By the end of this chapter you'll be able to…

  • 1यह बताना कि संस्कृत व्याकरण का यह एक अंक यूनिट 4 (ii) का है, संस्कृत खण्ड के 14 अंकों का नहीं
  • 2तद् शब्द के तीनों लिंगों की सातों विभक्तियों के रूप लिखना
  • 3युष्मद् के रूप लिखना और यह बताना कि वे तीनों लिंगों में एक ही हैं
  • 4यह नियम बताना कि तद् अ-कारांत संज्ञा की तरह चलता है, केवल पाँच स्थानों को छोड़कर
  • 5उन पाँच अपवाद-स्थानों को नाम लेकर गिनाना
  • 6युष्मद् के छोटे रूप (त्वा, ते, वाम्, वः) और वे किन तीन विभक्तियों में आते हैं, यह बताना
  • 7यह बताना कि छोटे रूप वाक्य के आरंभ में नहीं आते
  • 8किसी दिए हुए रूप की विभक्ति और वचन पहचानना — यही परीक्षा का असली प्रश्न है
  • 9उन रूपों को पहचानना जो एक से अधिक विभक्तियों में एक जैसे हैं — ताभ्याम्, ताभ्यः, तयोः, तस्याः, ते
  • 10अंत के चिह्न से वचन पहचानना — म् द्विवचन का, विसर्ग बहुवचन का
  • 11वाक्य में संज्ञा के लिंग-वचन-विभक्ति से सर्वनाम का रूप तय करना
  • 12यह बताना कि सर्वनामों का संबोधन नहीं होता, इसलिए विभक्तियाँ सात ही हैं
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Why this chapter matters
एक अंक, एक प्रश्न — और वह प्रश्न रूप याद करने का नहीं होता। बोर्ड 'ताभ्यः' जैसा कोई रूप देकर उसकी विभक्ति और वचन पूछता है, और कई रूप दो-दो विभक्तियों में एक जैसे होते हैं। यही अंतर जानने वाला यह अंक पक्का कर लेता है। तालिकाएँ यहाँ किसी गाइड से नहीं, एम0 आर0 काले के 'A Higher Sanskrit Grammar' के पृष्ठों से ली गई हैं, और छोटे रूपों का नियम पाणिनि के मूल सूत्र से।

संस्कृत व्याकरण — सर्वनाम तद् एवं युष्मद्

"The declension of the first two of these pronouns is the same in all the three genders." — एम0 आर0 काले, A Higher Sanskrit Grammar, अनुच्छेद 133, अस्मद् और युष्मद् के विषय में

1. इस अध्याय में क्या है

यह यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी का सबसे छोटा भाग है — एक अंक — और पाठ्यक्रम की पंक्ति उतनी ही छोटी है —

5. संस्कृत व्याकरण — 1×1=1 सर्वनाम — तद्, युष्मद्।

बस इतना। दो शब्द, एक प्रश्न, एक अंक।

यह अंक कहाँ गिना जाता है। यह संस्कृत खण्ड (यूनिट 3, 14 अंक) का हिस्सा नहीं है। यह यूनिट 4 (ii) व्याकरण के 7 अंकों का हिस्सा है। हिन्दी व्याकरण से 6 अंक आते हैं और यह एक अंक संस्कृत से — दोनों मिलकर 7। जोड़ मिलाइए और आप देखेंगे कि संस्कृत खण्ड के 14 अंक अलग बचे रहते हैं।

यूनिट 4 (ii) व्याकरण — 7 अंकअंक
हिन्दी व्याकरण (शब्द रचना, वाक्य, वाच्य, पद परिचय)6
संस्कृत व्याकरण (सर्वनाम तद्, युष्मद्)1

एक अंक के लिए इतना क्यों। क्योंकि प्रश्न वह नहीं है जो अधिकांश छात्र मानकर चलते हैं। बोर्ड यह नहीं पूछता कि "तद् के रूप लिखिए।" वह एक रूप देकर उसकी विभक्ति और वचन पूछता है — और कई रूप एक से अधिक विभक्तियों में बिल्कुल एक जैसे होते हैं। यही इस अध्याय का असली विषय है।

2. सर्वनाम, और ये दो ही क्यों

सर्वनाम वह शब्द है जो संज्ञा के स्थान पर आता है। संस्कृत में सर्वनामों की एक निश्चित सूची है, और उसमें तद् (वह), यद् (जो), एतद् (यह), इदम् (यह), अदस् (वह), किम् (क्या), युष्मद् (तू), अस्मद् (मैं) आदि आते हैं।

पाठ्यक्रम ने इनमें से दो चुने हैं, और चुनाव सोच-समझकर है —

  • तद् — तीनों लिंगों में अलग-अलग चलता है, इसलिए सबसे अधिक रूप इसी के हैं।
  • युष्मद् — तीनों लिंगों में एक ही चलता है, और इसके कई रूपों के दो-दो विकल्प हैं।

अर्थात् एक शब्द लिंग की परीक्षा लेता है और दूसरा विकल्पों की। दोनों मिलकर पूरा सर्वनाम-प्रकरण ढँक लेते हैं।

संबोधन क्यों नहीं। आगे की तालिकाओं में आपको केवल सात विभक्तियाँ मिलेंगी, आठ नहीं। सर्वनामों का संबोधन नहीं होता — 'वह' या 'तू' को पुकारा नहीं जाता। इसलिए विकल्पों में यदि 'संबोधन' दिखे तो वह प्रायः गलत विकल्प है।

3. तद् — तीनों लिंगों की पूरी तालिका

तद् — एक शब्द, तीन लिंग तद् पुल्लिंग सः प्रथमा एकवचन स्त्रीलिंग सा प्रथमा एकवचन नपुंसकलिंग तत् प्रथमा एकवचन प्रथमा एकवचन के बाद मूल रूप हर जगह "त" हो जाता है — सः/सा/तत् केवल यहीं

पुल्लिंग

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमासःतौते
द्वितीयातम्तौतान्
तृतीयातेनताभ्याम्तैः
चतुर्थीतस्मैताभ्याम्तेभ्यः
पञ्चमीतस्मात्ताभ्याम्तेभ्यः
षष्ठीतस्यतयोःतेषाम्
सप्तमीतस्मिन्तयोःतेषु

स्त्रीलिंग

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमासातेताः
द्वितीयाताम्तेताः
तृतीयातयाताभ्याम्ताभिः
चतुर्थीतस्यैताभ्याम्ताभ्यः
पञ्चमीतस्याःताभ्याम्ताभ्यः
षष्ठीतस्याःतयोःतासाम्
सप्तमीतस्याम्तयोःतासु

नपुंसकलिंग

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमातत्तेतानि
द्वितीयातत्तेतानि

शेष सब विभक्तियाँ पुल्लिंग जैसी — तेन, तस्मै, तस्मात्, तस्य, तस्मिन् और उनके द्विवचन-बहुवचन ज्यों के त्यों।

4. वह नियम जो पूरी तालिका छोटी कर देता है

इक्कीस-इक्कीस रूप रटना कठिन है। एक नियम याद कर लीजिए और तालिका अपने आप बन जाएगी। काले अपने व्याकरण में यह नियम इस प्रकार देते हैं —

"In other cases they become त … and are declined like nouns in अ except in the Nom. pl., D. Ab. sings., G. pl. and L. sing."

अर्थात् तद्, अ-कारांत संज्ञा (राम, फल) की तरह ही चलता है — केवल पाँच जगह छोड़कर। वे पाँच जगह ये हैं —

जहाँ अलग हैपुल्लिंगस्त्रीलिंग
प्रथमा बहुवचनतेताः
चतुर्थी एकवचनतस्मैतस्यै
पञ्चमी एकवचनतस्मात्तस्याः
षष्ठी बहुवचनतेषाम्तासाम्
सप्तमी एकवचनतस्मिन्तस्याम्

और यह नियम केवल तद् का नहीं है। काले जोड़ते हैं — "All pronouns ending in अ are similarly declined." इसीलिए यद् (जो) ठीक इसी साँचे पर चलता है: यः, यौ, ये / यम्, यौ, यान् — केवल आरंभ का अक्षर बदलता है। एक साँचा सीखिए, कई शब्द बन जाते हैं।

5. युष्मद् — एक तालिका, तीनों लिंग

युष्मद् की सबसे बड़ी सुविधा यही है कि लिंग देखना ही नहीं पड़ता। काले का वाक्य ऊपर उद्धृत है — इसका declension तीनों लिंगों में एक ही है।

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमात्वम्युवाम्यूयम्
द्वितीयात्वाम्, त्वायुवाम्, वाम्युष्मान्, वः
तृतीयात्वयायुवाभ्याम्युष्माभिः
चतुर्थीतुभ्यम्, तेयुवाभ्याम्, वाम्युष्मभ्यम्, वः
पञ्चमीत्वत्युवाभ्याम्युष्मत्
षष्ठीतव, तेयुवयोः, वाम्युष्माकम्, वः
सप्तमीत्वयियुवयोःयुष्मासु

मोटे अक्षरों वाले रूप अलग हैं। ये छोटे रूप हैं और इनका अपना नियम है, जो अगले भाग में है।

6. छोटे रूप — ते, वाम्, वः

द्वितीया, चतुर्थी और षष्ठी में युष्मद् के दो-दो रूप क्यों हैं? क्योंकि पाणिनि ने इन्हीं तीन विभक्तियों के लिए विकल्प रखा है। काले पाद-टिप्पणी में मूल सूत्र देते हैं —

"युष्मदस्मदोः षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोर्वान्नावौ। बहुवचनस्य वस्नसौ। तेमयावेकवचनस्य। त्वामौ द्वितीयायाः।" — पाणिनि, अष्टाध्यायी VIII. 1. 20–23

सूत्र में ही तीनों विभक्तियों के नाम हैं — षष्ठी, चतुर्थी, द्वितीया। इन तीन के अतिरिक्त कहीं छोटा रूप नहीं आता।

वचनछोटा रूप
एकवचनते (चतुर्थी, षष्ठी) · त्वा (द्वितीया)
द्विवचनवाम्
बहुवचनवः

और ये सदा नहीं चलते। काले का नियम स्पष्ट है — छोटे रूप तभी अनिवार्य हैं जब अन्वादेश हो, अर्थात् जब उसी वस्तु का दोबारा उल्लेख हो रहा हो जिसका पहले हो चुका है। जहाँ अन्वादेश नहीं, वहाँ छोटा रूप वैकल्पिक है — धाता ते भक्तोऽसि और धाता तव भक्तोऽसि, दोनों चलते हैं।

एक और बात, जो प्रायः नहीं बताई जाती। छोटे रूप वाक्य के आरंभ में कभी नहीं आते। इसलिए यदि किसी वाक्य का पहला शब्द 'ते' या 'वः' हो, तो वह युष्मद् का छोटा रूप नहीं है — वह तद् का कोई रूप होगा।

7. एक रूप, कई विभक्तियाँ — यहीं अंक कटता है

यह इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। संस्कृत में कई रूप एक से अधिक विभक्तियों में बिल्कुल एक जैसे होते हैं। बोर्ड ठीक यही पूछता है।

एक रूप, कई विभक्तियाँ — तद् के दुहरे रूप ताभ्याम् तृतीया · चतुर्थी · पञ्चमी — द्विवचन एक ही रूप, तीन विभक्तियाँ (स्त्रीलिंग) ताभ्यः चतुर्थी · पञ्चमी — बहुवचन बोर्ड ने यही पूछा है तयोः षष्ठी · सप्तमी — द्विवचन तीनों लिंगों में एक जैसा तस्याः पञ्चमी · षष्ठी — एकवचन केवल स्त्रीलिंग में ते पुं0 प्रथमा बहु · स्त्री0 प्रथमा-द्वितीया द्वि0 और युष्मद् का छोटा रूप भी यही है
रूपकहाँ-कहाँलिंग
ताभ्याम्तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी — द्विवचनस्त्रीलिंग
ताभ्यःचतुर्थी, पञ्चमी — बहुवचनस्त्रीलिंग
ताभ्याम्तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी — द्विवचनपुल्लिंग भी
तेभ्यःचतुर्थी, पञ्चमी — बहुवचनपुल्लिंग
तयोःषष्ठी, सप्तमी — द्विवचनतीनों लिंग
तस्याःपञ्चमी, षष्ठी — एकवचनस्त्रीलिंग
तेप्रथमा बहुवचन (पुं0), प्रथमा-द्वितीया द्विवचन (स्त्री0, नपुं0)तीनों
ताःप्रथमा, द्वितीया — बहुवचनस्त्रीलिंग

तो उत्तर कैसे चुनें? विकल्प देखिए। यदि रूप दो विभक्तियों का है और विकल्पों में केवल एक दी गई है, तो वही उत्तर है। बोर्ड जानबूझकर दूसरी विभक्ति विकल्पों में नहीं रखता — क्योंकि तब प्रश्न के दो सही उत्तर हो जाते।

8. लिंग कैसे पहचानें — तद् वाक्य में

तालिका में रूप ढूँढ़ने से पहले यह तय करना पड़ता है कि शब्द किस लिंग का है। वाक्य में यह अपने आप तय हो जाता है, क्योंकि सर्वनाम अपनी संज्ञा के लिंग, वचन और विभक्ति — तीनों में उसके साथ चलता है।

वाक्यसर्वनामसंज्ञाक्यों यही रूप
सः बालकः पठति।सःबालकः (पुं0)पुल्लिंग, प्रथमा, एकवचन
सा बालिका पठति।साबालिका (स्त्री0)स्त्रीलिंग, प्रथमा, एकवचन
तत् फलं मधुरम्।तत्फलम् (नपुं0)नपुंसकलिंग, प्रथमा, एकवचन
तस्मै बालकाय पुस्तकं ददाति।तस्मैबालकायपुल्लिंग, चतुर्थी, एकवचन
तस्यै बालिकायै पुस्तकं ददाति।तस्यैबालिकायैस्त्रीलिंग, चतुर्थी, एकवचन

इसी से एक काम की तरकीब निकलती है। यदि प्रश्न में पूरा वाक्य दिया हो, तो सर्वनाम का लिंग संज्ञा से पहचानिए, फिर उसी लिंग की तालिका में जाइए। और यदि केवल रूप दिया हो — जैसा प्रायः होता है — तो रूप के आरंभ से पहचानिए: ता- से आरंभ हो तो स्त्रीलिंग, ते- या तै- से आरंभ हो तो प्रायः पुल्लिंग।

9. पहचान का अभ्यास — रूप से विभक्ति तक

यही असली कौशल है, इसलिए इसे अभ्यास से पक्का कीजिए। हर पंक्ति में तर्क भी दिया गया है।

रूपविभक्ति और वचनपहचान का तर्क
तस्मैचतुर्थी एकवचन (पुं0/नपुं0)'स्मै' अंत — यह उन पाँच विशेष स्थानों में से एक है
तस्यैचतुर्थी एकवचन (स्त्री0)'स्यै' अंत — स्त्रीलिंग का चतुर्थी चिह्न
तेषाम्षष्ठी बहुवचन (पुं0/नपुं0)'षाम्' अंत; स्त्रीलिंग होता तो 'तासाम्'
तासुसप्तमी बहुवचन (स्त्री0)'सु' अंत सप्तमी बहुवचन का; 'ता' से स्त्रीलिंग
तेषुसप्तमी बहुवचन (पुं0/नपुं0)वही 'सु', पर 'ते' से पुल्लिंग
तान्द्वितीया बहुवचन (पुं0)'न्' अंत — द्वितीया बहुवचन का चिह्न
तानिप्रथमा/द्वितीया बहुवचन (नपुं0)'नि' अंत नपुंसकलिंग बहुवचन का
ताभिःतृतीया बहुवचन (स्त्री0)'भिः' तृतीया बहुवचन; 'ता' से स्त्रीलिंग
तैःतृतीया बहुवचन (पुं0/नपुं0)वही तृतीया बहुवचन, पुल्लिंग रूप
युष्माभिःतृतीया बहुवचन'भिः' वही चिह्न, युष्मद् में
तुभ्यम्चतुर्थी एकवचनयुष्मद् का पूर्ण रूप; छोटा रूप 'ते'
यूयम्प्रथमा बहुवचनयुष्मद् की प्रथमा बहुवचन, कोई विकल्प नहीं

अंत के अक्षर से बहुत कुछ खुलता है। नीचे के चिह्न तद् और युष्मद् दोनों में एक जैसे काम करते हैं, क्योंकि विभक्ति-प्रत्यय सब शब्दों में वही हैं।

अंतप्रायः क्या
-भ्याम्द्विवचन (तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी — तीनों)
-भ्यःबहुवचन (चतुर्थी, पञ्चमी)
-भिःतृतीया बहुवचन
-सु / -षुसप्तमी बहुवचन
-याम् / -स्मिन्सप्तमी एकवचन
-योःद्विवचन (षष्ठी, सप्तमी)

10. बोर्ड का अपना प्रश्न, हल करके

बोर्ड के मॉडल प्रश्नपत्र का प्रश्न 19 शब्दशः यह है —

'ताभ्यः' शब्द में वचन और विभक्ति है— (A) षष्ठी विभक्ति एकवचन (B) सप्तमी विभक्ति द्विवचन (C) षष्ठी विभक्ति बहुवचन (D) चतुर्थी विभक्ति बहुवचन

तीन चरणों में हल कीजिए।

पहला — शब्द पहचानिए। 'ताभ्यः' का आरंभ 'ता' से है, इसलिए यह तद् का स्त्रीलिंग रूप है।

दूसरा — तालिका में खोजिए। स्त्रीलिंग तालिका में 'ताभ्यः' दो जगह है — चतुर्थी बहुवचन और पञ्चमी बहुवचन

तीसरा — विकल्प मिलाइए। विकल्पों में पञ्चमी है ही नहीं। चतुर्थी बहुवचन है, विकल्प (D) में। उत्तर (D)।

यहाँ दो जाल थे। एक — षष्ठी बहुवचन का रूप 'तासाम्' है, 'ताभ्यः' नहीं; विकल्प (C) इसी भ्रम के लिए है। दो — 'ताभ्याम्' और 'ताभ्यः' देखने में लगभग एक जैसे हैं, पर पहला द्विवचन है और दूसरा बहुवचन। अंतिम अक्षर पर उँगली रखिए: म् हो तो द्विवचन, विसर्ग हो तो बहुवचन।

सारांश

पाठ्यक्रम इस भाग को दो शब्दों तक सीमित रखता है — तद् और युष्मद् — और उसका एक अंक यूनिट 4 (ii) व्याकरण के सात अंकों में गिना जाता है, संस्कृत खण्ड के चौदह में नहीं।

तद् तीनों लिंगों में अलग चलता है। प्रथमा एकवचन में सः, सा और तत्; उसके बाद हर जगह मूल रूप 'त' हो जाता है। पूरी तालिका रटने की आवश्यकता नहीं — यह अ-कारांत संज्ञा की तरह चलता है, केवल पाँच जगह छोड़कर: प्रथमा बहुवचन, चतुर्थी एकवचन, पञ्चमी एकवचन, षष्ठी बहुवचन और सप्तमी एकवचन। वही साँचा यद् पर भी लागू होता है।

युष्मद् तीनों लिंगों में एक ही चलता है, और उसकी द्वितीया, चतुर्थी तथा षष्ठी में छोटे रूप — त्वा, ते, वाम्, वः — मिलते हैं। ये तीन विभक्तियाँ पाणिनि के सूत्र में ही नाम लेकर गिनाई गई हैं, और ये रूप वाक्य के आरंभ में कभी नहीं आते।

पर असली प्रश्न रूप याद करने का नहीं है। बोर्ड एक रूप देकर उसकी विभक्ति और वचन पूछता है, और कई रूप दो-दो जगह आते हैं — ताभ्यः चतुर्थी और पञ्चमी दोनों का बहुवचन है, तयोः षष्ठी और सप्तमी दोनों का द्विवचन, तस्याः पञ्चमी और षष्ठी दोनों का एकवचन। ऐसे प्रश्न में विकल्प देखकर तय कीजिए, और अंतिम अक्षर जाँचिए — म् द्विवचन का चिह्न है, विसर्ग बहुवचन का।

परिशिष्ट — क्या इस अध्याय का नहीं है

पाठ्यक्रम की पंक्ति में केवल दो शब्द हैं, और वही सीमा है। नीचे की बातें संस्कृत व्याकरण की हैं, पर इस एक अंक की नहीं

  • अस्मद् (मैं)। पाठ्यक्रम इसे नहीं माँगता। पर यह युष्मद् का ठीक जुड़वाँ है — वही साँचा, उन्हीं तीन विभक्तियों में छोटे रूप, और पाणिनि का वही सूत्र दोनों को एक साथ नाम लेकर पकड़ता है। युष्मद् याद करते समय अस्मद् मुफ़्त में आ जाता है, इसलिए तालिका यहाँ रख दी गई है।

    विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
    प्रथमाअहम्आवाम्वयम्
    द्वितीयामाम्, माआवाम्, नौअस्मान्, नः
    तृतीयामयाआवाभ्याम्अस्माभिः
    चतुर्थीमह्यम्, मेआवाभ्याम्, नौअस्मभ्यम्, नः
    पञ्चमीमत्आवाभ्याम्अस्मत्
    षष्ठीमम, मेआवयोः, नौअस्माकम्, नः
    सप्तमीमयिआवयोःअस्मासु

    दोनों को साथ रखकर देखिए तो साँचा एक ही है — जहाँ युष्मद् में त्व/यु/युष्म है वहाँ अस्मद् में अह/आ/अस्म, और जहाँ युष्मद् के छोटे रूप वाम्, वः हैं वहाँ अस्मद् के नौ, नः

  • एतद्, इदम्, अदस्, किम्। ये भी सर्वनाम हैं और इनके रूप तद् से मिलते-जुलते हैं, पर पाठ्यक्रम में नहीं हैं।

  • संस्कृत खण्ड के नौ पाठ। वाराणसी, देशभक्तः चन्द्रशेखरः, भारतीयाः संस्कृतिः और शेष — वे यूनिट 3 हैं, 14 अंक के, और उनमें अनुवाद तथा श्लोक आते हैं, व्याकरण नहीं।

  • शब्दरूप के अतिरिक्त धातुरूप, सन्धि, समास, कारक। कक्षा-10 हिन्दी के प्रश्नपत्र में संस्कृत व्याकरण से केवल सर्वनाम आता है। समास और उपसर्ग जो पूछे जाते हैं वे हिन्दी व्याकरण के हैं, और उनकी सूची अलग है।

  • संबोधन विभक्ति। सर्वनामों का संबोधन नहीं होता, इसलिए तालिकाओं में सात ही विभक्तियाँ हैं।

Key formulas & results

Everything you need to memorise, in one card. Screenshot this for revision.

तद् की प्रथमा एकवचन
पुल्लिंग सः · स्त्रीलिंग सा · नपुंसकलिंग तत्
केवल यहीं 'स' दिखता है; आगे हर जगह मूल रूप 'त' हो जाता है
तद् का मूल नियम
तद् = अ-कारांत संज्ञा जैसा, केवल 5 स्थान छोड़कर
काले, A Higher Sanskrit Grammar, अनुच्छेद 135 — 'declined like nouns in अ except…'
वे पाँच अपवाद स्थान
प्रथमा बहु · चतुर्थी एक · पञ्चमी एक · षष्ठी बहु · सप्तमी एक
पुं0 में ते, तस्मै, तस्मात्, तेषाम्, तस्मिन्; स्त्री0 में ताः, तस्यै, तस्याः, तासाम्, तस्याम्
युष्मद् की सुविधा
युष्मद् के रूप तीनों लिंगों में एक ही
काले अनुच्छेद 133 — लिंग देखना ही नहीं पड़ता
छोटे रूप किन विभक्तियों में
केवल द्वितीया, चतुर्थी और षष्ठी में
पाणिनि VIII.1.20-23 के सूत्र में तीनों के नाम हैं
तीनों वचनों के छोटे रूप
एकवचन ते / त्वा · द्विवचन वाम् · बहुवचन वः
अस्मद् में क्रमशः मे / मा, नौ, नः
द्विवचन बनाम बहुवचन का चिह्न
ताभ्याम् (म् अंत) = द्विवचन; ताभ्यः (विसर्ग अंत) = बहुवचन
यही सबसे आम भूल है — अंतिम अक्षर पर उँगली रखिए
दुहरे रूप — याद रखने योग्य
ताभ्याम् = तृतीया/चतुर्थी/पञ्चमी द्वि0 · ताभ्यः = चतुर्थी/पञ्चमी बहु0 · तयोः = षष्ठी/सप्तमी द्वि0 · तस्याः = पञ्चमी/षष्ठी एक0
विकल्पों में केवल एक विभक्ति दी जाती है, वही उत्तर है
अंत से विभक्ति
-भिः तृतीया बहु · -सु/-षु सप्तमी बहु · -योः द्विवचन · -भ्याम् द्विवचन · -भ्यः बहुवचन
ये प्रत्यय तद् और युष्मद् दोनों में एक जैसे काम करते हैं
लिंग की पहचान रूप से
ता- से आरंभ = स्त्रीलिंग · ते-/तै- से आरंभ = प्रायः पुल्लिंग
जहाँ पूरा वाक्य दिया हो, वहाँ संज्ञा से लिंग लीजिए
संबोधन का नियम
सर्वनाम का संबोधन नहीं होता — विभक्तियाँ सात
विकल्पों में 'संबोधन' दिखे तो वह प्रायः गलत विकल्प है
यद् भी उसी साँचे पर
यः, यौ, ये / यम्, यौ, यान् — तद् जैसा
काले — 'All pronouns ending in अ are similarly declined'
⚠️

Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

WATCH OUT
'ताभ्याम्' और 'ताभ्यः' को एक मान लेना
'ताभ्याम्' द्विवचन है (तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी तीनों का), और 'ताभ्यः' बहुवचन (चतुर्थी और पञ्चमी का)। अंतिम अक्षर देखिए — म् हो तो द्विवचन, विसर्ग हो तो बहुवचन। यही अंतर बोर्ड के अपने प्रश्न की जड़ है।
WATCH OUT
'ताभ्यः' को षष्ठी बहुवचन बता देना
स्त्रीलिंग षष्ठी बहुवचन का रूप 'तासाम्' है। 'ताभ्यः' चतुर्थी और पञ्चमी बहुवचन का है। मॉडल प्रश्नपत्र में 'षष्ठी विभक्ति बहुवचन' विकल्प ठीक इसी भ्रम के लिए रखा गया था।
WATCH OUT
यह मान लेना कि हर रूप की एक ही विभक्ति होती है
संस्कृत में कई रूप दो-दो या तीन-तीन विभक्तियों में एक जैसे होते हैं — ताभ्याम्, ताभ्यः, तयोः, तस्याः, तेभ्यः। इसलिए उत्तर विकल्पों से मिलाकर चुनिए; बोर्ड दूसरी विभक्ति विकल्पों में रखता ही नहीं, वरना दो सही उत्तर हो जाते।
WATCH OUT
तद् के तीनों लिंग एक जैसे मान लेना
तद् तीनों लिंगों में अलग चलता है — सः, सा, तत्। युष्मद् वह शब्द है जो तीनों लिंगों में एक चलता है। दोनों को उलट देना सबसे आम भूल है।
WATCH OUT
सर्वनाम का संबोधन रूप ढूँढ़ना
सर्वनामों का संबोधन नहीं होता — 'वह' या 'तू' को पुकारा नहीं जाता। इसीलिए तालिकाओं में सात ही विभक्तियाँ हैं, आठ नहीं।
WATCH OUT
'ते' देखते ही युष्मद् मान लेना
'ते' तीन जगह आता है — तद् पुल्लिंग की प्रथमा बहुवचन, तद् स्त्रीलिंग/नपुंसकलिंग की प्रथमा-द्वितीया द्विवचन, और युष्मद् की चतुर्थी-षष्ठी एकवचन का छोटा रूप। संदर्भ देखिए; और याद रखिए कि छोटा रूप वाक्य के आरंभ में कभी नहीं आता।
WATCH OUT
छोटे रूप हर विभक्ति में लगा देना
छोटे रूप केवल द्वितीया, चतुर्थी और षष्ठी में हैं। पाणिनि का सूत्र इन्हीं तीन का नाम लेता है — 'षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः'। तृतीया, पञ्चमी और सप्तमी में कोई छोटा रूप नहीं।
WATCH OUT
'तेषाम्' और 'तासाम्' का लिंग उलट देना
'तेषाम्' पुल्लिंग-नपुंसकलिंग का षष्ठी बहुवचन है और 'तासाम्' स्त्रीलिंग का। सामान्य नियम याद रखिए — 'ता' से आरंभ हो तो स्त्रीलिंग, 'ते' या 'तै' से हो तो प्रायः पुल्लिंग।
WATCH OUT
यह मान लेना कि यह अंक संस्कृत खण्ड में गिना जाता है
नहीं। संस्कृत खण्ड यूनिट 3 है, 14 अंक का, और उसमें अनुवाद तथा श्लोक आते हैं। यह एक अंक यूनिट 4 (ii) व्याकरण के 7 अंकों का हिस्सा है — हिन्दी व्याकरण से 6 और संस्कृत से 1।
WATCH OUT
पूरी तालिका रटने की कोशिश करना
आवश्यकता नहीं। तद् अ-कारांत संज्ञा की तरह चलता है, केवल पाँच स्थानों को छोड़कर — प्रथमा बहुवचन, चतुर्थी एकवचन, पञ्चमी एकवचन, षष्ठी बहुवचन और सप्तमी एकवचन। वे पाँच याद कीजिए, शेष अपने आप बनेंगे।
WATCH OUT
पाठ्यक्रम से बाहर के सर्वनाम पढ़ने में समय लगाना
पाठ्यक्रम में केवल तद् और युष्मद् हैं। एतद्, इदम्, अदस् और किम् इस एक अंक के लिए नहीं चाहिए। अस्मद् भी नहीं, यद्यपि वह युष्मद् का जुड़वाँ होने के कारण मुफ़्त में आ जाता है।
WATCH OUT
'तानि' को पुल्लिंग का रूप मान लेना
'तानि' नपुंसकलिंग की प्रथमा और द्वितीया बहुवचन है। पुल्लिंग में प्रथमा बहुवचन 'ते' है और द्वितीया बहुवचन 'तान्'। '-नि' का अंत नपुंसकलिंग बहुवचन का चिह्न है।

Practice problems

Work through this chapter's problems as a readiness check — reveal each solution, mark yourself honestly, and get your gap report at the end.

Readiness check

Are you exam-ready for संस्कृत व्याकरण — सर्वनाम तद् एवं युष्मद्?

10 problems from this chapter. Try each one, reveal the worked solution, mark yourself honestly — get your gap report at the end.

10 questions~7 min

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • पाठ्यक्रम की पंक्ति: 'संस्कृत व्याकरण — सर्वनाम — तद्, युष्मद्।' 1×1=1
  • यह अंक यूनिट 4 (ii) व्याकरण के 7 अंकों का है, संस्कृत खण्ड के 14 का नहीं
  • हिन्दी व्याकरण 6 + संस्कृत व्याकरण 1 = व्याकरण के कुल 7 अंक
  • सर्वनामों का संबोधन नहीं होता — विभक्तियाँ सात, आठ नहीं
  • तद् तीनों लिंगों में अलग चलता है; युष्मद् तीनों में एक
  • तद् प्रथमा एकवचन: सः (पुं0), सा (स्त्री0), तत् (नपुं0)
  • प्रथमा एकवचन के बाद मूल रूप हर जगह 'त' हो जाता है
  • तद् अ-कारांत संज्ञा जैसा चलता है, केवल पाँच स्थान छोड़कर
  • वे पाँच: प्रथमा बहु, चतुर्थी एक, पञ्चमी एक, षष्ठी बहु, सप्तमी एक
  • पुल्लिंग में वहाँ: ते, तस्मै, तस्मात्, तेषाम्, तस्मिन्
  • स्त्रीलिंग में वहाँ: ताः, तस्यै, तस्याः, तासाम्, तस्याम्
  • नपुंसकलिंग में केवल प्रथमा-द्वितीया अलग: तत्, ते, तानि; शेष पुल्लिंग जैसा
  • यही साँचा 'यद्' पर भी लागू — यः, यौ, ये / यम्, यौ, यान्
  • युष्मद् प्रथमा: त्वम्, युवाम्, यूयम्
  • युष्मद् द्वितीया: त्वाम्/त्वा, युवाम्/वाम्, युष्मान्/वः
  • युष्मद् तृतीया: त्वया, युवाभ्याम्, युष्माभिः
  • युष्मद् चतुर्थी: तुभ्यम्/ते, युवाभ्याम्/वाम्, युष्मभ्यम्/वः
  • युष्मद् पञ्चमी: त्वत्, युवाभ्याम्, युष्मत्
  • युष्मद् षष्ठी: तव/ते, युवयोः/वाम्, युष्माकम्/वः
  • युष्मद् सप्तमी: त्वयि, युवयोः, युष्मासु
  • छोटे रूप केवल द्वितीया, चतुर्थी और षष्ठी में
  • पाणिनि सूत्र: 'युष्मदस्मदोः षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोर्वान्नावौ' — अष्टाध्यायी VIII.1.20-23
  • छोटे रूप वाक्य के आरंभ में कभी नहीं आते
  • छोटे रूप अनिवार्य तभी जब अन्वादेश हो, अन्यथा वैकल्पिक
  • ताभ्याम् = तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी — द्विवचन (एक रूप, तीन विभक्तियाँ)
  • ताभ्यः = चतुर्थी और पञ्चमी — बहुवचन
  • तेभ्यः = चतुर्थी और पञ्चमी — बहुवचन, पुल्लिंग
  • तयोः = षष्ठी और सप्तमी — द्विवचन, तीनों लिंग
  • तस्याः = पञ्चमी और षष्ठी — एकवचन, स्त्रीलिंग
  • 'ते' तीन जगह: पुं0 प्रथमा बहु, स्त्री0-नपुं0 प्रथमा-द्वितीया द्वि0, युष्मद् का छोटा रूप
  • म् अंत = द्विवचन; विसर्ग अंत = बहुवचन। यही सबसे काम की पहचान है
  • -भिः तृतीया बहुवचन, -सु/-षु सप्तमी बहुवचन, -योः द्विवचन
  • ता- से आरंभ = स्त्रीलिंग; ते-/तै- से आरंभ = प्रायः पुल्लिंग
  • षष्ठी बहुवचन तासाम् (स्त्री0) और तेषाम् (पुं0) — ताभ्यः नहीं
  • वाक्य में सर्वनाम संज्ञा के लिंग, वचन और विभक्ति तीनों में साथ चलता है
  • मॉडल प्रश्नपत्र का प्रश्न: 'ताभ्यः' — उत्तर चतुर्थी विभक्ति बहुवचन

Uttar Pradesh (UPMSP) marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: यूनिट 4 (ii) व्याकरण के 7 अंकों में से 01 अंक संस्कृत व्याकरण का। पाठ्यक्रम की खण्ड-अ सूची में यह मद 5 है (1×1=1); आधिकारिक मॉडल प्रश्नपत्र में यही प्रश्न 19 के रूप में आया।

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
बहुविकल्पीय (खण्ड-अ, संस्कृत व्याकरण)11किसी दिए हुए रूप की विभक्ति और वचन; कभी-कभी किसी विभक्ति-वचन का रूप। तद् के तीनों लिंग और युष्मद् — इन्हीं दो शब्दों से
लघु उत्तरीय — इस यूनिट में बोर्ड नहीं पूछता, समझ जाँचने के लिए2-30 (अभ्यास हेतु)पूरी तालिका लिखवाना, पाँच अपवाद-स्थान गिनवाना, या दुहरे रूपों की व्याख्या — इससे बहुविकल्पीय प्रश्न अपने आप सध जाता है
Prep strategy
  • पहले तद् के तीनों लिंगों की तालिका एक पन्ने पर लिखिए — पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसकलिंग साथ-साथ, ताकि अंतर दिखे
  • पूरी तालिका मत रटिए। पाँच अपवाद-स्थान याद कीजिए — प्रथमा बहु, चतुर्थी एक, पञ्चमी एक, षष्ठी बहु, सप्तमी एक
  • युष्मद् अलग से याद कीजिए, पर राहत यह है कि उसमें लिंग देखना ही नहीं पड़ता
  • दुहरे रूपों की एक छोटी सूची बनाइए — ताभ्याम्, ताभ्यः, तयोः, तस्याः, तेभ्यः, ते — यही सबसे अधिक पूछे जाते हैं
  • अंत के चिह्न रटिए, रूप नहीं: -भ्याम् द्विवचन, -भ्यः बहुवचन, -भिः तृतीया बहु, -सु सप्तमी बहु, -योः द्विवचन
  • अभ्यास उल्टा कीजिए — रूप देखकर विभक्ति बताइए, क्योंकि प्रश्न इसी दिशा में आता है
  • एक अंक के लिए एक घंटे से अधिक मत दीजिए; तालिका बन गई तो प्रश्न तीस सेकंड का है

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

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संस्कृत खण्ड (यूनिट 3, 14 अंक) के गद्यांश-पद्यांश का अनुवाद करते समय सर्वनाम पहचानना — वहीं यह ज्ञान सबसे अधिक काम आता है

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कक्षा 11-12 में संस्कृत विषय लेने पर पूरा शब्दरूप-प्रकरण इसी साँचे पर खड़ा होता है

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हिन्दी के तत्सम शब्दों की पहचान — तस्मात्, तेन, यथा जैसे रूप हिन्दी में ज्यों के त्यों चलते हैं

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श्लोक और सुभाषित पढ़ते समय अर्थ खोलना, क्योंकि सर्वनाम की विभक्ति ही बताती है कि वाक्य में उसका काम क्या है

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यू0पी0 टी0ई0टी0 तथा अन्य परीक्षाओं के संस्कृत खंड में शब्दरूप पर आने वाले प्रश्न

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

1
खण्ड-अ ओ0एम0आर0 शीट पर है — गोला पूरा काला कीजिए, और उत्तर अंकित करने के बाद न काटिए, न इरेजर या व्हाइटनर लगाइए। यह निर्देश आधिकारिक मॉडल प्रश्नपत्र में स्पष्ट लिखा है
2
यह एक अंक का प्रश्न है और तीस सेकंड से अधिक नहीं लेना चाहिए। तालिका याद है तो उत्तर तुरंत आएगा, नहीं है तो सोचने से नहीं निकलेगा
3
पहले शब्द पहचानिए — 'त' से आरंभ हो तो तद्, 'त्व/यु/यूय' से हो तो युष्मद्
4
फिर अंतिम अक्षर देखिए — म् द्विवचन का संकेत, विसर्ग बहुवचन का
5
तीसरे चरण में विकल्प मिलाइए। दुहरे रूप में बोर्ड केवल एक विभक्ति विकल्पों में रखता है, वही उत्तर है
6
विकल्पों में 'संबोधन' दिखे तो उसे तुरंत काट दीजिए — सर्वनाम का संबोधन होता ही नहीं
7
षष्ठी बहुवचन पूछा जाए तो तासाम्/तेषाम् याद रखिए; 'ताभ्यः' का लालच सबसे आम जाल है
8
यदि रूप बिल्कुल न पहचाना जाए तो द्विवचन-बहुवचन के चिह्न से आधे विकल्प काटिए और शेष में से चुनिए

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

STRETCH
तद् के जिन पाँच स्थानों पर विशेष रूप आते हैं, उन्हीं पाँच पर सर्व, विश्व, अन्य जैसे शब्द भी विशेष चलते हैं। सूची बनाइए और देखिए कि 'सर्वनाम संज्ञा' किन शब्दों को दी गई है और क्यों
STRETCH
'ताभ्याम्' एक ही रूप में तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी तीनों का द्विवचन है। सोचिए कि भाषा ऐसी दुहराव क्यों सहती है, और वाक्य में अर्थ फिर भी कैसे स्पष्ट रहता है
STRETCH
पाणिनि का सूत्र 'युष्मदस्मदोः षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोर्वान्नावौ' पढ़िए और गिनिए कि उसमें कितनी सूचनाएँ कितने कम अक्षरों में भरी हैं
STRETCH
छोटे रूप वाक्य के आरंभ में नहीं आते — यह नियम अंग्रेज़ी या हिन्दी में भी किसी रूप पर लागू होता है क्या? तुलना कीजिए
STRETCH
तद् और यद् एक ही साँचे पर चलते हैं और वाक्य में प्रायः जोड़े में आते हैं (यः… सः…)। ऐसे पाँच वाक्य खोजिए और दोनों की विभक्तियाँ मिलाइए
STRETCH
अन्वादेश का नियम पढ़िए और सोचिए कि 'पहले कही जा चुकी बात' के लिए छोटा रूप रखना भाषा की किस प्रवृत्ति का उदाहरण है

Where else this chapter is tested

CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

यू0पी0 बोर्ड हाईस्कूल परीक्षा — हिन्दी (विषय कोड 901), खण्ड-अ का संस्कृत व्याकरण प्रश्न
यू0पी0 बोर्ड हाईस्कूल — यूनिट 3 संस्कृत खण्ड, जहाँ अनुवाद में यही सर्वनाम बार-बार आते हैं
यू0पी0 बोर्ड कक्षा-9 हिन्दी — संस्कृत व्याकरण का समानांतर प्रश्न
यू0पी0 बोर्ड कक्षा-11 एवं 12 संस्कृत — पूरा शब्दरूप प्रकरण इसी आधार पर
यू0पी0 टी0ई0टी0 एवं सी0टी0ई0टी0 — संस्कृत भाषा प्रश्नपत्र में शब्दरूप

Questions students ask

The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

क्योंकि प्रश्न वह नहीं है जो अधिकांश छात्र मानकर चलते हैं। बोर्ड 'तद् के रूप लिखिए' नहीं पूछता — वह एक रूप देकर उसकी विभक्ति और वचन पूछता है। इसके लिए तालिका उल्टी दिशा में चाहिए। पर राहत यह है कि पूरी तालिका रटने की ज़रूरत नहीं: पाँच अपवाद-स्थान और अंत के छह चिह्न याद कर लीजिए, बाकी अपने आप बन जाता है। कुल मिलाकर यह एक घंटे का काम है और एक अंक पक्का।

जो विकल्पों में दिया हो। बोर्ड दोनों को एक साथ विकल्पों में नहीं रखता, क्योंकि तब प्रश्न के दो सही उत्तर हो जाते। मॉडल प्रश्नपत्र में विकल्प थे — षष्ठी एकवचन, सप्तमी द्विवचन, षष्ठी बहुवचन, चतुर्थी बहुवचन। पञ्चमी थी ही नहीं, इसलिए उत्तर चतुर्थी बहुवचन। यदि कभी दोनों दिख जाएँ तो पहले वाली, यानी चतुर्थी, लिखिए।

अंतिम अक्षर पर उँगली रखिए। 'म्' पर समाप्त होने वाला रूप द्विवचन का है, विसर्ग पर समाप्त होने वाला बहुवचन का। यह नियम केवल इन दो रूपों का नहीं — 'युवाभ्याम्' द्विवचन है, 'युष्मभ्यम्' बहुवचन के बावजूद म् पर समाप्त होता है, इसलिए इसे तद् के भ्याम्/भ्यः जोड़े तक सीमित रखिए। सुरक्षित तरीका यही है कि -भ्याम् = द्विवचन और -भ्यः = बहुवचन याद रखा जाए।

क्योंकि पाणिनि ने द्वितीया, चतुर्थी और षष्ठी के लिए विकल्प रखा है — इन्हीं तीन का नाम सूत्र में है। पूर्ण रूप (त्वाम्, तुभ्यम्, तव) सदा सही हैं, इसलिए शब्दरूप लिखते समय पहले वही लिखिए और छोटा रूप कोष्ठक में या अल्पविराम के बाद जोड़ दीजिए। छोटे रूप अनिवार्य केवल तब हैं जब अन्वादेश हो — यानी उसी वस्तु का दोबारा उल्लेख हो रहा हो।

पाठ्यक्रम नहीं माँगता — उसमें केवल तद् और युष्मद् हैं। पर अस्मद् युष्मद् का ठीक जुड़वाँ है, वही साँचा और वही सूत्र दोनों को पकड़ता है, इसलिए युष्मद् याद करते समय वह लगभग मुफ़्त में आ जाता है। जहाँ युष्मद् में वाम्, वः हैं वहाँ अस्मद् में नौ, नः। इस अध्याय के परिशिष्ट में उसकी तालिका दी हुई है।

व्याकरण में। संस्कृत खण्ड यूनिट 3 है, 14 अंक का, और उसमें गद्यांश-पद्यांश का अनुवाद, कण्ठस्थ श्लोक और संस्कृत में उत्तर आते हैं। यह एक अंक यूनिट 4 (ii) का है, जहाँ हिन्दी व्याकरण के 6 अंकों के साथ मिलकर 7 बनते हैं। जोड़ मिलाकर देखिए तो पूरा प्रश्नपत्र 70 पर बैठता है।

रूप के आरंभ से। 'ता' से आरंभ होने वाले रूप स्त्रीलिंग के हैं — ताभिः, तासाम्, तासु, तस्याः। 'ते' या 'तै' से आरंभ होने वाले प्रायः पुल्लिंग के — तेषाम्, तेषु, तैः, तेभ्यः। कुछ रूप दोनों में एक जैसे होते हैं, जैसे 'ताभ्याम्', और वहाँ लिंग से उत्तर बदलता भी नहीं। यदि पूरा वाक्य दिया हो तो संज्ञा देखिए, क्योंकि सर्वनाम उसी के लिंग-वचन-विभक्ति में चलता है।

एम0 आर0 काले के 'A Higher Sanskrit Grammar' से, जिसके पृष्ठ 88 से 91 तक सर्वनामों का प्रकरण है — तद् के तीनों लिंग, युष्मद् और अस्मद् सब वहीं छपे हैं। छोटे रूपों का नियम उसी पुस्तक की पाद-टिप्पणी में दिए पाणिनि-सूत्र (अष्टाध्यायी VIII.1.20-23) से है। किसी गाइड या कुंजी से कुछ नहीं लिया गया।
Verified by the tuition.in editorial team
Last reviewed on 5 September 2026. Written and reviewed by subject-matter experts — read about our process.
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