संस्कृत व्याकरण — सर्वनाम तद् एवं युष्मद्
"The declension of the first two of these pronouns is the same in all the three genders." — एम0 आर0 काले, A Higher Sanskrit Grammar, अनुच्छेद 133, अस्मद् और युष्मद् के विषय में
1. इस अध्याय में क्या है
यह यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी का सबसे छोटा भाग है — एक अंक — और पाठ्यक्रम की पंक्ति उतनी ही छोटी है —
5. संस्कृत व्याकरण — 1×1=1 सर्वनाम — तद्, युष्मद्।
बस इतना। दो शब्द, एक प्रश्न, एक अंक।
यह अंक कहाँ गिना जाता है। यह संस्कृत खण्ड (यूनिट 3, 14 अंक) का हिस्सा नहीं है। यह यूनिट 4 (ii) व्याकरण के 7 अंकों का हिस्सा है। हिन्दी व्याकरण से 6 अंक आते हैं और यह एक अंक संस्कृत से — दोनों मिलकर 7। जोड़ मिलाइए और आप देखेंगे कि संस्कृत खण्ड के 14 अंक अलग बचे रहते हैं।
| यूनिट 4 (ii) व्याकरण — 7 अंक | अंक |
|---|---|
| हिन्दी व्याकरण (शब्द रचना, वाक्य, वाच्य, पद परिचय) | 6 |
| संस्कृत व्याकरण (सर्वनाम तद्, युष्मद्) | 1 |
एक अंक के लिए इतना क्यों। क्योंकि प्रश्न वह नहीं है जो अधिकांश छात्र मानकर चलते हैं। बोर्ड यह नहीं पूछता कि "तद् के रूप लिखिए।" वह एक रूप देकर उसकी विभक्ति और वचन पूछता है — और कई रूप एक से अधिक विभक्तियों में बिल्कुल एक जैसे होते हैं। यही इस अध्याय का असली विषय है।
2. सर्वनाम, और ये दो ही क्यों
सर्वनाम वह शब्द है जो संज्ञा के स्थान पर आता है। संस्कृत में सर्वनामों की एक निश्चित सूची है, और उसमें तद् (वह), यद् (जो), एतद् (यह), इदम् (यह), अदस् (वह), किम् (क्या), युष्मद् (तू), अस्मद् (मैं) आदि आते हैं।
पाठ्यक्रम ने इनमें से दो चुने हैं, और चुनाव सोच-समझकर है —
- तद् — तीनों लिंगों में अलग-अलग चलता है, इसलिए सबसे अधिक रूप इसी के हैं।
- युष्मद् — तीनों लिंगों में एक ही चलता है, और इसके कई रूपों के दो-दो विकल्प हैं।
अर्थात् एक शब्द लिंग की परीक्षा लेता है और दूसरा विकल्पों की। दोनों मिलकर पूरा सर्वनाम-प्रकरण ढँक लेते हैं।
संबोधन क्यों नहीं। आगे की तालिकाओं में आपको केवल सात विभक्तियाँ मिलेंगी, आठ नहीं। सर्वनामों का संबोधन नहीं होता — 'वह' या 'तू' को पुकारा नहीं जाता। इसलिए विकल्पों में यदि 'संबोधन' दिखे तो वह प्रायः गलत विकल्प है।
3. तद् — तीनों लिंगों की पूरी तालिका
पुल्लिंग
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | सः | तौ | ते |
| द्वितीया | तम् | तौ | तान् |
| तृतीया | तेन | ताभ्याम् | तैः |
| चतुर्थी | तस्मै | ताभ्याम् | तेभ्यः |
| पञ्चमी | तस्मात् | ताभ्याम् | तेभ्यः |
| षष्ठी | तस्य | तयोः | तेषाम् |
| सप्तमी | तस्मिन् | तयोः | तेषु |
स्त्रीलिंग
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | सा | ते | ताः |
| द्वितीया | ताम् | ते | ताः |
| तृतीया | तया | ताभ्याम् | ताभिः |
| चतुर्थी | तस्यै | ताभ्याम् | ताभ्यः |
| पञ्चमी | तस्याः | ताभ्याम् | ताभ्यः |
| षष्ठी | तस्याः | तयोः | तासाम् |
| सप्तमी | तस्याम् | तयोः | तासु |
नपुंसकलिंग
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | तत् | ते | तानि |
| द्वितीया | तत् | ते | तानि |
शेष सब विभक्तियाँ पुल्लिंग जैसी — तेन, तस्मै, तस्मात्, तस्य, तस्मिन् और उनके द्विवचन-बहुवचन ज्यों के त्यों।
4. वह नियम जो पूरी तालिका छोटी कर देता है
इक्कीस-इक्कीस रूप रटना कठिन है। एक नियम याद कर लीजिए और तालिका अपने आप बन जाएगी। काले अपने व्याकरण में यह नियम इस प्रकार देते हैं —
"In other cases they become त … and are declined like nouns in अ except in the Nom. pl., D. Ab. sings., G. pl. and L. sing."
अर्थात् तद्, अ-कारांत संज्ञा (राम, फल) की तरह ही चलता है — केवल पाँच जगह छोड़कर। वे पाँच जगह ये हैं —
| जहाँ अलग है | पुल्लिंग | स्त्रीलिंग |
|---|---|---|
| प्रथमा बहुवचन | ते | ताः |
| चतुर्थी एकवचन | तस्मै | तस्यै |
| पञ्चमी एकवचन | तस्मात् | तस्याः |
| षष्ठी बहुवचन | तेषाम् | तासाम् |
| सप्तमी एकवचन | तस्मिन् | तस्याम् |
और यह नियम केवल तद् का नहीं है। काले जोड़ते हैं — "All pronouns ending in अ are similarly declined." इसीलिए यद् (जो) ठीक इसी साँचे पर चलता है: यः, यौ, ये / यम्, यौ, यान् — केवल आरंभ का अक्षर बदलता है। एक साँचा सीखिए, कई शब्द बन जाते हैं।
5. युष्मद् — एक तालिका, तीनों लिंग
युष्मद् की सबसे बड़ी सुविधा यही है कि लिंग देखना ही नहीं पड़ता। काले का वाक्य ऊपर उद्धृत है — इसका declension तीनों लिंगों में एक ही है।
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | त्वम् | युवाम् | यूयम् |
| द्वितीया | त्वाम्, त्वा | युवाम्, वाम् | युष्मान्, वः |
| तृतीया | त्वया | युवाभ्याम् | युष्माभिः |
| चतुर्थी | तुभ्यम्, ते | युवाभ्याम्, वाम् | युष्मभ्यम्, वः |
| पञ्चमी | त्वत् | युवाभ्याम् | युष्मत् |
| षष्ठी | तव, ते | युवयोः, वाम् | युष्माकम्, वः |
| सप्तमी | त्वयि | युवयोः | युष्मासु |
मोटे अक्षरों वाले रूप अलग हैं। ये छोटे रूप हैं और इनका अपना नियम है, जो अगले भाग में है।
6. छोटे रूप — ते, वाम्, वः
द्वितीया, चतुर्थी और षष्ठी में युष्मद् के दो-दो रूप क्यों हैं? क्योंकि पाणिनि ने इन्हीं तीन विभक्तियों के लिए विकल्प रखा है। काले पाद-टिप्पणी में मूल सूत्र देते हैं —
"युष्मदस्मदोः षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोर्वान्नावौ। बहुवचनस्य वस्नसौ। तेमयावेकवचनस्य। त्वामौ द्वितीयायाः।" — पाणिनि, अष्टाध्यायी VIII. 1. 20–23
सूत्र में ही तीनों विभक्तियों के नाम हैं — षष्ठी, चतुर्थी, द्वितीया। इन तीन के अतिरिक्त कहीं छोटा रूप नहीं आता।
| वचन | छोटा रूप |
|---|---|
| एकवचन | ते (चतुर्थी, षष्ठी) · त्वा (द्वितीया) |
| द्विवचन | वाम् |
| बहुवचन | वः |
और ये सदा नहीं चलते। काले का नियम स्पष्ट है — छोटे रूप तभी अनिवार्य हैं जब अन्वादेश हो, अर्थात् जब उसी वस्तु का दोबारा उल्लेख हो रहा हो जिसका पहले हो चुका है। जहाँ अन्वादेश नहीं, वहाँ छोटा रूप वैकल्पिक है — धाता ते भक्तोऽसि और धाता तव भक्तोऽसि, दोनों चलते हैं।
एक और बात, जो प्रायः नहीं बताई जाती। छोटे रूप वाक्य के आरंभ में कभी नहीं आते। इसलिए यदि किसी वाक्य का पहला शब्द 'ते' या 'वः' हो, तो वह युष्मद् का छोटा रूप नहीं है — वह तद् का कोई रूप होगा।
7. एक रूप, कई विभक्तियाँ — यहीं अंक कटता है
यह इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। संस्कृत में कई रूप एक से अधिक विभक्तियों में बिल्कुल एक जैसे होते हैं। बोर्ड ठीक यही पूछता है।
| रूप | कहाँ-कहाँ | लिंग |
|---|---|---|
| ताभ्याम् | तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी — द्विवचन | स्त्रीलिंग |
| ताभ्यः | चतुर्थी, पञ्चमी — बहुवचन | स्त्रीलिंग |
| ताभ्याम् | तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी — द्विवचन | पुल्लिंग भी |
| तेभ्यः | चतुर्थी, पञ्चमी — बहुवचन | पुल्लिंग |
| तयोः | षष्ठी, सप्तमी — द्विवचन | तीनों लिंग |
| तस्याः | पञ्चमी, षष्ठी — एकवचन | स्त्रीलिंग |
| ते | प्रथमा बहुवचन (पुं0), प्रथमा-द्वितीया द्विवचन (स्त्री0, नपुं0) | तीनों |
| ताः | प्रथमा, द्वितीया — बहुवचन | स्त्रीलिंग |
तो उत्तर कैसे चुनें? विकल्प देखिए। यदि रूप दो विभक्तियों का है और विकल्पों में केवल एक दी गई है, तो वही उत्तर है। बोर्ड जानबूझकर दूसरी विभक्ति विकल्पों में नहीं रखता — क्योंकि तब प्रश्न के दो सही उत्तर हो जाते।
8. लिंग कैसे पहचानें — तद् वाक्य में
तालिका में रूप ढूँढ़ने से पहले यह तय करना पड़ता है कि शब्द किस लिंग का है। वाक्य में यह अपने आप तय हो जाता है, क्योंकि सर्वनाम अपनी संज्ञा के लिंग, वचन और विभक्ति — तीनों में उसके साथ चलता है।
| वाक्य | सर्वनाम | संज्ञा | क्यों यही रूप |
|---|---|---|---|
| सः बालकः पठति। | सः | बालकः (पुं0) | पुल्लिंग, प्रथमा, एकवचन |
| सा बालिका पठति। | सा | बालिका (स्त्री0) | स्त्रीलिंग, प्रथमा, एकवचन |
| तत् फलं मधुरम्। | तत् | फलम् (नपुं0) | नपुंसकलिंग, प्रथमा, एकवचन |
| तस्मै बालकाय पुस्तकं ददाति। | तस्मै | बालकाय | पुल्लिंग, चतुर्थी, एकवचन |
| तस्यै बालिकायै पुस्तकं ददाति। | तस्यै | बालिकायै | स्त्रीलिंग, चतुर्थी, एकवचन |
इसी से एक काम की तरकीब निकलती है। यदि प्रश्न में पूरा वाक्य दिया हो, तो सर्वनाम का लिंग संज्ञा से पहचानिए, फिर उसी लिंग की तालिका में जाइए। और यदि केवल रूप दिया हो — जैसा प्रायः होता है — तो रूप के आरंभ से पहचानिए: ता- से आरंभ हो तो स्त्रीलिंग, ते- या तै- से आरंभ हो तो प्रायः पुल्लिंग।
9. पहचान का अभ्यास — रूप से विभक्ति तक
यही असली कौशल है, इसलिए इसे अभ्यास से पक्का कीजिए। हर पंक्ति में तर्क भी दिया गया है।
| रूप | विभक्ति और वचन | पहचान का तर्क |
|---|---|---|
| तस्मै | चतुर्थी एकवचन (पुं0/नपुं0) | 'स्मै' अंत — यह उन पाँच विशेष स्थानों में से एक है |
| तस्यै | चतुर्थी एकवचन (स्त्री0) | 'स्यै' अंत — स्त्रीलिंग का चतुर्थी चिह्न |
| तेषाम् | षष्ठी बहुवचन (पुं0/नपुं0) | 'षाम्' अंत; स्त्रीलिंग होता तो 'तासाम्' |
| तासु | सप्तमी बहुवचन (स्त्री0) | 'सु' अंत सप्तमी बहुवचन का; 'ता' से स्त्रीलिंग |
| तेषु | सप्तमी बहुवचन (पुं0/नपुं0) | वही 'सु', पर 'ते' से पुल्लिंग |
| तान् | द्वितीया बहुवचन (पुं0) | 'न्' अंत — द्वितीया बहुवचन का चिह्न |
| तानि | प्रथमा/द्वितीया बहुवचन (नपुं0) | 'नि' अंत नपुंसकलिंग बहुवचन का |
| ताभिः | तृतीया बहुवचन (स्त्री0) | 'भिः' तृतीया बहुवचन; 'ता' से स्त्रीलिंग |
| तैः | तृतीया बहुवचन (पुं0/नपुं0) | वही तृतीया बहुवचन, पुल्लिंग रूप |
| युष्माभिः | तृतीया बहुवचन | 'भिः' वही चिह्न, युष्मद् में |
| तुभ्यम् | चतुर्थी एकवचन | युष्मद् का पूर्ण रूप; छोटा रूप 'ते' |
| यूयम् | प्रथमा बहुवचन | युष्मद् की प्रथमा बहुवचन, कोई विकल्प नहीं |
अंत के अक्षर से बहुत कुछ खुलता है। नीचे के चिह्न तद् और युष्मद् दोनों में एक जैसे काम करते हैं, क्योंकि विभक्ति-प्रत्यय सब शब्दों में वही हैं।
| अंत | प्रायः क्या |
|---|---|
| -भ्याम् | द्विवचन (तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी — तीनों) |
| -भ्यः | बहुवचन (चतुर्थी, पञ्चमी) |
| -भिः | तृतीया बहुवचन |
| -सु / -षु | सप्तमी बहुवचन |
| -याम् / -स्मिन् | सप्तमी एकवचन |
| -योः | द्विवचन (षष्ठी, सप्तमी) |
10. बोर्ड का अपना प्रश्न, हल करके
बोर्ड के मॉडल प्रश्नपत्र का प्रश्न 19 शब्दशः यह है —
'ताभ्यः' शब्द में वचन और विभक्ति है— (A) षष्ठी विभक्ति एकवचन (B) सप्तमी विभक्ति द्विवचन (C) षष्ठी विभक्ति बहुवचन (D) चतुर्थी विभक्ति बहुवचन
तीन चरणों में हल कीजिए।
पहला — शब्द पहचानिए। 'ताभ्यः' का आरंभ 'ता' से है, इसलिए यह तद् का स्त्रीलिंग रूप है।
दूसरा — तालिका में खोजिए। स्त्रीलिंग तालिका में 'ताभ्यः' दो जगह है — चतुर्थी बहुवचन और पञ्चमी बहुवचन।
तीसरा — विकल्प मिलाइए। विकल्पों में पञ्चमी है ही नहीं। चतुर्थी बहुवचन है, विकल्प (D) में। उत्तर (D)।
यहाँ दो जाल थे। एक — षष्ठी बहुवचन का रूप 'तासाम्' है, 'ताभ्यः' नहीं; विकल्प (C) इसी भ्रम के लिए है। दो — 'ताभ्याम्' और 'ताभ्यः' देखने में लगभग एक जैसे हैं, पर पहला द्विवचन है और दूसरा बहुवचन। अंतिम अक्षर पर उँगली रखिए: म् हो तो द्विवचन, विसर्ग हो तो बहुवचन।
सारांश
पाठ्यक्रम इस भाग को दो शब्दों तक सीमित रखता है — तद् और युष्मद् — और उसका एक अंक यूनिट 4 (ii) व्याकरण के सात अंकों में गिना जाता है, संस्कृत खण्ड के चौदह में नहीं।
तद् तीनों लिंगों में अलग चलता है। प्रथमा एकवचन में सः, सा और तत्; उसके बाद हर जगह मूल रूप 'त' हो जाता है। पूरी तालिका रटने की आवश्यकता नहीं — यह अ-कारांत संज्ञा की तरह चलता है, केवल पाँच जगह छोड़कर: प्रथमा बहुवचन, चतुर्थी एकवचन, पञ्चमी एकवचन, षष्ठी बहुवचन और सप्तमी एकवचन। वही साँचा यद् पर भी लागू होता है।
युष्मद् तीनों लिंगों में एक ही चलता है, और उसकी द्वितीया, चतुर्थी तथा षष्ठी में छोटे रूप — त्वा, ते, वाम्, वः — मिलते हैं। ये तीन विभक्तियाँ पाणिनि के सूत्र में ही नाम लेकर गिनाई गई हैं, और ये रूप वाक्य के आरंभ में कभी नहीं आते।
पर असली प्रश्न रूप याद करने का नहीं है। बोर्ड एक रूप देकर उसकी विभक्ति और वचन पूछता है, और कई रूप दो-दो जगह आते हैं — ताभ्यः चतुर्थी और पञ्चमी दोनों का बहुवचन है, तयोः षष्ठी और सप्तमी दोनों का द्विवचन, तस्याः पञ्चमी और षष्ठी दोनों का एकवचन। ऐसे प्रश्न में विकल्प देखकर तय कीजिए, और अंतिम अक्षर जाँचिए — म् द्विवचन का चिह्न है, विसर्ग बहुवचन का।
परिशिष्ट — क्या इस अध्याय का नहीं है
पाठ्यक्रम की पंक्ति में केवल दो शब्द हैं, और वही सीमा है। नीचे की बातें संस्कृत व्याकरण की हैं, पर इस एक अंक की नहीं।
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अस्मद् (मैं)। पाठ्यक्रम इसे नहीं माँगता। पर यह युष्मद् का ठीक जुड़वाँ है — वही साँचा, उन्हीं तीन विभक्तियों में छोटे रूप, और पाणिनि का वही सूत्र दोनों को एक साथ नाम लेकर पकड़ता है। युष्मद् याद करते समय अस्मद् मुफ़्त में आ जाता है, इसलिए तालिका यहाँ रख दी गई है।
विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा अहम् आवाम् वयम् द्वितीया माम्, मा आवाम्, नौ अस्मान्, नः तृतीया मया आवाभ्याम् अस्माभिः चतुर्थी मह्यम्, मे आवाभ्याम्, नौ अस्मभ्यम्, नः पञ्चमी मत् आवाभ्याम् अस्मत् षष्ठी मम, मे आवयोः, नौ अस्माकम्, नः सप्तमी मयि आवयोः अस्मासु दोनों को साथ रखकर देखिए तो साँचा एक ही है — जहाँ युष्मद् में त्व/यु/युष्म है वहाँ अस्मद् में अह/आ/अस्म, और जहाँ युष्मद् के छोटे रूप वाम्, वः हैं वहाँ अस्मद् के नौ, नः।
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एतद्, इदम्, अदस्, किम्। ये भी सर्वनाम हैं और इनके रूप तद् से मिलते-जुलते हैं, पर पाठ्यक्रम में नहीं हैं।
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संस्कृत खण्ड के नौ पाठ। वाराणसी, देशभक्तः चन्द्रशेखरः, भारतीयाः संस्कृतिः और शेष — वे यूनिट 3 हैं, 14 अंक के, और उनमें अनुवाद तथा श्लोक आते हैं, व्याकरण नहीं।
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शब्दरूप के अतिरिक्त धातुरूप, सन्धि, समास, कारक। कक्षा-10 हिन्दी के प्रश्नपत्र में संस्कृत व्याकरण से केवल सर्वनाम आता है। समास और उपसर्ग जो पूछे जाते हैं वे हिन्दी व्याकरण के हैं, और उनकी सूची अलग है।
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संबोधन विभक्ति। सर्वनामों का संबोधन नहीं होता, इसलिए तालिकाओं में सात ही विभक्तियाँ हैं।
