हिन्दी पद्य साहित्य का विकास — रीतिकाल एवं आधुनिक काल
"प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।" — आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, 'काल विभाग' का पहला वाक्य
1. इस अध्याय में क्या है
यह पूरा अध्याय यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी, यूनिट 2 (i) है। पाठ्यक्रम की पंक्ति शब्दशः यह है —
"हिन्दी पद्य के विकास का संक्षिप्त परिचय (रीतिकाल एवं आधुनिककाल) — 5×1=5"
तीन बातें इस एक पंक्ति में छिपी हैं, और तीनों परीक्षा में काम आती हैं।
| पाठ्यक्रम कहता है | इसका अर्थ |
|---|---|
| केवल दो काल | आदिकाल और भक्तिकाल कक्षा-10 के पद्य-इतिहास में नहीं हैं |
| 5×1=5 | पाँच प्रश्न, हर एक 1 अंक का, सब बहुविकल्पीय — खण्ड-अ में, ओ0एम0आर0 शीट पर |
| "संक्षिप्त परिचय" | कवि-कृति-काल का ढाँचा पूछा जाता है, आलोचना नहीं |
अध्याय का क्रम यह है —
| भाग | विषय |
|---|---|
| 2 | शुक्ल जी ने काल बाँटे किस आधार पर |
| 3 | चारों काल और उनकी सीमाएँ |
| 4-7 | रीतिकाल — नामकरण, आरंभ, तीन धाराएँ, प्रमुख कवि |
| 8 | शुक्ल जी की वह आलोचना जो प्रायः छूट जाती है |
| 9-11 | आधुनिक काल — तीन उत्थान, द्विवेदी युग, छायावाद |
| 12 | छायावाद के बाद — और वह सीमा जहाँ शुक्ल जी की पुस्तक समाप्त होती है |
एक बात पहले ही स्पष्ट कर दें। आगे जहाँ भी उद्धरण चिह्नों में वाक्य आया है, वह शुक्ल जी का अपना वाक्य है, उनके ग्रंथ हिन्दी साहित्य का इतिहास (नागरी प्रचारिणी सभा, काशी) से। जहाँ बात उनके ग्रंथ के बाहर की है, वहाँ ऐसा लिखा गया है।
2. काल बाँटने का आधार — चित्तवृत्ति
अधिकांश पुस्तकें सीधे चार कालों के नाम गिना देती हैं। शुक्ल जी पहले यह बताते हैं कि बाँटा किस आधार पर जाए, और वही उनका पूरा सिद्धांत है।
"जनता की चित्तवृत्ति बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, सांप्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है।"
इससे तीन बातें निकलती हैं —
- साहित्य बदलता है क्योंकि जनता की चित्तवृत्ति बदलती है।
- चित्तवृत्ति बदलती है क्योंकि परिस्थिति बदलती है।
- इसलिए इतिहास लिखते समय परिस्थिति का "किंचित् दिग्दर्शन भी साथ ही साथ आवश्यक होता है।"
और नाम कैसे पड़ा? शुक्ल जी का नियम सीधा है — जिस काल में जिस प्रकार की रचना सबसे अधिक हुई, नाम उसी पर। पर वे तुरंत एक चेतावनी भी जोड़ते हैं, और यही चेतावनी परीक्षा में सबसे अधिक भुलाई जाती है —
"यह न समझना चाहिए कि किसी विशेष काल में और प्रकार की रचनाएँ होती ही नहीं थीं।"
रीतिकाल में भी वीर रस के काव्य मिलते हैं। भूषण उसी रीतिकाल के कवि हैं। नाम प्रधान प्रवृत्ति का सूचक है, सीमा-रेखा नहीं।
3. चार काल — सीमाएँ याद रखने योग्य
शुक्ल जी हिन्दी साहित्य के लगभग 900 वर्षों को चार कालों में बाँटते हैं। संवत् उनके ग्रंथ के हैं; ईस्वी वर्ष संवत् − 57 से निकलता है।
| काल | दूसरा नाम | संवत् | ईस्वी | कक्षा-10 में? |
|---|---|---|---|---|
| आदिकाल | वीरगाथाकाल | 1050–1375 | 993–1318 | नहीं |
| पूर्व मध्यकाल | भक्तिकाल | 1375–1700 | 1318–1643 | नहीं |
| उत्तर मध्यकाल | रीतिकाल | 1700–1900 | 1643–1843 | हाँ |
| आधुनिक काल | गद्यकाल | 1900–1984 | 1843–1927 | हाँ |
दो जोड़ी नाम, और दोनों पूछे जाते हैं। "उत्तर मध्यकाल" और "रीतिकाल" एक ही काल के दो नाम हैं — पहला स्थिति बताता है, दूसरा प्रवृत्ति। यही "आधुनिक काल" और "गद्यकाल" के साथ है। प्रश्न किसी भी नाम से आ सकता है।
4. रीतिकाल — नाम क्यों पड़ा
'रीति' का अर्थ यहाँ काव्य-रचना की शास्त्रीय पद्धति है — रस, अलंकार, नायिका-भेद, छंद के लक्षण और उनके उदाहरण। इस काल के कवियों ने कविता लिखने का एक निश्चित ढाँचा बना लिया, और शुक्ल जी उस ढाँचे का वर्णन बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में करते हैं —
"कवियों ने कविता लिखने का यह एक प्रणाली ही बना ली कि पहले दोहे में अलंकार या रस का लक्षण लिखना, फिर उसके उदाहरण के रूप में कवित्त या सवैया लिखना।"
इसी लक्षण-उदाहरण पद्धति के कारण काल का नाम रीतिकाल पड़ा। दो पंक्ति में परिभाषा, फिर उसी का एक सुंदर उदाहरण — पूरे दो सौ वर्ष की कविता इसी साँचे में ढली।
5. रीतिपरंपरा का आरंभ — केशव नहीं, चिन्तामणि
यह इस अध्याय का सबसे अधिक गलत उत्तर दिया जाने वाला प्रश्न है, इसलिए इसे धीरे से पढ़िए।
केशवदास ने सबसे पहले काव्य के सभी अंगों का शास्त्रीय निरूपण किया — इस पर शुक्ल जी को कोई संदेह नहीं —
"इसमें संदेह नहीं कि काव्यशास्त्र का सम्यक् समावेश पहले पहल आचार्य केशव ने ही किया।"
पर परंपरा उनसे नहीं चली। शुक्ल जी की अगली ही पंक्ति यह है —
"केशवदास के उपरांत तत्काल रीतिग्रंथों की परंपरा चली नहीं।"
रीतिग्रंथों की अखंड परंपरा आरंभ हुई केशव के लगभग पचास वर्ष बाद, चिन्तामणि त्रिपाठी से, संवत् 1700 के आसपास। शुक्ल जी के शब्दों में परंपरा "चिन्तामणि त्रिपाठी से चली" और "आरंभ उन्हीं से मानना चाहिए।"
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| काव्यांग निरूपण सबसे पहले किसने किया? | केशवदास |
| रीतिग्रंथों की अखंड परंपरा किससे आरंभ हुई? | चिन्तामणि त्रिपाठी |
| दोनों के बीच कितना अंतर? | लगभग 50 वर्ष |
और परंपरा केशव के आदर्श पर चली भी नहीं। शुक्ल जी कहते हैं वह चली "एक भिन्न आदर्श को लेकर, केशव के आदर्श को लेकर नहीं।" कारण यह है, और यह सूक्ष्म है —
- केशव ने सामग्री ली संस्कृत के पुराने आचार्यों से — भामह और उद्भट — जिनके समय "अलंकार और अलंकार्य का स्पष्ट भेद नहीं हुआ था।"
- बाद के हिन्दी रीतिकार चले परवर्ती ग्रंथों पर — मुख्यतः चंद्रालोक और कुवलयानंद — जहाँ यह भेद हो चुका था।
इसी से शुक्ल जी वह वाक्य लिखते हैं जो पूरे रीतिकाल को एक पंक्ति में समेट देता है —
"इस प्रकार दैवयोग से संस्कृत साहित्यशास्त्र के इतिहास की संक्षिप्त उद्धरणी हिन्दी में हो गई।"
अर्थात् हिन्दी में संस्कृत काव्यशास्त्र का पूरा विकास-क्रम दोबारा, छोटे रूप में, दोहरा दिया गया।
"कठिन काव्य का प्रेत" — एक ज़रूरी सावधानी। बोर्ड के मॉडल प्रश्नपत्र में प्रश्न है कि केशव को 'कठिन काव्य का प्रेत' किसने कहा, और विकल्प हैं रामचन्द्र शुक्ल, ग्रियर्सन, हजारी प्रसाद द्विवेदी, मिश्रबंधु। परीक्षा में उत्तर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अंकित कीजिए — यही सर्वत्र पढ़ाया जाता है।
पर एक बात साफ़ रहनी चाहिए: यह वाक्य शुक्ल जी के हिन्दी साहित्य का इतिहास में नहीं है। दोनों उपलब्ध संस्करणों का पूरा पाठ खोजने पर यह पदबंध एक बार भी नहीं मिलता। उस ग्रंथ में केशव पर उनका निर्णय इन शब्दों में है —
"केशव को कविहृदय नहीं मिला था। उनमें वह सहृदयता और भावुकता न थी।"
अर्थ दोनों का एक ही है — केशव पंडित थे, कवि नहीं — और इसी कारण यह उपाधि शुक्ल जी के नाम के साथ जुड़ गई। पर यदि कोई पूछे कि यह वाक्य उनकी किस पुस्तक के किस पृष्ठ पर है, तो सही उत्तर यह है कि इतिहास में नहीं है, और उसका मूल-स्रोत इस अध्याय के लिए सिद्ध नहीं किया जा सका।
6. रीतिकाल की तीन धाराएँ
रीतिकाल के सब कवि लक्षण-ग्रंथ लिखने वाले नहीं थे। परंपरा से उनके संबंध के आधार पर तीन धाराएँ बनती हैं।
| धारा | पहचान | प्रमुख कवि |
|---|---|---|
| रीतिबद्ध | लक्षण भी लिखा, उदाहरण भी | केशवदास, चिन्तामणि त्रिपाठी, देव, मतिराम, भिखारीदास |
| रीतिसिद्ध | रीति में सिद्ध, पर लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखा | बिहारी लाल, रसनिधि |
| रीतिमुक्त | परंपरा के बंधन से मुक्त, स्वच्छंद प्रेम-काव्य | घनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर |
यह वर्गीकरण शुक्ल जी के ग्रंथ का शब्द नहीं है — 'रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त' नाम बाद के आलोचकों के दिए हुए हैं। पर विभाजन जिस बात पर टिका है — कौन लक्षण-ग्रंथ लिखता है और कौन नहीं — वह शुक्ल जी के विवेचन से सीधा निकलता है, और परीक्षा में यही तीन नाम पूछे जाते हैं।
यहाँ आपके अपने पाठ्यक्रम से एक जोड़ है। कक्षा-10 के पद्य खण्ड में बिहारी लाल की 'भक्ति, नीति' निर्धारित है। बिहारी रीतिसिद्ध धारा के कवि हैं — उन्होंने कोई लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखा, केवल 'सतसई' के दोहे लिखे। इतिहास वाला यह प्रश्न और पद्य खण्ड वाला वह कवि एक ही व्यक्ति हैं।
7. रीतिकाल के प्रमुख कवि और ग्रंथ
| कवि | प्रसिद्ध ग्रंथ | धारा |
|---|---|---|
| केशवदास | कविप्रिया, रसिकप्रिया, रामचंद्रिका | रीतिबद्ध |
| चिन्तामणि त्रिपाठी | कविकुलकल्पतरु, काव्यप्रकाश | रीतिबद्ध |
| बिहारी लाल | बिहारी सतसई | रीतिसिद्ध |
| मतिराम | रसराज, ललितललाम | रीतिबद्ध |
| देव | भावविलास, रसविलास | रीतिबद्ध |
| भूषण | शिवराजभूषण, शिवाबावनी, छत्रसालदशक | वीर रस |
| घनानंद | सुजानहित | रीतिमुक्त |
| पद्माकर | जगद्विनोद, पद्माभरण | रीतिबद्ध |
भूषण को ध्यान से देखिए। वे रीतिकाल के कवि हैं, पर उनका रस वीर है, श्रृंगार नहीं। यही शुक्ल जी की उस चेतावनी का जीवित उदाहरण है कि काल का नाम प्रधान प्रवृत्ति बताता है, सबकी सीमा नहीं।
चिन्तामणि के ग्रंथों पर एक ईमानदार टिप्पणी। शुक्ल जी लिखते हैं कि चिन्तामणि ने "तीन ग्रंथ" लिखे, पर हमारे पास जो प्रति है उसमें तीसरे का नाम स्पष्ट नहीं पढ़ा जा सकता। ऊपर की तालिका में इसीलिए दो ही नाम दिए गए हैं। जो नाम पढ़ा नहीं जा सका, वह यहाँ अनुमान से नहीं भरा गया।
8. शुक्ल जी की आलोचना — कवि थे, आचार्य नहीं
यह भाग अधिकांश पुस्तकों से गायब रहता है, और यही शुक्ल जी का असली योगदान है। उन्होंने रीतिकाल के इन सैकड़ों लक्षण-ग्रंथकारों पर एक कठोर निर्णय दिया —
"हिन्दी में लक्षण-ग्रंथ की परिपाटी पर रचना करने वाले जो सैकड़ों कवि हुए, वे आचार्य कोटि में नहीं आ सकते। वे वास्तव में कवि ही थे। उनमें आचार्यत्व के गुण नहीं थे।"
क्यों नहीं? क्योंकि उन्होंने काव्यांगों का विस्तृत विवेचन नहीं किया, तर्क से खंडन-मंडन नहीं किया, नए सिद्धांत नहीं गढ़े। एक दोहे में अधूरा लक्षण देकर वे कविकर्म में लग जाते थे।
और इसका कारण शुक्ल जी ऐसा देते हैं जो पूरी तरह अप्रत्याशित है —
"इसका कारण यह भी था कि उस समय गद्य का विकास नहीं हुआ था। जो कुछ लिखा जाता था वह पद्य में ही लिखा जाता था। पद्य में किसी बात की सम्यक् मीमांसा या उसपर तर्क-वितर्क हो नहीं सकता।"
इस एक तर्क को समझ लीजिए, क्योंकि यह दोनों कालों को जोड़ देता है —
- रीतिकाल में आलोचना नहीं हो सकी क्योंकि गद्य नहीं था।
- अगला काल गद्यकाल कहलाता है।
रीतिकाल की सबसे बड़ी कमी ही आधुनिक काल की सबसे बड़ी उपलब्धि है। दोनों काल एक ही कारण से आमने-सामने खड़े हैं।
9. आधुनिक काल — गद्यकाल क्यों
आधुनिक काल की सीमा संवत् 1900 से 1984 (1843–1927 ई0) है, और शुक्ल जी ने इसका दूसरा नाम गद्यकाल रखा।
नाम पद्य पर नहीं, गद्य पर पड़ा — इसमें एक विरोधाभास लगता है, पर कारण सीधा है। इस काल की सबसे बड़ी घटना पद्य में कुछ होना नहीं, बल्कि खड़ी बोली गद्य का जन्म और उसका साहित्यिक भाषा बन जाना है। निबंध, नाटक, उपन्यास, आलोचना, पत्र-पत्रिका — ये सब इसी काल में आए। इससे पहले हिन्दी में जो कुछ लिखा जाता था, वह लगभग सारा पद्य में था।
और भाषा भी बदली। रीतिकाल तक काव्य की भाषा ब्रजभाषा थी। आधुनिक काल में कविता धीरे-धीरे खड़ी बोली में आई। यह परिवर्तन एक दिन में नहीं हुआ — शुक्ल जी बताते हैं कि लंबे समय तक दोनों साथ-साथ चलीं।
10. आधुनिक काल के तीन उत्थान
यह अध्याय का सबसे उपयोगी भाग है, और सबसे कम जाना हुआ। शुक्ल जी ने आधुनिक काल को 'युग' में नहीं, उत्थान में बाँटा है।
| उत्थान | संवत् | ईस्वी | बोर्ड का नाम | मुख्य बात |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम | 1925–1950 | 1868–1893 | भारतेंदु युग | खड़ी बोली गद्य का प्रवर्तन |
| द्वितीय | 1950–1975 | 1893–1918 | द्विवेदी युग | कविता खड़ी बोली में आई |
| तृतीय | 1975 से | 1918 से | शुक्ल युग | छायावाद |
यहाँ वह बात है जिसका उत्तर कहीं और नहीं मिलेगा। आपका पाठ्यक्रम गद्य के लिए 'शुक्ल युग तथा शुक्लोत्तर युग' नाम देता है। ये नाम शुक्ल जी ने नहीं रखे।
उनके नाम पर वे बाद के आलोचकों ने रखे — और स्वाभाविक ही है कि कोई अपने नाम पर युग का नाम नहीं रखता। शुक्ल जी की अपनी शब्दावली 'तृतीय उत्थान' है, और वह संवत् 1975 यानी 1918 ई0 से आरंभ होती है। इसीलिए शुक्ल युग की तिथि 1918 से मानी जाती है — तिथि उनकी अपनी दी हुई है, नाम भले न हो।
द्वितीय उत्थान के कवि — शुक्ल जी क्रम से गिनाते हैं: श्रीधर पाठक, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध', महावीर प्रसाद द्विवेदी, और फिर "द्विवेदी मंडल के कवि"। मैथिलीशरण गुप्त इसी द्विवेदी मंडल के कवि हैं — और कक्षा-10 के पद्य खण्ड में उनकी 'भारतमाता का मंदिर यह' निर्धारित है। मॉडल प्रश्नपत्र में सीधा प्रश्न आया है: "मैथिलीशरण गुप्त किस युग से सम्बन्धित हैं?" उत्तर द्विवेदी युग है।
11. छायावाद — शुक्ल जी की दृष्टि से
छायावाद तृतीय उत्थान की प्रधान काव्यधारा है, और मॉडल प्रश्नपत्र में इसकी 'मुख्य विशेषता' सीधे पूछी गई है। इसलिए इसे ठीक से देखिए।
शुक्ल जी छायावाद पर तीन बातें कहते हैं, और तीनों काम की हैं —
पहली — शब्द का प्रयोग ही ढीला रहा। उनके ग्रंथ की विषय-सूची में पंक्ति है: "'छायावाद' शब्द का अनेकार्थी प्रयोग।" यानी अलग-अलग लोगों ने इसे अलग-अलग अर्थ में चलाया।
दूसरी — इसके दो अर्थ हैं, और शुक्ल जी छायावादी कवियों का वर्गीकरण भी इन्हीं दो अर्थों के अनुसार करते हैं —
| अर्थ | आशय |
|---|---|
| संकुचित अर्थ | रहस्यवाद — अज्ञात, अनंत सत्ता के प्रति प्रेम और जिज्ञासा |
| व्यापक अर्थ | काव्य-शैली की वह पद्धति जिसमें भाव चित्रात्मक और लाक्षणिक ढंग से, प्रतीकों के सहारे कहा जाता है |
तीसरी — वे इसे भारतीय काव्य-परंपरा से अलग मानते हैं। उनकी विषय-सूची की पंक्ति है: "भारतीय काव्यधारा से इनका पार्थक्य", और आगे यूरोप के वादों को हिन्दी में चलाने की "अनधिकार चेष्टा" तक कही गई है। शुक्ल जी छायावाद के प्रशंसक नहीं थे — यह जानना आवश्यक है, क्योंकि आज की पुस्तकें छायावाद की प्रशंसा में लिखी जाती हैं।
छायावाद की पहचान — प्रकृति का मानवीकरण, वैयक्तिक अनुभूति की प्रधानता, श्रृंगार का सूक्ष्म और आध्यात्मिक रूप, लाक्षणिक और चित्रमय भाषा, तथा खड़ी बोली का काव्य-भाषा के रूप में पूर्ण विकास।
चार स्तंभ — जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा।
और आपके अपने पाठ्यक्रम से जोड़ लीजिए। कक्षा-10 के पद्य खण्ड में सुमित्रानंदन पंत ('चींटी', 'चन्द्रलोक में प्रथम बार') और महादेवी वर्मा ('हिमालय से', 'वर्षा सुन्दरी के प्रति') निर्धारित हैं। गद्य खण्ड में जयशंकर प्रसाद ('ममता') हैं। छायावाद के चार में से तीन आपकी पाठ्यपुस्तक में हैं — इतिहास वाला यह भाग और आपके पाठ अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं।
12. जहाँ शुक्ल जी की पुस्तक समाप्त होती है
एक सीमा स्पष्ट कर देनी चाहिए, क्योंकि इसे न कहना छात्र को धोखा देना होगा।
शुक्ल जी की पुस्तक संवत् 1984, यानी 1927 ई0 तक ही जाती है। उसके बाद हिन्दी कविता में जो हुआ — प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता — उस पर उनके ग्रंथ में कुछ नहीं है, और हो भी नहीं सकता था।
तो इस अध्याय की सीमा यह है —
| विषय | शुक्ल जी के ग्रंथ में? |
|---|---|
| रीतिकाल का पूरा विवेचन | हाँ, विस्तार से |
| भारतेंदु युग, द्विवेदी युग | हाँ, प्रथम और द्वितीय उत्थान के रूप में |
| छायावाद का प्रारंभ और स्वरूप | हाँ, तृतीय उत्थान में |
| प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता | नहीं — ग्रंथ की सीमा के बाद |
और बोर्ड इससे आगे भी पूछता है। यह मान लेना कि कक्षा-10 में छायावाद तक ही पूछा जाएगा, ठीक नहीं। बोर्ड के अपने मॉडल प्रश्नपत्र का पहला ही प्रश्न है — "'दूसरा सप्तक' प्रकाशित हुआ—" और उसके चार विकल्प हैं 1943, 1951, 1959, 1979। यह प्रयोगवाद है, छायावाद के बाद का, और शुक्ल जी के ग्रंथ से बाहर।
13. सप्तक — चार अंक, चार वर्ष
'सप्तक' अज्ञेय द्वारा संपादित कविता-संकलनों की श्रृंखला है। हर संकलन में सात कवि होते हैं, इसी से नाम 'सप्तक' पड़ा। यही प्रयोगवाद और नई कविता का आरंभ-बिंदु माना जाता है।
| संकलन | प्रकाशन वर्ष |
|---|---|
| तार सप्तक | 1943 |
| दूसरा सप्तक | 1951 |
| तीसरा सप्तक | 1959 |
| चौथा सप्तक | 1979 |
ये चारों वर्ष एक साथ याद कीजिए। मॉडल प्रश्नपत्र में विकल्प ठीक यही चार वर्ष थे — अर्थात् प्रश्न यह जाँचता है कि आपको क्रम याद है या नहीं, न कि कोई एक तिथि। जिस सप्तक का नाम पूछा जाए, उसका क्रमांक गिनिए और तालिका से वर्ष उठाइए।
पर गद्य का 'शुक्लोत्तर युग' इस ग्रंथ के बाहर है — वह यूनिट 1 का विषय है और उसके लिए दूसरे स्रोत चाहिए।
सारांश
- साहित्य "जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब" है — शुक्ल जी के काल-विभाजन का यही आधार है।
- चार काल: आदिकाल (सं0 1050–1375), भक्तिकाल (1375–1700), रीतिकाल (1700–1900), आधुनिक काल (1900–1984)।
- कक्षा-10 के पद्य-इतिहास में केवल अंतिम दो हैं; ईस्वी वर्ष संवत् में से 57 घटाकर मिलता है।
- रीतिकाल का दूसरा नाम उत्तर मध्यकाल; आधुनिक काल का दूसरा नाम गद्यकाल।
- नाम प्रधान प्रवृत्ति का सूचक है — रीतिकाल में भी भूषण जैसे वीर रस के कवि हैं।
- रीतिकाल का नाम लक्षण-उदाहरण पद्धति से पड़ा: दोहे में लक्षण, फिर कवित्त या सवैया में उदाहरण।
- काव्यांग निरूपण पहले केशवदास ने किया, पर अखंड परंपरा लगभग 50 वर्ष बाद चिन्तामणि त्रिपाठी से चली।
- केशव ने भामह-उद्भट से सामग्री ली; बाद के रीतिकार चंद्रालोक और कुवलयानंद पर चले।
- तीन धाराएँ: रीतिबद्ध (केशव, चिन्तामणि, देव, मतिराम), रीतिसिद्ध (बिहारी), रीतिमुक्त (घनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर)।
- शुक्ल जी का निर्णय: ये "वास्तव में कवि ही थे, उनमें आचार्यत्व के गुण नहीं थे।"
- कारण: गद्य विकसित नहीं था, और "पद्य में किसी बात की सम्यक् मीमांसा हो नहीं सकती।"
- आधुनिक काल गद्यकाल कहलाया क्योंकि खड़ी बोली गद्य इसी में जन्मा और साहित्यिक भाषा बना।
- तीन उत्थान: प्रथम सं0 1925–1950 (भारतेंदु), द्वितीय 1950–1975 (द्विवेदी), तृतीय 1975 से (छायावाद)।
- 'शुक्ल युग' नाम बाद का है; शुक्ल जी की अपनी शब्दावली 'तृतीय उत्थान' है, जो 1918 ई0 से आरंभ होती है।
- मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी मंडल के कवि हैं — इसलिए द्विवेदी युग के।
- छायावाद के दो अर्थ: संकुचित में रहस्यवाद, व्यापक में लाक्षणिक-चित्रात्मक शैली।
- छायावाद के चार स्तंभ: प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी — इनमें तीन कक्षा-10 की पाठ्यपुस्तक में हैं।
- शुक्ल जी छायावाद के प्रशंसक नहीं थे; उन्होंने इसे भारतीय काव्यधारा से पृथक् माना।
- उनका ग्रंथ 1927 ई0 पर समाप्त होता है — प्रगतिवाद और प्रयोगवाद उसमें नहीं हैं।
परिशिष्ट — क्या इस अध्याय का नहीं है
कक्षा-10 के पद्य-इतिहास में कई ऐसी बातें पूछी हुई मान ली जाती हैं जो वास्तव में पाठ्यक्रम में हैं ही नहीं। समय बचाइए —
| विषय | कहाँ का है |
|---|---|
| आदिकाल, वीरगाथा काल, पृथ्वीराज रासो | कक्षा-10 के पद्य-इतिहास में नहीं |
| भक्तिकाल की चार शाखाएँ, कबीर, जायसी | कक्षा-10 के पद्य-इतिहास में नहीं |
| भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, शुक्ल युग का गद्य | यूनिट 1 (i) — गद्य साहित्य का इतिहास |
| रस, अलंकार, छन्द के लक्षण | यूनिट 2 (iv) — काव्य सौन्दर्य के तत्व |
| सूरदास, तुलसीदास, बिहारी की कविताएँ | पद्य खण्ड के निर्धारित पाठ, इतिहास नहीं |
| कवियों का विस्तृत जीवन परिचय | खण्ड-ब प्रश्न 6 (ख) — 3+2=5 अंक |
एक अंतर जो बार-बार भ्रम पैदा करता है। 'भक्तिकाल' पद्य-इतिहास में नहीं है, पर सूरदास और तुलसीदास आपके पद्य खण्ड में निर्धारित पाठ हैं। उनकी कविता पढ़नी है और उनका जीवन परिचय भी लिखना है — पर भक्तिकाल का इतिहास खण्ड-अ में नहीं पूछा जाएगा। पाठ अलग, इतिहास अलग।
