद 'भानु', छन्दःप्रभाकर — सोरठा का पूरा लक्षण चार शब्दों में
1. तीन अंक, और वे कितने सँकरे हैं
पाठ्यक्रम की यह पंक्ति पूरी पढ़िए, क्योंकि इसमें जो नहीं लिखा वह उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना जो लिखा है।
| पाठ्यक्रम | अंक |
|---|---|
| (क) रस — हास्य एवं करुण रस (परिभाषा, उदाहरण एवं पहचान) | 1×1=1 |
| (ख) अलंकार — (अर्थालंकार) उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा (लक्षण एवं उदाहरण) | 1×1=1 |
| (ग) छन्द — सोरठा एवं रोला (लक्षण एवं उदाहरण) | 1×1=1 |
तीन प्रश्न, तीन अंक, और तीनों बहुविकल्पीय — यह यूनिट 2 (iv) है और खण्ड-अ का प्रश्न 3।
अब वह देखिए जो पाठ्यक्रम नहीं माँगता —
- नौ रसों में से केवल दो। शृंगार, वीर, रौद्र, भयानक, बीभत्स, अद्भुत, शांत — कोई नहीं।
- अलंकारों में केवल अर्थालंकार, और उनमें भी तीन। शब्दालंकार — अनुप्रास, यमक, श्लेष — पाठ्यक्रम में नाम लेकर नहीं हैं।
- छन्दों में केवल दो। दोहा, चौपाई, कवित्त, सवैया, कुण्डलिया, छप्पय — कोई नहीं।
यह अध्याय जान-बूझकर छोटा है। तीन अंक के लिए तीन परिभाषाएँ, तीन-तीन उदाहरण और तीन पहचान-नियम चाहिए। उससे आगे पढ़ा हुआ इस प्रश्नपत्र में लौटकर नहीं आता।
स्रोत। रस और अलंकार के लक्षण भाषाभूषण (महाराजा जसवंत सिंह, व्रजरत्नदास की टीका सहित) से हैं, और छन्द के लक्षण छन्दःप्रभाकर (जगन्नाथ प्रसाद 'भानु') से। ये वही ग्रंथ हैं जिनसे हिन्दी में ये लक्षण चले — इसलिए जहाँ गाइडों में शब्द बदले हुए दिखें, प्रमाण यही है।
2. रस — भाव से रस तक
रस काव्य पढ़ने या नाटक देखने पर मन में उत्पन्न होने वाला आनन्द है। भाषाभूषण की टीका इसे एक वाक्य में जोड़ देती है —
"किसी काव्य या नाटक में जो भाव स्थायी रूप से वर्तमान रहता है और अन्य भाव केवल जिसके सहायक मात्र होकर उसकी पुष्टि करते हैं वे स्थायी भाव कहलाते हैं। ये भाव, विभाव, अनुभाव आदि से अभिव्यक्त होकर पाठक या दर्शक के मस्तिष्क में जो आनन्द अर्थात् रसत्व उत्पन्न करते हैं उसी को रस कहा जाता है।"
इससे रस के चार अंग निकलते हैं, और इनके नाम पूछे जाते हैं।
| अंग | क्या है |
|---|---|
| स्थायी भाव | वह भाव जो पूरे काव्य में बना रहता है — रस का बीज |
| विभाव | जिससे रस जागता है। दो प्रकार — आलंबन (जिसके सहारे भाव जगे) और उद्दीपन (जो उसे भड़काए, जैसे चंद्र, शरद) |
| अनुभाव | भाव जागने पर शरीर पर दिखने वाली चेष्टाएँ |
| संचारी भाव | आते-जाते रहने वाले सहायक भाव |
नौ स्थायी भाव, नौ रस। भाषाभूषण की तालिका शब्दशः यह है —
| स्थायी भाव | रति | हास | शोक | क्रोध | उत्साह | भय | जुगुप्सा | विस्मय |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रस | शृंगार | हास्य | करुण | रौद्र | वीर | भयानक | बीभत्स | अद्भुत |
नवाँ रस शांत है। यहाँ एक ईमानदार बात कह देनी चाहिए — टीका स्वयं लिखती है कि "नवम रस शांत का स्थायी भाव भाषाभूषण में नहीं दिया गया है", और उसका स्थायी भाव शम या निर्वेद साहित्यदर्पण में माना गया है। यही कारण है कि कुछ पुस्तकें आठ रस गिनाती हैं और कुछ नौ।
आपके लिए इस पूरी तालिका में से दो खाने काम के हैं — हास्य और करुण।
2.1 हास्य रस
स्थायी भाव — हास। किसी की विचित्र वेशभूषा, विकृत आकृति, अटपटी चेष्टा या असंगत बात देख-सुनकर मन में जो हँसी जागती है, वही परिपक्व होकर हास्य रस बनती है।
| अंग | हास्य रस में |
|---|---|
| स्थायी भाव | हास |
| आलंबन | विचित्र वेशभूषा या चेष्टा वाला व्यक्ति |
| उद्दीपन | उसकी अटपटी बातें, हाव-भाव, दूसरों की प्रतिक्रिया |
| अनुभाव | मुस्कान, ठहाका, आँखों का सिकुड़ना, पेट पकड़ना |
| संचारी भाव | हर्ष, चपलता, उत्सुकता |
पहचान का सूत्र — पढ़ते ही होंठों पर हँसी आ जाए और उपहास किसी की कुरूपता या विचित्रता का हो, तो हास्य रस है।
2.2 करुण रस
स्थायी भाव — शोक। किसी प्रिय की मृत्यु, स्थायी वियोग या असह्य विपत्ति से उत्पन्न दुःख जब पूर्णता तक पहुँचता है, तब करुण रस बनता है।
| अंग | करुण रस में |
|---|---|
| स्थायी भाव | शोक |
| आलंबन | मृत या सदा के लिए बिछुड़ा हुआ प्रिय जन |
| उद्दीपन | उसकी वस्तुएँ, उसके गुणों का स्मरण, शव, शोक-स्थल |
| अनुभाव | रोना, विलाप, छाती पीटना, मूर्च्छा, निःश्वास |
| संचारी भाव | निर्वेद, स्मृति, मोह, ग्लानि, चिंता |
करुण और वियोग शृंगार का अंतर — यही सबसे बड़ा जाल है। दोनों में विरह है, पर
- वियोग शृंगार में मिलन की आशा बची है। स्थायी भाव रति है।
- करुण में मिलन की आशा समाप्त हो चुकी है — मृत्यु या स्थायी वियोग। स्थायी भाव शोक है।
एक ही सवाल पूछिए — क्या ये फिर मिल सकते हैं? उत्तर 'हाँ' हो तो वियोग शृंगार, 'नहीं' हो तो करुण।
और अपने पाठ्यक्रम से जोड़ लीजिए। पद्य खण्ड में सुभद्रा कुमारी चौहान की 'झाँसी की रानी की समाधि पर' निर्धारित है — समाधि पर खड़े होकर लिखी गई कविता का प्रधान रस करुण ही होगा। यह जोड़ पहचान को आसान बनाता है।
3. अलंकार — केवल तीन अर्थालंकार
अलंकार काव्य का आभूषण है — वह जो कथन को सुंदर बना दे। अलंकार दो प्रकार के होते हैं, और पाठ्यक्रम कोष्ठक में लिखकर एक ही चुनता है।
- शब्दालंकार — सौंदर्य शब्द में हो। शब्द बदल दें तो चमत्कार चला जाए। अनुप्रास, यमक, श्लेष। पाठ्यक्रम में नहीं।
- अर्थालंकार — सौंदर्य अर्थ में हो। पर्यायवाची रख दें तो भी बना रहे। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा। यही पाठ्यक्रम में हैं।
3.1 उपमा
जहाँ उपमेय की उपमान से समानता दिखाई जाए, वहाँ उपमा अलंकार होता है।
उपमा के चार अंग होते हैं, और भाषाभूषण इन्हीं चारों में से एक-एक के लुप्त होने से लुप्तोपमा के भेद गिनाता है — धर्म-लुप्ता, वाचक-लुप्ता, उपमान-लुप्ता, उपमेय-लुप्ता।
| अंग | क्या है | उदाहरण में |
|---|---|---|
| उपमेय | जिसकी तुलना की जाए | मुख |
| उपमान | जिससे तुलना की जाए | चंद्र |
| साधारण धर्म | दोनों में जो गुण समान है | सुंदरता |
| वाचक शब्द | तुलना बताने वाला शब्द | सम, सी, जैसा, सदृश |
'मुख चंद्र के समान सुंदर है' — चारों अंग यहाँ मौजूद हैं। यह पूर्णोपमा है। कोई एक अंग गायब हो तो लुप्तोपमा।
3.2 रूपक
भाषाभूषण का लक्षण शब्दशः —
"जहाँ उपमेय में भेदरहित उपमान का आरोप हो और निषेध-वाचक शब्द न आया हो, वहाँ रूपक होता है।"
इस परिभाषा के दो शब्द पूरा अलंकार तय करते हैं। आरोप का अर्थ है उपमान को उपमेय पर रख देना, और भेदरहित का अर्थ है दोनों में कोई अंतर न रहने देना। उपमा में मुख चंद्र जैसा था; रूपक में मुख चंद्र ही है।
उदाहरण — मुख-रूपी चंद्र, चरण-कमल, भव-सागर, कनकलता-रूपी सुंदरी।
पहचान — 'रूपी' शब्द हो, या दो शब्द बिना किसी वाचक के जुड़कर एक हो गए हों (चरण-कमल), तो रूपक है।
3.3 उत्प्रेक्षा
भाषाभूषण का लक्षण —
"भेद-ज्ञानपूर्वक उपमेय में उपमान की प्रतीति होने को उत्प्रेक्षा कहते हैं। मानो, जानो, मनु, जनु आदि उत्प्रेक्षावाचक शब्द हैं।"
'भेद-ज्ञानपूर्वक' सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द है। कवि जानता है कि दोनों अलग हैं, फिर भी संभावना करता है — मानो ऐसा हो। रूपक में भेद मिट जाता है; उत्प्रेक्षा में भेद बना रहता है और केवल कल्पना की जाती है।
भाषाभूषण का अपना उदाहरण — "नेत्र विशेष रूप से बड़े और सरस हैं, मानों वे कमल हैं।"
3.4 तीनों को अलग करने का क्रम
| पहले यह देखिए | फिर उत्तर |
|---|---|
| क्या मानो, जानो, मनु, जनु है? | उत्प्रेक्षा |
| क्या सम, सी, जैसा, सदृश, समान है? | उपमा |
| कोई वाचक नहीं, दोनों एक हो गए? | रूपक |
यह क्रम बदलिए मत। पहले उत्प्रेक्षा जाँचिए, क्योंकि 'मानो' वाले वाक्यों में तुलना भी होती है और उन्हें उपमा समझ लेने की भूल सबसे आम है।
4. छन्द — सोरठा और रोला
छन्द अक्षरों या मात्राओं की नियत व्यवस्था है। दो शब्द पहले जान लीजिए, क्योंकि दोनों लक्षण इन्हीं पर टिके हैं।
- लघु (।) — एक मात्रा। ह्रस्व स्वर वाला अक्षर।
- गुरु (ऽ) — दो मात्राएँ। दीर्घ स्वर, अनुस्वार या संयुक्त व्यंजन से पहले वाला अक्षर।
छन्द के चार भाग होते हैं, जिन्हें चरण या पद कहते हैं। पहला और तीसरा विषम, दूसरा और चौथा सम।
4.1 सोरठा
छन्दःप्रभाकर का लक्षण चार शब्दों का है —
ल० — "सम तेरा विषमेश, दोहा उलटे सोरठा।"
यह लक्षण संख्याएँ शब्दों में छिपाकर रखता है, और यही इसे याद रखने लायक बनाता है।
- 'तेरा' = 13 → सम चरणों (दूसरा और चौथा) में 13 मात्राएँ
- 'ईश' = महादेव = 11 रुद्र → विषम चरणों (पहला और तीसरा) में 11 मात्राएँ
टीका इसे खोलकर लिख देती है: "सम अर्थात् दूसरे और चौथे चरणों में 13 और विषम अर्थात् पहले और तीसरे चरणों में ईश-महादेव अर्थात् 11 मात्राएँ होती हैं। दोहे का उल्टा सोरठा है।"
तुलसीदास का उदाहरण, जो छन्दःप्रभाकर स्वयं देता है —
जेहि सुमिरत सिधि होय, गन नायक करिबर बदन। करउ अनुग्रह सोइ, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥
यह रामचरितमानस के आरंभ का सोरठा है, और टीका बताती है कि "इसी का उल्टा दोहा होता है।" एक और नियम — "इसके सम चरणों में जगण का निषेध है।"
ऊपर के उदाहरण में एक बात देखिए। 'होय' और 'सोइ' आपस में तुक बना रहे हैं, और ये विषम चरणों के अंत हैं। दोहे में विषम चरण 13 मात्रा के लंबे होते हैं और तुक सम चरणों पर पड़ती है; सोरठे में विषम चरण छोटे (11) होते हैं और तुक उन पर आ जाती है। यह पहचान लक्षण-ग्रंथ का नियम नहीं, इसी उदाहरण से निकला निरीक्षण है — पर परीक्षा में तेज़ी से काम आता है।
4.2 रोला
छन्दःप्रभाकर छप्पय के लक्षण में रोला की गिनती दे देता है —
ल० — "रोला के पद चार, मत्त चोबीस धारिये।"
अर्थात् रोला के चार पद होते हैं और प्रत्येक में 24 मात्राएँ। टीका दोहराती है: "इस छन्द के आदि में रोला के चार पद चौबीस-चौबीस मात्राओं के रखो।"
24 मात्राएँ भीतर से 11 + 13 हैं, और यहीं वह वाक्य आता है जो दोनों छन्दों को जोड़ देता है —
"रोला के और सोरठा के विषम पद एक से होते हैं।"
| सोरठा | रोला | |
|---|---|---|
| चरण | 4 | 4 |
| विषम चरण | 11 मात्रा | — |
| सम चरण | 13 मात्रा | — |
| प्रति चरण | (11 या 13) | 24 मात्रा |
| यति | — | 11 और 13 पर |
| कुल मात्राएँ | 48 | 96 |
| प्रकार | अर्धसम मात्रिक | सम मात्रिक |
रोला और सोरठा में एक और अंतर, जो टीका बताती है: सोरठा के सम पद के आदि में त्रिकल के बाद दो गुरु नहीं आते, पर रोला के सम पद में आ सकते हैं। यह सूक्ष्म नियम कक्षा-10 में नहीं पूछा जाता, पर बताता है कि दोनों बिल्कुल एक नहीं हैं।
एक जोड़ याद रखिए। कुण्डलिया = दोहा + रोला — छन्दःप्रभाकर का लक्षण है "दोहा रोला जोरिकै, छे पद चौबिस मत्त।" और छप्पय = रोला के चार पद + उल्लाला के दो पद। रोला अकेला छन्द नहीं, दो बड़े छन्दों का घटक है।
सारांश
- काव्य सौन्दर्य के तत्व 3 अंक के हैं — यूनिट 2 (iv), खण्ड-अ प्रश्न 3, तीनों बहुविकल्पीय।
- पाठ्यक्रम केवल दो रस, तीन अर्थालंकार और दो छन्द माँगता है — बाकी सब बाहर है।
- रस वह आनन्द है जो स्थायी भाव के विभाव-अनुभाव से अभिव्यक्त होने पर उत्पन्न होता है।
- रस के चार अंग — स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी भाव।
- विभाव दो प्रकार का है — आलंबन और उद्दीपन।
- नौ स्थायी भाव और नौ रस हैं; भाषाभूषण में शांत रस का स्थायी भाव नहीं दिया गया।
- हास्य रस का स्थायी भाव हास है; करुण रस का स्थायी भाव शोक।
- करुण और वियोग शृंगार का अंतर आशा का है — मिलन संभव हो तो शृंगार, न हो तो करुण।
- अलंकार दो प्रकार के — शब्दालंकार और अर्थालंकार; पाठ्यक्रम में केवल अर्थालंकार हैं।
- उपमा के चार अंग — उपमेय, उपमान, साधारण धर्म, वाचक शब्द।
- चारों अंग हों तो पूर्णोपमा, कोई एक न हो तो लुप्तोपमा।
- रूपक — 'उपमेय में भेदरहित उपमान का आरोप', जैसे मुख-रूपी चंद्र, चरण-कमल।
- उत्प्रेक्षा — 'भेद-ज्ञानपूर्वक उपमेय में उपमान की प्रतीति'; वाचक मानो, जानो, मनु, जनु।
- पहचान का क्रम — पहले मानो/जनु देखिए (उत्प्रेक्षा), फिर सम/सी/जैसा (उपमा), दोनों न हों तो रूपक।
- लघु एक मात्रा का, गुरु दो मात्रा का; पहला-तीसरा चरण विषम, दूसरा-चौथा सम।
- सोरठा — विषम चरण 11, सम चरण 13 मात्रा; कुल 48। 'दोहा उलटे सोरठा'।
- सोरठे का लक्षण 'सम तेरा विषमेश' है — तेरा यानी 13, ईश यानी 11।
- सोरठे में तुक विषम चरणों के अंत में मिलती है, दोहे में सम चरणों के अंत में।
- रोला — चार पद, प्रत्येक 24 मात्रा, यति 11 और 13 पर; कुल 96।
- 'रोला के और सोरठा के विषम पद एक से होते हैं' — छन्दःप्रभाकर।
- कुण्डलिया = दोहा + रोला; छप्पय = रोला के चार पद + उल्लाला के दो पद।
परिशिष्ट — क्या इस अध्याय का नहीं है
यह वह सूची है जिस पर सबसे अधिक समय बरबाद होता है। तीन अंक के लिए तीन चीज़ें चाहिए, तीस नहीं।
| विषय | स्थिति |
|---|---|
| शृंगार, वीर, रौद्र, भयानक, बीभत्स, अद्भुत, शांत, वात्सल्य रस | पाठ्यक्रम में नहीं — केवल हास्य और करुण |
| अनुप्रास, यमक, श्लेष | शब्दालंकार — पाठ्यक्रम कोष्ठक में 'अर्थालंकार' लिखता है |
| अतिशयोक्ति, यमक, विरोधाभास, मानवीकरण | अर्थालंकार तो हैं, पर नाम लेकर पाठ्यक्रम में नहीं |
| दोहा, चौपाई, कवित्त, सवैया, कुण्डलिया, छप्पय | पाठ्यक्रम में नहीं — केवल सोरठा और रोला |
| गण (यगण, मगण, तगण आदि) और गण-सूत्र | कक्षा-10 में नहीं; लक्षण में उल्लेख भर आता है |
| वर्णिक वृत्त और उनके भेद | कक्षा-10 में नहीं; यहाँ केवल मात्रिक छन्द चाहिए |
| रस-निष्पत्ति के सिद्धांत, साधारणीकरण | उच्च कक्षाओं का विषय |
दोहे पर एक अपवाद। दोहा पाठ्यक्रम में नहीं है, पर सोरठे का पूरा लक्षण ही 'दोहा उलटे सोरठा' है — इसलिए दोहे की 13-11 व्यवस्था जानना आवश्यक है। इतना ही जानिए; उसके 23 भेद नहीं।
