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  • 1बताना कि व्याकरण के सातों अंक खण्ड-अ के किन प्रश्नों में हैं
  • 2पाठ्यक्रम में नामित ग्यारह उपसर्गों का अर्थ और उदाहरण देना
  • 3'अ' और 'अन्' तथा 'निर्' और 'नि' के बीच का नियम लागू करना
  • 4समास का भेद केवल यह पूछकर निकालना कि कौन-सा पद प्रधान है
  • 5द्वन्द्व, द्विगु, कर्मधारय और बहुब्रीहि को उदाहरण देखकर अलग करना
  • 6यह पहचानना कि द्विगु और कर्मधारय तत्पुरुष के उपभेद हैं, मुख्य भेद नहीं
  • 7'पीतांबर' जैसे शब्द का विग्रह बदलकर दिखाना कि वह कर्मधारय भी है और बहुब्रीहि भी
  • 8तत्सम और तद्भव शब्दों को उनके वर्णों की कठिनता से पहचानना
  • 9साधारण, मिश्र और संयुक्त वाक्य को योजक शब्द देखकर अलग करना
  • 10कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य की पहचान करना और वाच्य परिवर्तन करना
  • 11यह समझना कि वाच्य का निर्णय क्रिया के रूप से नहीं, अर्थ से होता है
  • 12चार विकारी और चार अविकारी शब्द-भेद गिनाना और किसी शब्द को सही खाने में रखना
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Why this chapter matters
सात अंक, और उनमें से एक भी वर्णनात्मक नहीं — पूरा व्याकरण खण्ड-अ में बहुविकल्पीय है। यानी परिभाषाएँ लिखनी नहीं, पहचाननी हैं। यह अध्याय कामताप्रसाद गुरु के 'हिंदी व्याकरण' से लिखा गया है, जिससे हिन्दी की मानक परिभाषाएँ चली हैं — इसलिए जहाँ गाइडें आपस में उलझती हैं, यहाँ प्रमाण मिलेगा।

हिन्दी व्याकरण — उपसर्ग, समास, वाक्य, वाच्य और पद परिचय

"हिंदी-व्याकरणों के 'कर्तृप्रधान', 'कर्मप्रधान' और 'भावप्रधान' शब्द भ्रामक होने के कारण इस पुस्तक में छोड़ दिए गए हैं।" — कामताप्रसाद गुरु, हिंदी व्याकरण, वाच्य-प्रकरण

1. सात अंक, और वे कहाँ से आते हैं

पाठ्यक्रम की इकाईवार तालिका में यूनिट 4 (ii) — व्याकरण, 07 अंक लिखा है। ये सात अंक प्रश्नपत्र में कहाँ हैं, यह खण्ड-अ की सूची से ठीक-ठीक मिल जाता है।

खण्ड-अ प्रश्नविषयअंक
4हिन्दी व्याकरण — उपसर्ग, समास, तद्भव-तत्सम एवं पर्यायवाची3×1=3
5संस्कृत व्याकरण — सर्वनाम तद्, युष्मद्1×1=1
6वाक्य का स्वरूप1×1=1
7वाच्य — प्रयोग और वाच्य परिवर्तन1×1=1
8पद परिचय — विकारी एवं अविकारी शब्द1×1=1
योग7

जोड़ ठीक सात बैठता है। यह अध्याय इनमें से छह अंक का है — प्रश्न 5 का संस्कृत व्याकरण संस्कृत खण्ड के साथ पढ़ना ठीक रहता है।

तीन बातें इससे तुरंत निकलती हैं।

  • सातों प्रश्न बहुविकल्पीय हैं। कहीं परिभाषा लिखनी नहीं है, केवल पहचाननी है।
  • सातों खण्ड-अ में हैं, यानी ओ0एम0आर0 शीट पर।
  • व्याकरण पर वर्णनात्मक प्रश्न एक भी नहीं है। जो समय लंबे उत्तर रटने में जाता, वह बचा हुआ है।

स्रोत के बारे में। आगे जो परिभाषाएँ उद्धरण चिह्नों में हैं, वे कामताप्रसाद गुरु के हिंदी व्याकरण (नागरी प्रचारिणी सभा, काशी) से हैं। हिन्दी की मानक व्याकरण-परिभाषाएँ इसी ग्रंथ से चली हैं, इसलिए जहाँ गाइडों में मतभेद दिखे, वहाँ यही ग्रंथ प्रमाण है।

2. उपसर्ग — शब्द के आगे लगकर अर्थ बदलने वाले

उपसर्ग वे शब्दांश हैं जो किसी शब्द के आगे लगकर उसका अर्थ बदल देते हैं। पाठ्यक्रम ग्यारह उपसर्ग नाम लेकर गिनाता है — अ, अन्, अधि, अप, अनु, उप, सह, निर, अभि, परि, सु — और अंत में 'इत्यादि' लगाता है।

गुरु जी की सूची से, अर्थ और उदाहरण सहित —

उपसर्गअर्थउदाहरण
अभाव, निषेधअगम, अज्ञान, अधर्म, अनीति, अलौकिक, अव्यय
अन्वही अर्थ, स्वर से पहलेअनन्तर, अनिष्ट, अनादि, अनायास, अनेक
अधिऊपर, श्रेष्ठअधिकरण, अधिकार, अधिराज, अध्यात्म
अनुपीछे, समानअनुकरण, अनुक्रम, अनुज, अनुताप, अनुशासन
अपबुरा, हीन, विरुद्धअपकीर्ति, अपमान, अपराध, अपशब्द, अपहरण
अभिओर, पास, सामनेअभिप्राय, अभिमुख, अभिमान, अभिलाषा, अभ्यास
उपनिकट, सदृश, गौणउपकार, उपदेश, उपनाम, उपभेद, उपवन, उपवेद
निर्, निस्बाहर, निषेधनिराकरण, निर्गम, निःशंक, निरपराध, निर्भय, निर्दोष
परिआसपास, चारों ओर, पूर्णपरिक्रमा, परिजन, परिणाम, परिधि, परिपूर्ण, परिवर्तन
सुअच्छा, सहज, अधिकसुकर्म, सुगम, सुलभ, सुशिक्षित, स्वागत
सम्अच्छा, साथ, पूर्णसंकल्प, संगम, संग्रह, संतोष, संयोग, संस्कार

'अ' और 'अन्' एक ही उपसर्ग हैं। गुरु जी का नियम साफ़ है — स्वर से शुरू होने वाले शब्दों के आगे 'अ' के स्थान पर 'अन्' हो जाता है। अ + नीति = अनीति, पर अन् + आदि = अनादि। इसीलिए पाठ्यक्रम दोनों को अलग-अलग गिनाता है।

'निर्' हिन्दी में प्रायः 'नि' हो जाता है। गुरु जी की टिप्पणी है कि यह उपसर्ग हिन्दी में बहुधा 'नि' बन जाता है — निधड़क, निडर, निवृत्त। इसीलिए 'निडर' का उपसर्ग पूछा जाए तो उत्तर निर् है, 'नि' नहीं।

दो-तीन उपसर्ग एक साथ भी आते हैं — निराकरण (निर् + आ + करण), प्रत्युपकार (प्रति + उप + कार), समालोचना। ऐसा शब्द विकल्प में दिखे तो उसे कठिन मानकर छोड़िए नहीं; भीतर के उपसर्ग अलग करके देखिए।

3. समास — कौन-सा पद प्रधान है, यही पूरा प्रश्न है

समास का पूरा वर्गीकरण एक ही कसौटी पर टिका है, और गुरु जी उसे एक वाक्य में कह देते हैं —

"जिन दो शब्दों में समास होता है उनकी प्रधानता अथवा अप्रधानता के विभाग-तत्त्व पर ये भेद किए गए हैं।"

एक ही प्रश्न — कौन-सा पद प्रधान है? समस्त पद देखिए पहला प्रधान दूसरा प्रधान दोनों प्रधान कोई नहीं अव्ययीभाव यथाविधि, प्रतिदिन तत्पुरुष राजपुत्र, गंगाजल द्वन्द्व माता-पिता, रात-दिन बहुब्रीहि दशानन, पीतांबर उपभेद कर्मधारय नीलकमल द्विगु त्रिलोक हरे वाले चार ही पाठ्यक्रम में हैं — द्वन्द्व, द्विगु, कर्मधारय, बहुब्रीहि इनमें दो तत्पुरुष के उपभेद हैं, मुख्य भेद नहीं — यही चौंकाता है

3.1 चार मुख्य भेद — गुरु जी के शब्दों में

भेदकसौटीगुरु जी का वाक्य
अव्ययीभावपहला पद प्रधान"जिस समास में पहला शब्द प्रायः प्रधान होता है"
तत्पुरुषदूसरा पद प्रधान"जिस समास में दूसरा शब्द प्रधान रहता है"
द्वन्द्वदोनों प्रधान"जिसमें दोनों पद प्रधान होते हैं वह द्वन्द्व कहलाता है"
बहुब्रीहिकोई प्रधान नहीं"जिसमें कोई भी शब्द प्रधान नहीं होता उसे बहुब्रीहि कहते हैं"

3.2 पाठ्यक्रम के चार — और उनमें छिपा जाल

पाठ्यक्रम की पंक्ति है: "समास — द्वन्द्व, द्विगु, कर्मधारय, बहुब्रीहि"

इसे ध्यान से देखिए। ये मुख्य चार भेद नहीं हैं। द्वन्द्व और बहुब्रीहि मुख्य भेद हैं, पर द्विगु और कर्मधारय तत्पुरुष के उपभेद हैं। अव्ययीभाव और सामान्य तत्पुरुष पाठ्यक्रम में नाम लेकर नहीं आते।

समासपहचानउदाहरणविग्रह
द्वन्द्वदोनों पद प्रधान; विग्रह में 'और' आता हैमाता-पिता, रात-दिन, राजा-रानीमाता और पिता
द्विगुपहला पद संख्यावाचक, समूह का बोधत्रिलोक, नवरत्न, चौराहा, पंचवटीतीन लोकों का समूह
कर्मधारयपहला पद विशेषण, दूसरा विशेष्यनीलकमल, महात्मा, पीतांबरनीला है जो कमल
बहुब्रीहिदोनों पद छोड़कर तीसरा ही अर्थ निकलेदशानन, पीतांबर, चक्रधरदस हैं आनन जिसके — रावण

द्विगु और कर्मधारय में अंतर करने का एक ही सवाल पूछिए — पहला पद गिनती है या गुण? गिनती हो तो द्विगु, गुण हो तो कर्मधारय। 'त्रिलोक' में 'त्रि' गिनती है, 'नीलकमल' में 'नील' गुण है।

कर्मधारय और बहुब्रीहि का जाल — 'पीतांबर'। यह शब्द दोनों तालिकाओं में जान-बूझकर रखा गया है, क्योंकि यह दोनों हो सकता है।

  • कर्मधारय मानें तो विग्रह होगा पीत है जो अंबर — अर्थ हुआ पीला वस्त्र। अर्थ पद के भीतर ही है।
  • बहुब्रीहि मानें तो विग्रह होगा पीत है अंबर जिसका — अर्थ हुआ विष्णु। अर्थ पद से बाहर चला गया।

यही बहुब्रीहि की असली पहचान है: अर्थ समस्त पद से बाहर किसी तीसरे की ओर जाता है। 'दशानन' का अर्थ 'दस मुँह' नहीं, रावण है।

4. तत्सम, तद्भव और पर्यायवाची

तत्सम का अर्थ है तत् + सम — 'उसके समान', यानी संस्कृत जैसा का तैसा। तद्भव का अर्थ है तत् + भव — 'उससे उत्पन्न', यानी संस्कृत से बिगड़कर बना।

तत्समतद्भवतत्समतद्भव
अग्निआगदुग्धदूध
हस्तहाथकर्णकान
सूर्यसूरजगृहघर
क्षेत्रखेतमयूरमोर
सर्पसाँपअश्रुआँसू
कार्यकाजमृत्युमौत

पहचानने का व्यावहारिक तरीका। तत्सम शब्द प्रायः संयुक्त व्यंजन और विसर्ग-ऋ जैसे कठिन वर्ण रखते हैं — क्ष, त्र, ज्ञ, ऋ, ष। तद्भव शब्द बोलने में सरल हो चुके होते हैं। 'क्षेत्र' कठिन है, 'खेत' सरल — इसलिए पहला तत्सम, दूसरा तद्भव।

पर्यायवाची समान अर्थ वाले शब्द हैं। परीक्षा में जिन शब्दों के पर्यायवाची सबसे अधिक पूछे जाते हैं, वे प्रकृति और देवताओं से जुड़े हैं —

शब्दपर्यायवाची
सूर्यरवि, भानु, दिनकर, दिवाकर, आदित्य, प्रभाकर
चन्द्रमाशशि, सुधाकर, राकेश, निशाकर, मयंक, इंदु
जलनीर, वारि, पानी, सलिल, अंबु, तोय
अग्निपावक, अनल, कृशानु, वह्नि, हुताशन
पृथ्वीधरा, धरती, वसुधा, भूमि, अवनि, मही
कमलपंकज, जलज, सरोज, नीरज, अरविंद, राजीव

एक जोड़ ध्यान रखिए। पद्य खण्ड में सूरदास, तुलसीदास और बिहारी हैं — इन्हीं कवियों की भाषा में ये पर्यायवाची भरे पड़े हैं। पद्यांश पढ़ते समय जो शब्द मिलें, उन्हें यहीं जोड़ते जाइए। दोनों यूनिट एक साथ तैयार होंगी।

5. वाक्य का स्वरूप

"एक विचार पूर्णता से प्रकट करने वाले शब्द-समूह को वाक्य कहते हैं।" — गुरु जी की परिभाषा इतनी ही है।

हर वाक्य के दो अवयव होते हैं —

  • उद्देश्य — "जिस वस्तु के विषय में कुछ कहा जाता है उसे सूचित करने वाले शब्द"
  • विधेय — "उद्देश्य के विषय में जो विधान किया जाता है उसे सूचित करने वाले शब्द"

'आत्मा अमर है' में आत्मा उद्देश्य है और अमर है विधेय।

रचना के अनुसार वाक्य तीन प्रकार के होते हैं — और यही एक अंक का प्रश्न है।

प्रकारगुरु जी की पहचानउदाहरण
साधारण"एक उद्देश्य और एक विधेय"आज बहुत पानी गिरा। बिजली चमकती है।
मिश्रमुख्य के अतिरिक्त एक या अधिक आश्रित उपवाक्यजब लड़का पाँच बरस का हुआ, तब पिता ने उसे मदरसे भेजा।
संयुक्तदो या अधिक स्वतंत्र उपवाक्य, योजक से जुड़ेवह आया और बैठ गया।

मिश्र और संयुक्त अलग करने का एक ही सवाल। जोड़ने वाला शब्द देखिए। जब-तब, जो-वह, यदि-तो, क्योंकि, कि — ये आश्रित उपवाक्य बनाते हैं, इसलिए वाक्य मिश्र है। और, तथा, परंतु, किंतु, या, अथवा — ये स्वतंत्र उपवाक्य जोड़ते हैं, इसलिए वाक्य संयुक्त है।

6. वाच्य — और वह जाल जो हर गाइड में है

वाच्य क्रिया का वह रूपांतर है जिससे पता चलता है कि वाक्य में कर्ता, कर्म या भाव — किसकी प्रधानता है।

वाच्य के तीन भेद कर्तृवाच्य उद्देश्य ही कर्ता है लड़का पुस्तक पढ़ता है। कर्ता प्रधान कर्मवाच्य कर्म उद्देश्य बन जाता है लड़के से पुस्तक पढ़ी जाती है। कर्ता के साथ 'से' / 'के द्वारा' भाववाच्य भाव प्रधान; क्रिया अकर्मक लड़के से चला नहीं जाता। प्रायः असमर्थता के अर्थ में 'लड़के ने पुस्तक पढ़ी' रूप से कर्मवाच्य लगता है पर गुरु जी के अनुसार अर्थ से यह कर्तृवाच्य ही है — प्रधानता कर्ता की है

गुरु जी की परिभाषाएँ —

कर्तृवाच्य — "क्रिया के उस रूपांतर को कहते हैं जिससे जाना जाता है कि वाक्य का उद्देश्य क्रिया का कर्ता है; जैसे, लड़का दौड़ता है, लड़का पुस्तक पढ़ता है।"

भाववाच्य — "क्रिया बहुधा अशक्तता के अर्थ में आती है; जैसे, यहाँ कैसे बैठा जाएगा। लड़के से चला नहीं जाता।"

भाववाच्य की सबसे भरोसेमंद पहचान यही 'अशक्तता' है। 'मुझसे चला नहीं जाता' का अर्थ है मैं चल नहीं सकता। जहाँ वाक्य असमर्थता या विवशता कह रहा हो और क्रिया अकर्मक हो, वहाँ भाववाच्य है।

6.1 वह जाल जिस पर गुरु जी ने अलग से टिप्पणी लिखी

वाक्य लीजिए: 'लड़के ने पुस्तक पढ़ी।'

यहाँ 'पढ़ी' क्रिया का लिंग-वचन 'पुस्तक' (कर्म) के अनुसार है, कर्ता के अनुसार नहीं। इसीलिए इसे बहुत लोग कर्मवाच्य कह देते हैं। गुरु जी इस पर पूरी टिप्पणी लिखते हैं —

"इसमें कर्म की प्रधानता नहीं है, किंतु कर्ता की है। इसलिए यह रचना रूप के अनुसार कर्मवाच्य होने पर भी अर्थ के अनुसार कर्तृवाच्य है।"

नियम यह बना। वाच्य का निर्णय अर्थ से कीजिए, क्रिया के रूप से नहीं। पूछिए — वाक्य किसके बारे में बात कर रहा है? यदि कर्ता के, तो कर्तृवाच्य, चाहे क्रिया कर्म से मिल रही हो।

6.2 वाच्य परिवर्तन

पाठ्यक्रम में 'वाच्य परिवर्तन' अलग से लिखा है, इसलिए दोनों दिशाओं का ढाँचा याद रखिए।

सेकोक्या बदलता है
कर्तृवाच्यकर्मवाच्यकर्ता के साथ से / के द्वारा लगेगा, कर्म उद्देश्य बनेगा, क्रिया के साथ जाना जुड़ेगा
कर्मवाच्यकर्तृवाच्य'से/के द्वारा' हटेगा, कर्ता उद्देश्य बनेगा, 'जाना' हटेगा
कर्तृवाच्यभाववाच्यक्रिया अकर्मक हो, कर्ता के साथ 'से', और अर्थ असमर्थता का बने

उदाहरण — राम पत्र लिखता है (कर्तृवाच्य) → राम से पत्र लिखा जाता है (कर्मवाच्य)। मैं चलता हूँ (कर्तृवाच्य) → मुझसे चला जाता है (भाववाच्य)।

7. पद परिचय — विकारी और अविकारी

पद परिचय का अर्थ है वाक्य में आए किसी शब्द का पूरा व्याकरणिक परिचय देना। पर पाठ्यक्रम इसे एक ही बिंदु तक सीमित रखता है: विकारी एवं अविकारी शब्द

विकारी वे शब्द हैं जिनका रूप बदलता है — लिंग, वचन, कारक, काल के अनुसार। अविकारी (जिन्हें अव्यय भी कहते हैं) वे हैं जिनका रूप कभी नहीं बदलता।

शब्दों के आठ भेद — चार और चार विकारी — रूप बदलता है 1. संज्ञालड़का → लड़के 2. सर्वनाममैं → मुझे 3. विशेषणअच्छा → अच्छी 4. क्रियाजाता → गया अविकारी (अव्यय) — कभी नहीं 5. क्रियाविशेषणधीरे, यहाँ 6. संबंधबोधकतक, बिना 7. समुच्चयबोधकऔर, किंतु 8. विस्मयादिबोधकअरे! वाह! गुरु जी का ग्रंथ भी इसी क्रम में बँटा है — 'पहला खंड: विकारी शब्द', 'दूसरा खंड: अव्यय'

यह विभाजन गुरु जी के ग्रंथ की अपनी संरचना है, कोई बाद की सुविधा नहीं। उनकी विषय-सूची में शब्दों के वर्गीकरण के नीचे सीधे 'पहला खंड — विकारी शब्द' (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया) और 'दूसरा खंड — अव्यय' (क्रियाविशेषण, संबंधसूचक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक) लिखा है।

याद रखने का सबसे तेज़ तरीका। चारों विकारी शब्दों का बहुवचन या स्त्रीलिंग बनाकर देखिए। बन जाए तो विकारी। 'और' का बहुवचन नहीं बनता, 'लड़का' का बनता है — इसलिए 'और' अविकारी और 'लड़का' विकारी।

सारांश

  • यूनिट 4 (ii) व्याकरण के 7 अंक खण्ड-अ के प्रश्न 4 से 8 तक हैं; सब बहुविकल्पीय, कोई वर्णनात्मक प्रश्न नहीं।
  • इनमें 6 अंक हिन्दी व्याकरण के हैं, 1 अंक संस्कृत व्याकरण का।
  • उपसर्ग शब्द के आगे लगकर अर्थ बदलते हैं; पाठ्यक्रम ग्यारह नाम लेकर गिनाता है।
  • 'अ' स्वर से पहले 'अन्' हो जाता है — अनीति, पर अनादि।
  • 'निर्' हिन्दी में प्रायः 'नि' बन जाता है — निडर का उपसर्ग निर् है, नि नहीं।
  • समास का पूरा वर्गीकरण एक ही कसौटी पर है — कौन-सा पद प्रधान है।
  • पहला प्रधान = अव्ययीभाव, दूसरा = तत्पुरुष, दोनों = द्वन्द्व, कोई नहीं = बहुब्रीहि।
  • पाठ्यक्रम में केवल चार हैं — द्वन्द्व, द्विगु, कर्मधारय, बहुब्रीहि — और इनमें द्विगु तथा कर्मधारय तत्पुरुष के उपभेद हैं।
  • द्विगु में पहला पद गिनती है, कर्मधारय में गुण — यही एक सवाल दोनों अलग कर देता है।
  • बहुब्रीहि की पहचान यह है कि अर्थ समस्त पद से बाहर तीसरे की ओर जाता है — दशानन यानी रावण।
  • 'पीतांबर' कर्मधारय भी है और बहुब्रीहि भी — विग्रह बदलते ही अर्थ पीला वस्त्र से विष्णु हो जाता है।
  • तत्सम = संस्कृत जैसा का तैसा; तद्भव = संस्कृत से बिगड़कर बना।
  • तत्सम में प्रायः क्ष, त्र, ज्ञ, ऋ, ष जैसे कठिन वर्ण मिलते हैं; तद्भव बोलने में सरल होते हैं।
  • वाक्य एक विचार पूर्णता से प्रकट करने वाला शब्द-समूह है; इसके दो अवयव उद्देश्य और विधेय हैं।
  • रचना के अनुसार वाक्य तीन प्रकार के हैं — साधारण, मिश्र, संयुक्त।
  • जब-तब, जो-वह, यदि-तो, क्योंकि, कि से मिश्र वाक्य बनता है; और, तथा, परंतु, या से संयुक्त।
  • कर्तृवाच्य में वाक्य का उद्देश्य ही क्रिया का कर्ता होता है।
  • कर्मवाच्य में कर्म उद्देश्य बन जाता है और कर्ता के साथ 'से' या 'के द्वारा' आता है।
  • भाववाच्य प्रायः अशक्तता के अर्थ में आता है और उसकी क्रिया अकर्मक होती है।
  • 'लड़के ने पुस्तक पढ़ी' रूप से कर्मवाच्य दिखता है पर अर्थ से कर्तृवाच्य है — निर्णय अर्थ से कीजिए, रूप से नहीं।
  • गुरु जी ने 'कर्तृप्रधान, कर्मप्रधान, भावप्रधान' नाम भ्रामक मानकर अपने ग्रंथ से हटा दिए।
  • विकारी शब्द चार हैं — संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया; इनका रूप बदलता है।
  • अविकारी या अव्यय चार हैं — क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक।
  • बहुवचन या स्त्रीलिंग बन जाए तो शब्द विकारी है, न बने तो अविकारी।

परिशिष्ट — क्या इस अध्याय का नहीं है

व्याकरण की तैयारी में सबसे अधिक समय उन विषयों पर लग जाता है जो कक्षा-10 के पाठ्यक्रम में हैं ही नहीं। पाठ्यक्रम की सूची छोटी है — उससे बाहर मत जाइए।

विषयस्थिति
संधि और संधि-विच्छेदपाठ्यक्रम की व्याकरण-सूची में नहीं
कारक और उसकी विभक्तियाँसूची में नहीं (वाच्य के भीतर काम आता है)
प्रत्यय — संस्कृत, हिन्दी, उर्दूसूची में नहीं; केवल उपसर्ग है
अव्ययीभाव और तत्पुरुष समासनाम लेकर नहीं; पर पहचानने के लिए जानना पड़ता है
विलोम शब्द, अनेकार्थी, मुहावरेसूची में नहीं; केवल पर्यायवाची है
लिंग, वचन, काल के नियमसूची में नहीं
रस, अलंकार, छन्दयूनिट 2 (iv) — काव्य सौन्दर्य के तत्व
सर्वनाम तद्, युष्मद्खण्ड-अ प्रश्न 5 — संस्कृत व्याकरण, हिन्दी नहीं

एक चेतावनी। 'प्रत्यय' सूची में नहीं है, पर 'उपसर्ग' है — और गाइडें दोनों को साथ पढ़ाती हैं। जो समय प्रत्यय पर लगेगा वह इस प्रश्नपत्र में लौटकर नहीं आएगा। उसे समास पर लगाइए, जहाँ से प्रश्न निश्चित रूप से आता है।

Key formulas & results

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व्याकरण के 7 अंक कहाँ हैं
खण्ड-अ प्रश्न 4 (3) + 5 (1) + 6 (1) + 7 (1) + 8 (1) = 7
सब बहुविकल्पीय। व्याकरण पर एक भी वर्णनात्मक प्रश्न नहीं
उपसर्ग की परिभाषा
शब्द के आगे लगकर उसका अर्थ बदलने वाला शब्दांश
आगे लगे तो उपसर्ग, पीछे लगे तो प्रत्यय — और प्रत्यय पाठ्यक्रम में नहीं है
'अ' बनाम 'अन्'
व्यंजन से पहले अ · स्वर से पहले अन्
अ + नीति = अनीति; अन् + आदि = अनादि
'निर्' का हिन्दी रूप
निर् → नि
गुरु जी: 'हिंदी में यह उपसर्ग बहुधा नि हो जाता है' — निडर, निधड़क
समास की एकमात्र कसौटी
कौन-सा पद प्रधान है?
गुरु जी: भेद 'प्रधानता अथवा अप्रधानता के विभाग-तत्त्व पर' किए गए हैं
चार मुख्य भेद
पहला प्रधान = अव्ययीभाव · दूसरा = तत्पुरुष · दोनों = द्वन्द्व · कोई नहीं = बहुब्रीहि
यह एक पंक्ति पूरा वर्गीकरण है
पाठ्यक्रम के चार समास
द्वन्द्व · द्विगु · कर्मधारय · बहुब्रीहि
इनमें द्विगु और कर्मधारय तत्पुरुष के उपभेद हैं, मुख्य भेद नहीं
द्विगु बनाम कर्मधारय
पहला पद गिनती = द्विगु · पहला पद गुण = कर्मधारय
त्रिलोक बनाम नीलकमल
बहुब्रीहि की पहचान
अर्थ समस्त पद से बाहर तीसरे की ओर जाए
दशानन = दस मुँह नहीं, रावण
तत्सम और तद्भव
तत् + सम = उसके समान · तत् + भव = उससे उत्पन्न
तत्सम में प्रायः क्ष, त्र, ज्ञ, ऋ, ष; तद्भव बोलने में सरल
वाक्य की परिभाषा
एक विचार पूर्णता से प्रकट करने वाला शब्द-समूह
गुरु जी का वाक्य, शब्दशः
वाक्य के दो अवयव
उद्देश्य + विधेय
'आत्मा अमर है' — आत्मा उद्देश्य, अमर है विधेय
रचना के अनुसार वाक्य
साधारण · मिश्र · संयुक्त
एक उद्देश्य-विधेय · आश्रित उपवाक्य · स्वतंत्र उपवाक्य
मिश्र बनाम संयुक्त की कुंजी
जब-तब, जो-वह, यदि-तो, क्योंकि, कि → मिश्र · और, तथा, परंतु, या → संयुक्त
योजक शब्द देखिए, लंबाई नहीं
कर्तृवाच्य
वाक्य का उद्देश्य ही क्रिया का कर्ता है
गुरु जी की परिभाषा — लड़का पुस्तक पढ़ता है
कर्मवाच्य
कर्म उद्देश्य बनता है; कर्ता के साथ 'से' या 'के द्वारा'
लड़के से पुस्तक पढ़ी जाती है
भाववाच्य
भाव प्रधान; क्रिया अकर्मक; प्रायः अशक्तता का अर्थ
गुरु जी: 'बहुधा अशक्तता के अर्थ में आती है' — मुझसे चला नहीं जाता
वाच्य निर्णय का नियम
अर्थ से तय कीजिए, क्रिया के रूप से नहीं
'लड़के ने पुस्तक पढ़ी' रूप से कर्मवाच्य, अर्थ से कर्तृवाच्य
विकारी शब्द
संज्ञा · सर्वनाम · विशेषण · क्रिया
रूप बदलता है — लिंग, वचन, कारक, काल से
अविकारी शब्द (अव्यय)
क्रियाविशेषण · संबंधबोधक · समुच्चयबोधक · विस्मयादिबोधक
रूप कभी नहीं बदलता
विकारी पहचानने की जाँच
बहुवचन या स्त्रीलिंग बन जाए तो विकारी
'लड़का' बनता है, 'और' नहीं बनता
⚠️

Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

WATCH OUT
'निडर' का उपसर्ग 'नि' बताना
उपसर्ग 'निर्' है। गुरु जी की टिप्पणी है कि हिन्दी में यह उपसर्ग बहुधा 'नि' हो जाता है — निडर, निधड़क, निवृत्त। रूप बदला है, उपसर्ग वही है। विकल्पों में 'नि' और 'निर्' दोनों रखे जाते हैं और यही जाल है।
WATCH OUT
'अनादि' का उपसर्ग 'अन्' के बजाय 'अ' लिखना (या उल्टा)
दोनों एक ही उपसर्ग के दो रूप हैं और नियम स्वर पर टिका है। व्यंजन से पहले 'अ' — अनीति, अधर्म। स्वर से पहले 'अन्' — अनादि, अनेक, अनायास। शब्द का अगला अक्षर देखिए, फिर उत्तर चुनिए।
WATCH OUT
'त्रिलोक' को कर्मधारय बताना
यह द्विगु है, क्योंकि पहला पद 'त्रि' गिनती है और समूह का बोध कराता है। कर्मधारय में पहला पद विशेषण होता है — गुण बताता है, संख्या नहीं। एक ही सवाल पूछिए: पहला पद गिनती है या गुण?
WATCH OUT
'दशानन' का अर्थ 'दस मुँह' लिखकर उसे द्विगु या कर्मधारय मान लेना
'दशानन' बहुब्रीहि है और उसका अर्थ रावण है। बहुब्रीहि की परिभाषा ही यह है कि उसमें कोई पद प्रधान नहीं होता और अर्थ समस्त पद से बाहर किसी तीसरे की ओर जाता है। यदि आपका विग्रह पद के भीतर ही रह गया, तो वह बहुब्रीहि नहीं है।
WATCH OUT
'पीतांबर' का एक ही उत्तर रट लेना
यह शब्द दोनों हो सकता है, और विग्रह तय करता है कि कौन-सा। 'पीत है जो अंबर' = पीला वस्त्र, यह कर्मधारय है। 'पीत है अंबर जिसका' = विष्णु, यह बहुब्रीहि है। प्रश्न में विग्रह या अर्थ दिया हो तो उसी से चलिए, याददाश्त से नहीं।
WATCH OUT
अव्ययीभाव और तत्पुरुष को पाठ्यक्रम से बाहर मानकर बिल्कुल न पढ़ना
नाम लेकर वे पाठ्यक्रम में नहीं हैं, पर चारों भेद एक ही कसौटी के चार उत्तर हैं। यह जाने बिना कि पहला पद प्रधान होने पर अव्ययीभाव और दूसरा प्रधान होने पर तत्पुरुष होता है, आप द्वन्द्व और बहुब्रीहि को भी भरोसे से नहीं पहचान सकते। पढ़िए, पर उन पर समय मत लगाइए।
WATCH OUT
मिश्र और संयुक्त वाक्य को लंबाई से पहचानना
लंबाई से कुछ तय नहीं होता — जोड़ने वाला शब्द तय करता है। जब-तब, जो-वह, यदि-तो, क्योंकि, कि आश्रित उपवाक्य बनाते हैं, इसलिए वाक्य मिश्र होता है। और, तथा, परंतु, किंतु, या स्वतंत्र उपवाक्य जोड़ते हैं, इसलिए संयुक्त। योजक पर उँगली रखिए।
WATCH OUT
'लड़के ने पुस्तक पढ़ी' को कर्मवाच्य बताना
गुरु जी ने इस वाक्य पर अलग से टिप्पणी लिखी है: 'इसमें कर्म की प्रधानता नहीं है, किंतु कर्ता की है। इसलिए यह रचना रूप के अनुसार कर्मवाच्य होने पर भी अर्थ के अनुसार कर्तृवाच्य है।' क्रिया का लिंग-वचन कर्म से मिल रहा है, पर बात कर्ता की हो रही है। वाच्य अर्थ से तय होता है।
WATCH OUT
भाववाच्य में सकर्मक क्रिया रख देना
भाववाच्य की क्रिया अकर्मक होती है और अर्थ प्रायः असमर्थता का होता है — 'मुझसे चला नहीं जाता', 'यहाँ कैसे बैठा जाएगा'। यदि वाक्य में कर्म मौजूद है तो वह कर्मवाच्य है, भाववाच्य नहीं। पहले क्रिया सकर्मक है या अकर्मक, यह तय कीजिए।
WATCH OUT
उत्तर में 'कर्तृप्रधान', 'कर्मप्रधान', 'भावप्रधान' शब्द चुनना
मानक नाम कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य हैं। गुरु जी ने लिखा है कि 'कर्तृप्रधान, कर्मप्रधान और भावप्रधान शब्द भ्रामक होने के कारण इस पुस्तक में छोड़ दिए गए हैं।' विकल्पों में ये मिलते-जुलते नाम जान-बूझकर रखे जाते हैं।
WATCH OUT
क्रियाविशेषण को विकारी मान लेना क्योंकि वह क्रिया से जुड़ा है
क्रिया विकारी है, क्रियाविशेषण अविकारी। जाँच सरल है — 'धीरे' का बहुवचन या स्त्रीलिंग बनाकर देखिए, नहीं बनेगा। जो नहीं बदलता वह अव्यय है। चारों अव्यय हैं क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक और विस्मयादिबोधक।
WATCH OUT
तत्सम और तद्भव उल्टे लिख देना
तत्सम का अर्थ 'उसके समान' है, यानी संस्कृत जैसा का तैसा — अग्नि, हस्त, दुग्ध। तद्भव का अर्थ 'उससे उत्पन्न' है, यानी बिगड़कर बना — आग, हाथ, दूध। व्यावहारिक जाँच: जिसमें क्ष, त्र, ज्ञ, ऋ, ष जैसे कठिन वर्ण हों वह प्रायः तत्सम, जो बोलने में सरल हो वह तद्भव।
WATCH OUT
प्रत्यय, संधि और मुहावरे रटने में समय लगाना
इनमें से कोई भी कक्षा-10 की व्याकरण-सूची में नहीं है। सूची केवल यह है — उपसर्ग, समास, तद्भव-तत्सम, पर्यायवाची, वाक्य का स्वरूप, वाच्य और पद परिचय। उससे बाहर पढ़ा हुआ इस प्रश्नपत्र में लौटकर नहीं आएगा।

Practice problems

Work through this chapter's problems as a readiness check — reveal each solution, mark yourself honestly, and get your gap report at the end.

Readiness check

Are you exam-ready for हिन्दी व्याकरण — उपसर्ग, समास, वाक्य, वाच्य और पद परिचय?

10 problems from this chapter. Try each one, reveal the worked solution, mark yourself honestly — get your gap report at the end.

10 questions~7 min

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • व्याकरण के 7 अंक खण्ड-अ के प्रश्न 4 से 8 तक हैं, सब बहुविकल्पीय
  • इनमें 6 अंक हिन्दी व्याकरण के, 1 अंक संस्कृत व्याकरण का
  • उपसर्ग शब्द के आगे लगकर उसका अर्थ बदलता है
  • व्यंजन से पहले 'अ', स्वर से पहले 'अन्' — अनीति, पर अनादि
  • 'निर्' हिन्दी में प्रायः 'नि' हो जाता है — निडर का उपसर्ग निर् है
  • अधि = ऊपर, श्रेष्ठ; अनु = पीछे, समान; अप = बुरा, हीन; अभि = ओर, सामने
  • उप = निकट, गौण; परि = चारों ओर, पूर्ण; सु = अच्छा, सहज; सम् = साथ, पूर्ण
  • समास का पूरा वर्गीकरण एक कसौटी पर है — कौन-सा पद प्रधान है
  • पहला प्रधान = अव्ययीभाव, दूसरा = तत्पुरुष, दोनों = द्वन्द्व, कोई नहीं = बहुब्रीहि
  • पाठ्यक्रम में केवल चार हैं — द्वन्द्व, द्विगु, कर्मधारय, बहुब्रीहि
  • द्विगु और कर्मधारय तत्पुरुष के उपभेद हैं, मुख्य भेद नहीं
  • द्विगु में पहला पद गिनती — त्रिलोक, नवरत्न, चौराहा, पंचवटी
  • कर्मधारय में पहला पद विशेषण — नीलकमल, महात्मा
  • बहुब्रीहि में अर्थ पद से बाहर तीसरे की ओर जाता है — दशानन यानी रावण
  • 'पीतांबर' कर्मधारय में पीला वस्त्र और बहुब्रीहि में विष्णु है
  • द्वन्द्व के विग्रह में 'और' आता है — माता और पिता
  • तत्सम = संस्कृत जैसा का तैसा; तद्भव = संस्कृत से बिगड़कर बना
  • तत्सम में प्रायः क्ष, त्र, ज्ञ, ऋ, ष; तद्भव बोलने में सरल
  • अग्नि-आग, हस्त-हाथ, दुग्ध-दूध, कर्ण-कान, क्षेत्र-खेत, मयूर-मोर
  • वाक्य एक विचार पूर्णता से प्रकट करने वाला शब्द-समूह है
  • वाक्य के दो अवयव — उद्देश्य और विधेय
  • रचना के अनुसार वाक्य तीन — साधारण, मिश्र, संयुक्त
  • जब-तब, जो-वह, यदि-तो, क्योंकि, कि से मिश्र वाक्य बनता है
  • और, तथा, परंतु, किंतु, या से संयुक्त वाक्य बनता है
  • कर्तृवाच्य — वाक्य का उद्देश्य ही क्रिया का कर्ता है
  • कर्मवाच्य — कर्म उद्देश्य बनता है, कर्ता के साथ 'से' या 'के द्वारा'
  • भाववाच्य — क्रिया अकर्मक, अर्थ प्रायः अशक्तता का
  • 'लड़के ने पुस्तक पढ़ी' रूप से कर्मवाच्य, अर्थ से कर्तृवाच्य
  • वाच्य का निर्णय अर्थ से होता है, क्रिया के रूप से नहीं
  • कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य — कर्ता के साथ 'से', कर्म उद्देश्य, क्रिया के साथ 'जाना'
  • विकारी चार — संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया
  • अविकारी चार — क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक
  • बहुवचन या स्त्रीलिंग बन जाए तो शब्द विकारी, न बने तो अविकारी
  • प्रत्यय, संधि, मुहावरे और विलोम कक्षा-10 की व्याकरण-सूची में नहीं हैं

Uttar Pradesh (UPMSP) marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: यूनिट 4 (ii) — व्याकरण: 07 अंक (पाठ्यक्रम की इकाईवार तालिका)। सातों खण्ड-अ में बहुविकल्पीय हैं — प्रश्न 4, 5, 6, 7, 8। इस अध्याय का हिस्सा 6 अंक है; प्रश्न 5 संस्कृत व्याकरण का है।

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
बहुविकल्पीय (खण्ड-अ, प्रश्न 4, 6, 7, 8)16उपसर्ग पहचानना; समास का भेद; तत्सम-तद्भव जोड़ी; पर्यायवाची; वाक्य साधारण-मिश्र-संयुक्त; वाच्य पहचान और परिवर्तन; शब्द विकारी है या अविकारी
लघु उत्तरीय — इस यूनिट में बोर्ड नहीं पूछता, समझ जाँचने के लिए20 (अभ्यास हेतु)विग्रह लिखकर समास सिद्ध करना और वाच्य परिवर्तन के चरण गिनाना — बहुविकल्पीय प्रश्न इन्हीं पर बनते हैं, इसलिए लिखकर अभ्यास करने से विकल्प तेज़ी से कटते हैं
Prep strategy
  • सबसे पहले यह याद कीजिए कि व्याकरण पर एक भी वर्णनात्मक प्रश्न नहीं है — इससे तैयारी का ढंग ही बदल जाता है
  • समास के लिए परिभाषाएँ मत रटिए, एक सवाल रटिए — कौन-सा पद प्रधान है
  • द्विगु बनाम कर्मधारय के लिए दूसरा सवाल — पहला पद गिनती है या गुण
  • बहुब्रीहि के हर उदाहरण के साथ उसका असली अर्थ लिखिए: दशानन = रावण, चक्रधर = विष्णु, गजानन = गणेश
  • उपसर्ग की तालिका अर्थ सहित लिखिए; केवल नाम याद रखने से उदाहरण वाला प्रश्न नहीं बनता
  • वाक्य-भेद के लिए योजक शब्दों की दो सूचियाँ बनाइए — मिश्र वाले और संयुक्त वाले
  • वाच्य में पहले पूछिए कि क्रिया सकर्मक है या अकर्मक; अकर्मक और असमर्थता का अर्थ हो तो भाववाच्य
  • पर्यायवाची पद्य खण्ड पढ़ते समय जोड़ते जाइए — सूर, तुलसी और बिहारी की भाषा इन्हीं से भरी है
  • प्रत्यय, संधि, मुहावरे और विलोम पर समय मत लगाइए; ये पाठ्यक्रम की व्याकरण-सूची में नहीं हैं

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

निबन्ध और पत्र लेखन में शुद्ध वाक्य-रचना

निबन्ध और पत्र लेखन में शुद्ध वाक्य-रचना — यूनिट 4 के 11 अंक इसी पर टिके हैं, और वहाँ गलती दिखती है

पद्यांश और गद्यांश की व्याख्या लिखते समय समास और पर्यायवा…

पद्यांश और गद्यांश की व्याख्या लिखते समय समास और पर्यायवाची पहचान लेना, जिससे अर्थ खुल जाता है

संस्कृत खण्ड के अनुवाद में तत्सम शब्दों की पहचान सीधे काम…

संस्कृत खण्ड के अनुवाद में तत्सम शब्दों की पहचान सीधे काम आती है — 14 अंक उसी पर हैं

यू0पी0 पुलिस

यू0पी0 पुलिस, लेखपाल और यू0पी0एस0एस0एस0सी0 पी0ई0टी0 के सामान्य हिन्दी खंड में यही उपसर्ग-समास-वाच्य पूछे जाते हैं

कक्षा-11 और 12 की हिन्दी में यही व्याकरण आगे बढ़ता है

कक्षा-11 और 12 की हिन्दी में यही व्याकरण आगे बढ़ता है, इसलिए यहाँ बना ढाँचा दो वर्ष और चलता है

किसी गाइड की गलती पकड़ लेना

किसी गाइड की गलती पकड़ लेना — जैसे 'निडर' का उपसर्ग 'नि' बता देना, जो बहुत सी पुस्तकों में छपा मिलता है

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

1
खण्ड-अ ओ0एम0आर0 शीट पर है — गोला पूरा काला कीजिए, और अंकित करने के बाद न काटिए, न इरेजर या व्हाइटनर लगाइए
2
व्याकरण के छहों प्रश्न सोचने में सबसे कम समय लेते हैं; प्रश्नपत्र पढ़ने के 15 मिनट में इन्हें चिह्नित कर लीजिए
3
समास के प्रश्न में पहले मन में विग्रह बोलिए, फिर विकल्प देखिए — विकल्प पहले देखने से भ्रम होता है
4
उपसर्ग के प्रश्न में मूल शब्द अलग कीजिए; जो बचे वही उपसर्ग है, चाहे वह बदले हुए रूप में हो
5
वाच्य के प्रश्न में पहले तय कीजिए कि क्रिया सकर्मक है या अकर्मक — आधा उत्तर वहीं मिल जाता है
6
वाक्य-भेद में योजक शब्द पर उँगली रखिए; वाक्य की लंबाई से कुछ तय नहीं होता
7
विकारी-अविकारी के प्रश्न में हर विकल्प का बहुवचन मन में बनाइए; जो न बने वही अविकारी है
8
मिलते-जुलते नाम वाले विकल्पों से सावधान रहिए — कर्मवाच्य बनाम कर्मणि प्रयोग, निर् बनाम नि, द्विगु बनाम द्वन्द्व

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

STRETCH
गुरु जी ने 'कर्तृप्रधान, कर्मप्रधान, भावप्रधान' नामों को भ्रामक कहकर हटा दिया। सोचिए कि ये नाम भ्रम क्यों पैदा करते हैं, और 'लड़के ने पुस्तक पढ़ी' का उदाहरण लेकर अपना तर्क लिखिए
STRETCH
बहुब्रीहि समास में अर्थ पद से बाहर जाता है। पाँच ऐसे बहुब्रीहि शब्द खोजिए जो किसी देवता के नाम हों, और हर एक का विग्रह लिखकर दिखाइए कि अर्थ कहाँ से बाहर निकला
STRETCH
संस्कृत में अव्ययीभाव समास का पहला पद अव्यय होता है, पर गुरु जी कहते हैं कि हिन्दी के उदाहरणों में प्रायः संज्ञा मिलती है। 'घर-घर', 'दिनोंदिन' जैसे शब्द लेकर यह अंतर समझाइए
STRETCH
हिन्दी में वाच्य के लिए क्रिया का रूप ही नहीं बदलता, दूसरी क्रिया जुड़ती है ('जाना')। पता कीजिए कि अंग्रेज़ी में यही काम कैसे होता है और दोनों भाषाओं की रचना में क्या समानता है
STRETCH
तद्भव शब्द बनने में कुछ ध्वनि-नियम बार-बार दिखते हैं — जैसे संयुक्त व्यंजन का सरल हो जाना (क्षेत्र → खेत)। दस तत्सम-तद्भव जोड़े लेकर तीन ऐसे नियम खोजिए
STRETCH
पाठ्यक्रम केवल चार समास माँगता है और उनमें दो उपभेद हैं। सोचिए कि पाठ्यक्रम ने अव्ययीभाव छोड़कर द्विगु और कर्मधारय क्यों चुने होंगे — कौन-से समास हिन्दी में अधिक मिलते हैं?

Where else this chapter is tested

CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

यू0पी0 बोर्ड हाईस्कूल परीक्षा — हिन्दी (विषय कोड 901), खण्ड-अ प्रश्न 4 से 8
यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 के चारों यूनिट टेस्ट, जिनमें दो पूर्णतः बहुविकल्पीय हैं
यू0पी0 बोर्ड कक्षा-11 और 12 हिन्दी, जहाँ यही व्याकरण आगे बढ़ता है
यू0पी0 पुलिस, लेखपाल और यू0पी0एस0एस0एस0सी0 पी0ई0टी0 के सामान्य हिन्दी खंड
सी0टी0ई0टी0 तथा यू0पी0टी0ई0टी0 के हिन्दी भाषा प्रश्नपत्र

Questions students ask

The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

याद मत रखिए — एक सवाल पूछिए। गुरु जी लिखते हैं कि सारे भेद 'प्रधानता अथवा अप्रधानता के विभाग-तत्त्व पर' किए गए हैं, इसलिए हर बार बस यह देखिए कि कौन-सा पद प्रधान है। पहला प्रधान तो अव्ययीभाव, दूसरा प्रधान तो तत्पुरुष, दोनों प्रधान तो द्वन्द्व, कोई नहीं तो बहुब्रीहि। इसके बाद तत्पुरुष के भीतर एक और सवाल बचता है — पहला पद गिनती है (द्विगु) या गुण (कर्मधारय)। दो सवालों से पूरा वर्गीकरण निकल आता है।

छोड़िए नहीं, पर उन पर समय भी मत लगाइए। पाठ्यक्रम चार समास नाम लेकर माँगता है — द्वन्द्व, द्विगु, कर्मधारय, बहुब्रीहि — और इनमें दो तो तत्पुरुष के ही उपभेद हैं। बिना यह जाने कि तत्पुरुष में दूसरा पद प्रधान होता है, आप द्विगु और कर्मधारय को ठीक से समझ ही नहीं सकते। इतना जान लेना काफ़ी है कि चारों मुख्य भेद किस कसौटी के चार उत्तर हैं; उनके उपभेद और उदाहरण रटने की ज़रूरत नहीं।

क्योंकि वाच्य क्रिया के रूप से नहीं, अर्थ से तय होता है — और गुरु जी ने ठीक इसी वाक्य पर टिप्पणी लिखी है। उनका वाक्य है: 'इसमें कर्म की प्रधानता नहीं है, किंतु कर्ता की है। इसलिए यह रचना रूप के अनुसार कर्मवाच्य होने पर भी अर्थ के अनुसार कर्तृवाच्य है।' वाक्य बात लड़के के बारे में कर रहा है, पुस्तक के बारे में नहीं। सच्चा कर्मवाच्य तब बनेगा जब आप कहें 'लड़के से पुस्तक पढ़ी गई' — तब कर्ता पीछे हट जाता है।

पहले क्रिया देखिए, वाक्य नहीं। भाववाच्य की क्रिया हमेशा अकर्मक होती है — वाक्य में कोई कर्म होता ही नहीं। कर्मवाच्य में कर्म ज़रूर मौजूद रहता है, और वही उद्देश्य बन जाता है। दूसरी पहचान अर्थ की है: गुरु जी के अनुसार भाववाच्य 'बहुधा अशक्तता के अर्थ में आती है', इसलिए 'मुझसे चला नहीं जाता' या 'लड़के से बोलते नहीं बनता' जैसे असमर्थता वाले वाक्य लगभग हमेशा भाववाच्य होते हैं।

दोनों हो सकते हैं, और यही इस शब्द को इतना उपयोगी बनाता है। यदि विग्रह 'पीत है जो अंबर' करें तो अर्थ हुआ पीला वस्त्र, और अर्थ समस्त पद के भीतर ही रहा — यह कर्मधारय है। यदि विग्रह 'पीत है अंबर जिसका' करें तो अर्थ हुआ विष्णु, और अर्थ बाहर किसी तीसरे की ओर चला गया — यह बहुब्रीहि है। इसलिए प्रश्न में जो विग्रह या अर्थ दिया हो, उत्तर उसी से चुनिए। किसी एक उत्तर को रट लेना यहीं गलत करा देता है।

नाम में ही उत्तर है। तत्सम = तत् + सम, 'उसके समान' — यानी संस्कृत का शब्द जैसा का तैसा। तद्भव = तत् + भव, 'उससे उत्पन्न' — यानी संस्कृत से बिगड़कर बना। व्यावहारिक जाँच यह है कि तत्सम शब्दों में प्रायः क्ष, त्र, ज्ञ, ऋ, ष जैसे कठिन वर्ण और संयुक्त व्यंजन मिलते हैं, जबकि तद्भव शब्द बोलने में सरल हो चुके होते हैं। 'क्षेत्र' कठिन है और 'खेत' सरल, इसलिए पहला तत्सम और दूसरा तद्भव।

कक्षा-10 की व्याकरण-सूची के लिए नहीं। पाठ्यक्रम शब्द रचना के तत्वों में केवल तीन चीज़ें गिनाता है — उपसर्ग, समास, और तद्भव-तत्सम एवं पर्यायवाची। इसके बाद अलग से वाक्य का स्वरूप, वाच्य और पद परिचय हैं। संधि, प्रत्यय, विलोम, अनेकार्थी और मुहावरे इस सूची में कहीं नहीं हैं। गाइडें इन्हें साथ पढ़ाती हैं क्योंकि वे कई बोर्डों के लिए एक ही किताब छापती हैं — पर आपका प्रश्नपत्र यह सूची ही पूछेगा।

नहीं। पाठ्यक्रम की पंक्ति सीमित है — 'पद परिचय — विकारी एवं अविकारी शब्द', और वह एक अंक का बहुविकल्पीय प्रश्न है। यानी आपसे इतना ही पूछा जाएगा कि दिया गया शब्द विकारी है या अविकारी, या फिर चारों में से कौन-सा किस वर्ग में आता है। पूरा पद परिचय — लिंग, वचन, कारक, क्रिया से अन्वय — इस स्तर पर नहीं माँगा जाता। चार विकारी और चार अविकारी नाम याद रखिए, और बहुवचन बनाकर जाँचना सीख लीजिए।
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Last reviewed on 4 September 2026. Written and reviewed by subject-matter experts — read about our process.
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