हिन्दी व्याकरण — उपसर्ग, समास, वाक्य, वाच्य और पद परिचय
"हिंदी-व्याकरणों के 'कर्तृप्रधान', 'कर्मप्रधान' और 'भावप्रधान' शब्द भ्रामक होने के कारण इस पुस्तक में छोड़ दिए गए हैं।" — कामताप्रसाद गुरु, हिंदी व्याकरण, वाच्य-प्रकरण
1. सात अंक, और वे कहाँ से आते हैं
पाठ्यक्रम की इकाईवार तालिका में यूनिट 4 (ii) — व्याकरण, 07 अंक लिखा है। ये सात अंक प्रश्नपत्र में कहाँ हैं, यह खण्ड-अ की सूची से ठीक-ठीक मिल जाता है।
| खण्ड-अ प्रश्न | विषय | अंक |
|---|---|---|
| 4 | हिन्दी व्याकरण — उपसर्ग, समास, तद्भव-तत्सम एवं पर्यायवाची | 3×1=3 |
| 5 | संस्कृत व्याकरण — सर्वनाम तद्, युष्मद् | 1×1=1 |
| 6 | वाक्य का स्वरूप | 1×1=1 |
| 7 | वाच्य — प्रयोग और वाच्य परिवर्तन | 1×1=1 |
| 8 | पद परिचय — विकारी एवं अविकारी शब्द | 1×1=1 |
| योग | 7 |
जोड़ ठीक सात बैठता है। यह अध्याय इनमें से छह अंक का है — प्रश्न 5 का संस्कृत व्याकरण संस्कृत खण्ड के साथ पढ़ना ठीक रहता है।
तीन बातें इससे तुरंत निकलती हैं।
- सातों प्रश्न बहुविकल्पीय हैं। कहीं परिभाषा लिखनी नहीं है, केवल पहचाननी है।
- सातों खण्ड-अ में हैं, यानी ओ0एम0आर0 शीट पर।
- व्याकरण पर वर्णनात्मक प्रश्न एक भी नहीं है। जो समय लंबे उत्तर रटने में जाता, वह बचा हुआ है।
स्रोत के बारे में। आगे जो परिभाषाएँ उद्धरण चिह्नों में हैं, वे कामताप्रसाद गुरु के हिंदी व्याकरण (नागरी प्रचारिणी सभा, काशी) से हैं। हिन्दी की मानक व्याकरण-परिभाषाएँ इसी ग्रंथ से चली हैं, इसलिए जहाँ गाइडों में मतभेद दिखे, वहाँ यही ग्रंथ प्रमाण है।
2. उपसर्ग — शब्द के आगे लगकर अर्थ बदलने वाले
उपसर्ग वे शब्दांश हैं जो किसी शब्द के आगे लगकर उसका अर्थ बदल देते हैं। पाठ्यक्रम ग्यारह उपसर्ग नाम लेकर गिनाता है — अ, अन्, अधि, अप, अनु, उप, सह, निर, अभि, परि, सु — और अंत में 'इत्यादि' लगाता है।
गुरु जी की सूची से, अर्थ और उदाहरण सहित —
| उपसर्ग | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| अ | अभाव, निषेध | अगम, अज्ञान, अधर्म, अनीति, अलौकिक, अव्यय |
| अन् | वही अर्थ, स्वर से पहले | अनन्तर, अनिष्ट, अनादि, अनायास, अनेक |
| अधि | ऊपर, श्रेष्ठ | अधिकरण, अधिकार, अधिराज, अध्यात्म |
| अनु | पीछे, समान | अनुकरण, अनुक्रम, अनुज, अनुताप, अनुशासन |
| अप | बुरा, हीन, विरुद्ध | अपकीर्ति, अपमान, अपराध, अपशब्द, अपहरण |
| अभि | ओर, पास, सामने | अभिप्राय, अभिमुख, अभिमान, अभिलाषा, अभ्यास |
| उप | निकट, सदृश, गौण | उपकार, उपदेश, उपनाम, उपभेद, उपवन, उपवेद |
| निर्, निस् | बाहर, निषेध | निराकरण, निर्गम, निःशंक, निरपराध, निर्भय, निर्दोष |
| परि | आसपास, चारों ओर, पूर्ण | परिक्रमा, परिजन, परिणाम, परिधि, परिपूर्ण, परिवर्तन |
| सु | अच्छा, सहज, अधिक | सुकर्म, सुगम, सुलभ, सुशिक्षित, स्वागत |
| सम् | अच्छा, साथ, पूर्ण | संकल्प, संगम, संग्रह, संतोष, संयोग, संस्कार |
'अ' और 'अन्' एक ही उपसर्ग हैं। गुरु जी का नियम साफ़ है — स्वर से शुरू होने वाले शब्दों के आगे 'अ' के स्थान पर 'अन्' हो जाता है। अ + नीति = अनीति, पर अन् + आदि = अनादि। इसीलिए पाठ्यक्रम दोनों को अलग-अलग गिनाता है।
'निर्' हिन्दी में प्रायः 'नि' हो जाता है। गुरु जी की टिप्पणी है कि यह उपसर्ग हिन्दी में बहुधा 'नि' बन जाता है — निधड़क, निडर, निवृत्त। इसीलिए 'निडर' का उपसर्ग पूछा जाए तो उत्तर निर् है, 'नि' नहीं।
दो-तीन उपसर्ग एक साथ भी आते हैं — निराकरण (निर् + आ + करण), प्रत्युपकार (प्रति + उप + कार), समालोचना। ऐसा शब्द विकल्प में दिखे तो उसे कठिन मानकर छोड़िए नहीं; भीतर के उपसर्ग अलग करके देखिए।
3. समास — कौन-सा पद प्रधान है, यही पूरा प्रश्न है
समास का पूरा वर्गीकरण एक ही कसौटी पर टिका है, और गुरु जी उसे एक वाक्य में कह देते हैं —
"जिन दो शब्दों में समास होता है उनकी प्रधानता अथवा अप्रधानता के विभाग-तत्त्व पर ये भेद किए गए हैं।"
3.1 चार मुख्य भेद — गुरु जी के शब्दों में
| भेद | कसौटी | गुरु जी का वाक्य |
|---|---|---|
| अव्ययीभाव | पहला पद प्रधान | "जिस समास में पहला शब्द प्रायः प्रधान होता है" |
| तत्पुरुष | दूसरा पद प्रधान | "जिस समास में दूसरा शब्द प्रधान रहता है" |
| द्वन्द्व | दोनों प्रधान | "जिसमें दोनों पद प्रधान होते हैं वह द्वन्द्व कहलाता है" |
| बहुब्रीहि | कोई प्रधान नहीं | "जिसमें कोई भी शब्द प्रधान नहीं होता उसे बहुब्रीहि कहते हैं" |
3.2 पाठ्यक्रम के चार — और उनमें छिपा जाल
पाठ्यक्रम की पंक्ति है: "समास — द्वन्द्व, द्विगु, कर्मधारय, बहुब्रीहि"।
इसे ध्यान से देखिए। ये मुख्य चार भेद नहीं हैं। द्वन्द्व और बहुब्रीहि मुख्य भेद हैं, पर द्विगु और कर्मधारय तत्पुरुष के उपभेद हैं। अव्ययीभाव और सामान्य तत्पुरुष पाठ्यक्रम में नाम लेकर नहीं आते।
| समास | पहचान | उदाहरण | विग्रह |
|---|---|---|---|
| द्वन्द्व | दोनों पद प्रधान; विग्रह में 'और' आता है | माता-पिता, रात-दिन, राजा-रानी | माता और पिता |
| द्विगु | पहला पद संख्यावाचक, समूह का बोध | त्रिलोक, नवरत्न, चौराहा, पंचवटी | तीन लोकों का समूह |
| कर्मधारय | पहला पद विशेषण, दूसरा विशेष्य | नीलकमल, महात्मा, पीतांबर | नीला है जो कमल |
| बहुब्रीहि | दोनों पद छोड़कर तीसरा ही अर्थ निकले | दशानन, पीतांबर, चक्रधर | दस हैं आनन जिसके — रावण |
द्विगु और कर्मधारय में अंतर करने का एक ही सवाल पूछिए — पहला पद गिनती है या गुण? गिनती हो तो द्विगु, गुण हो तो कर्मधारय। 'त्रिलोक' में 'त्रि' गिनती है, 'नीलकमल' में 'नील' गुण है।
कर्मधारय और बहुब्रीहि का जाल — 'पीतांबर'। यह शब्द दोनों तालिकाओं में जान-बूझकर रखा गया है, क्योंकि यह दोनों हो सकता है।
- कर्मधारय मानें तो विग्रह होगा पीत है जो अंबर — अर्थ हुआ पीला वस्त्र। अर्थ पद के भीतर ही है।
- बहुब्रीहि मानें तो विग्रह होगा पीत है अंबर जिसका — अर्थ हुआ विष्णु। अर्थ पद से बाहर चला गया।
यही बहुब्रीहि की असली पहचान है: अर्थ समस्त पद से बाहर किसी तीसरे की ओर जाता है। 'दशानन' का अर्थ 'दस मुँह' नहीं, रावण है।
4. तत्सम, तद्भव और पर्यायवाची
तत्सम का अर्थ है तत् + सम — 'उसके समान', यानी संस्कृत जैसा का तैसा। तद्भव का अर्थ है तत् + भव — 'उससे उत्पन्न', यानी संस्कृत से बिगड़कर बना।
| तत्सम | तद्भव | तत्सम | तद्भव |
|---|---|---|---|
| अग्नि | आग | दुग्ध | दूध |
| हस्त | हाथ | कर्ण | कान |
| सूर्य | सूरज | गृह | घर |
| क्षेत्र | खेत | मयूर | मोर |
| सर्प | साँप | अश्रु | आँसू |
| कार्य | काज | मृत्यु | मौत |
पहचानने का व्यावहारिक तरीका। तत्सम शब्द प्रायः संयुक्त व्यंजन और विसर्ग-ऋ जैसे कठिन वर्ण रखते हैं — क्ष, त्र, ज्ञ, ऋ, ष। तद्भव शब्द बोलने में सरल हो चुके होते हैं। 'क्षेत्र' कठिन है, 'खेत' सरल — इसलिए पहला तत्सम, दूसरा तद्भव।
पर्यायवाची समान अर्थ वाले शब्द हैं। परीक्षा में जिन शब्दों के पर्यायवाची सबसे अधिक पूछे जाते हैं, वे प्रकृति और देवताओं से जुड़े हैं —
| शब्द | पर्यायवाची |
|---|---|
| सूर्य | रवि, भानु, दिनकर, दिवाकर, आदित्य, प्रभाकर |
| चन्द्रमा | शशि, सुधाकर, राकेश, निशाकर, मयंक, इंदु |
| जल | नीर, वारि, पानी, सलिल, अंबु, तोय |
| अग्नि | पावक, अनल, कृशानु, वह्नि, हुताशन |
| पृथ्वी | धरा, धरती, वसुधा, भूमि, अवनि, मही |
| कमल | पंकज, जलज, सरोज, नीरज, अरविंद, राजीव |
एक जोड़ ध्यान रखिए। पद्य खण्ड में सूरदास, तुलसीदास और बिहारी हैं — इन्हीं कवियों की भाषा में ये पर्यायवाची भरे पड़े हैं। पद्यांश पढ़ते समय जो शब्द मिलें, उन्हें यहीं जोड़ते जाइए। दोनों यूनिट एक साथ तैयार होंगी।
5. वाक्य का स्वरूप
"एक विचार पूर्णता से प्रकट करने वाले शब्द-समूह को वाक्य कहते हैं।" — गुरु जी की परिभाषा इतनी ही है।
हर वाक्य के दो अवयव होते हैं —
- उद्देश्य — "जिस वस्तु के विषय में कुछ कहा जाता है उसे सूचित करने वाले शब्द"
- विधेय — "उद्देश्य के विषय में जो विधान किया जाता है उसे सूचित करने वाले शब्द"
'आत्मा अमर है' में आत्मा उद्देश्य है और अमर है विधेय।
रचना के अनुसार वाक्य तीन प्रकार के होते हैं — और यही एक अंक का प्रश्न है।
| प्रकार | गुरु जी की पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|
| साधारण | "एक उद्देश्य और एक विधेय" | आज बहुत पानी गिरा। बिजली चमकती है। |
| मिश्र | मुख्य के अतिरिक्त एक या अधिक आश्रित उपवाक्य | जब लड़का पाँच बरस का हुआ, तब पिता ने उसे मदरसे भेजा। |
| संयुक्त | दो या अधिक स्वतंत्र उपवाक्य, योजक से जुड़े | वह आया और बैठ गया। |
मिश्र और संयुक्त अलग करने का एक ही सवाल। जोड़ने वाला शब्द देखिए। जब-तब, जो-वह, यदि-तो, क्योंकि, कि — ये आश्रित उपवाक्य बनाते हैं, इसलिए वाक्य मिश्र है। और, तथा, परंतु, किंतु, या, अथवा — ये स्वतंत्र उपवाक्य जोड़ते हैं, इसलिए वाक्य संयुक्त है।
6. वाच्य — और वह जाल जो हर गाइड में है
वाच्य क्रिया का वह रूपांतर है जिससे पता चलता है कि वाक्य में कर्ता, कर्म या भाव — किसकी प्रधानता है।
गुरु जी की परिभाषाएँ —
कर्तृवाच्य — "क्रिया के उस रूपांतर को कहते हैं जिससे जाना जाता है कि वाक्य का उद्देश्य क्रिया का कर्ता है; जैसे, लड़का दौड़ता है, लड़का पुस्तक पढ़ता है।"
भाववाच्य — "क्रिया बहुधा अशक्तता के अर्थ में आती है; जैसे, यहाँ कैसे बैठा जाएगा। लड़के से चला नहीं जाता।"
भाववाच्य की सबसे भरोसेमंद पहचान यही 'अशक्तता' है। 'मुझसे चला नहीं जाता' का अर्थ है मैं चल नहीं सकता। जहाँ वाक्य असमर्थता या विवशता कह रहा हो और क्रिया अकर्मक हो, वहाँ भाववाच्य है।
6.1 वह जाल जिस पर गुरु जी ने अलग से टिप्पणी लिखी
वाक्य लीजिए: 'लड़के ने पुस्तक पढ़ी।'
यहाँ 'पढ़ी' क्रिया का लिंग-वचन 'पुस्तक' (कर्म) के अनुसार है, कर्ता के अनुसार नहीं। इसीलिए इसे बहुत लोग कर्मवाच्य कह देते हैं। गुरु जी इस पर पूरी टिप्पणी लिखते हैं —
"इसमें कर्म की प्रधानता नहीं है, किंतु कर्ता की है। इसलिए यह रचना रूप के अनुसार कर्मवाच्य होने पर भी अर्थ के अनुसार कर्तृवाच्य है।"
नियम यह बना। वाच्य का निर्णय अर्थ से कीजिए, क्रिया के रूप से नहीं। पूछिए — वाक्य किसके बारे में बात कर रहा है? यदि कर्ता के, तो कर्तृवाच्य, चाहे क्रिया कर्म से मिल रही हो।
6.2 वाच्य परिवर्तन
पाठ्यक्रम में 'वाच्य परिवर्तन' अलग से लिखा है, इसलिए दोनों दिशाओं का ढाँचा याद रखिए।
| से | को | क्या बदलता है |
|---|---|---|
| कर्तृवाच्य | कर्मवाच्य | कर्ता के साथ से / के द्वारा लगेगा, कर्म उद्देश्य बनेगा, क्रिया के साथ जाना जुड़ेगा |
| कर्मवाच्य | कर्तृवाच्य | 'से/के द्वारा' हटेगा, कर्ता उद्देश्य बनेगा, 'जाना' हटेगा |
| कर्तृवाच्य | भाववाच्य | क्रिया अकर्मक हो, कर्ता के साथ 'से', और अर्थ असमर्थता का बने |
उदाहरण — राम पत्र लिखता है (कर्तृवाच्य) → राम से पत्र लिखा जाता है (कर्मवाच्य)। मैं चलता हूँ (कर्तृवाच्य) → मुझसे चला जाता है (भाववाच्य)।
7. पद परिचय — विकारी और अविकारी
पद परिचय का अर्थ है वाक्य में आए किसी शब्द का पूरा व्याकरणिक परिचय देना। पर पाठ्यक्रम इसे एक ही बिंदु तक सीमित रखता है: विकारी एवं अविकारी शब्द।
विकारी वे शब्द हैं जिनका रूप बदलता है — लिंग, वचन, कारक, काल के अनुसार। अविकारी (जिन्हें अव्यय भी कहते हैं) वे हैं जिनका रूप कभी नहीं बदलता।
यह विभाजन गुरु जी के ग्रंथ की अपनी संरचना है, कोई बाद की सुविधा नहीं। उनकी विषय-सूची में शब्दों के वर्गीकरण के नीचे सीधे 'पहला खंड — विकारी शब्द' (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया) और 'दूसरा खंड — अव्यय' (क्रियाविशेषण, संबंधसूचक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक) लिखा है।
याद रखने का सबसे तेज़ तरीका। चारों विकारी शब्दों का बहुवचन या स्त्रीलिंग बनाकर देखिए। बन जाए तो विकारी। 'और' का बहुवचन नहीं बनता, 'लड़का' का बनता है — इसलिए 'और' अविकारी और 'लड़का' विकारी।
सारांश
- यूनिट 4 (ii) व्याकरण के 7 अंक खण्ड-अ के प्रश्न 4 से 8 तक हैं; सब बहुविकल्पीय, कोई वर्णनात्मक प्रश्न नहीं।
- इनमें 6 अंक हिन्दी व्याकरण के हैं, 1 अंक संस्कृत व्याकरण का।
- उपसर्ग शब्द के आगे लगकर अर्थ बदलते हैं; पाठ्यक्रम ग्यारह नाम लेकर गिनाता है।
- 'अ' स्वर से पहले 'अन्' हो जाता है — अनीति, पर अनादि।
- 'निर्' हिन्दी में प्रायः 'नि' बन जाता है — निडर का उपसर्ग निर् है, नि नहीं।
- समास का पूरा वर्गीकरण एक ही कसौटी पर है — कौन-सा पद प्रधान है।
- पहला प्रधान = अव्ययीभाव, दूसरा = तत्पुरुष, दोनों = द्वन्द्व, कोई नहीं = बहुब्रीहि।
- पाठ्यक्रम में केवल चार हैं — द्वन्द्व, द्विगु, कर्मधारय, बहुब्रीहि — और इनमें द्विगु तथा कर्मधारय तत्पुरुष के उपभेद हैं।
- द्विगु में पहला पद गिनती है, कर्मधारय में गुण — यही एक सवाल दोनों अलग कर देता है।
- बहुब्रीहि की पहचान यह है कि अर्थ समस्त पद से बाहर तीसरे की ओर जाता है — दशानन यानी रावण।
- 'पीतांबर' कर्मधारय भी है और बहुब्रीहि भी — विग्रह बदलते ही अर्थ पीला वस्त्र से विष्णु हो जाता है।
- तत्सम = संस्कृत जैसा का तैसा; तद्भव = संस्कृत से बिगड़कर बना।
- तत्सम में प्रायः क्ष, त्र, ज्ञ, ऋ, ष जैसे कठिन वर्ण मिलते हैं; तद्भव बोलने में सरल होते हैं।
- वाक्य एक विचार पूर्णता से प्रकट करने वाला शब्द-समूह है; इसके दो अवयव उद्देश्य और विधेय हैं।
- रचना के अनुसार वाक्य तीन प्रकार के हैं — साधारण, मिश्र, संयुक्त।
- जब-तब, जो-वह, यदि-तो, क्योंकि, कि से मिश्र वाक्य बनता है; और, तथा, परंतु, या से संयुक्त।
- कर्तृवाच्य में वाक्य का उद्देश्य ही क्रिया का कर्ता होता है।
- कर्मवाच्य में कर्म उद्देश्य बन जाता है और कर्ता के साथ 'से' या 'के द्वारा' आता है।
- भाववाच्य प्रायः अशक्तता के अर्थ में आता है और उसकी क्रिया अकर्मक होती है।
- 'लड़के ने पुस्तक पढ़ी' रूप से कर्मवाच्य दिखता है पर अर्थ से कर्तृवाच्य है — निर्णय अर्थ से कीजिए, रूप से नहीं।
- गुरु जी ने 'कर्तृप्रधान, कर्मप्रधान, भावप्रधान' नाम भ्रामक मानकर अपने ग्रंथ से हटा दिए।
- विकारी शब्द चार हैं — संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया; इनका रूप बदलता है।
- अविकारी या अव्यय चार हैं — क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक।
- बहुवचन या स्त्रीलिंग बन जाए तो शब्द विकारी है, न बने तो अविकारी।
परिशिष्ट — क्या इस अध्याय का नहीं है
व्याकरण की तैयारी में सबसे अधिक समय उन विषयों पर लग जाता है जो कक्षा-10 के पाठ्यक्रम में हैं ही नहीं। पाठ्यक्रम की सूची छोटी है — उससे बाहर मत जाइए।
| विषय | स्थिति |
|---|---|
| संधि और संधि-विच्छेद | पाठ्यक्रम की व्याकरण-सूची में नहीं |
| कारक और उसकी विभक्तियाँ | सूची में नहीं (वाच्य के भीतर काम आता है) |
| प्रत्यय — संस्कृत, हिन्दी, उर्दू | सूची में नहीं; केवल उपसर्ग है |
| अव्ययीभाव और तत्पुरुष समास | नाम लेकर नहीं; पर पहचानने के लिए जानना पड़ता है |
| विलोम शब्द, अनेकार्थी, मुहावरे | सूची में नहीं; केवल पर्यायवाची है |
| लिंग, वचन, काल के नियम | सूची में नहीं |
| रस, अलंकार, छन्द | यूनिट 2 (iv) — काव्य सौन्दर्य के तत्व |
| सर्वनाम तद्, युष्मद् | खण्ड-अ प्रश्न 5 — संस्कृत व्याकरण, हिन्दी नहीं |
एक चेतावनी। 'प्रत्यय' सूची में नहीं है, पर 'उपसर्ग' है — और गाइडें दोनों को साथ पढ़ाती हैं। जो समय प्रत्यय पर लगेगा वह इस प्रश्नपत्र में लौटकर नहीं आएगा। उसे समास पर लगाइए, जहाँ से प्रश्न निश्चित रूप से आता है।
