By the end of this chapter you'll be able to…

  • 1यह बताना कि यह निबंध गद्य खण्ड के सात पाठों में से एक है और अंक-विभाजन कैसे साझा है
  • 2रामधारी सिंह दिनकर का जीवन-परिचय और प्रमुख काव्य एवं गद्य-कृतियाँ बताना
  • 3निबंध का शीर्षक और 'अर्धनारीश्वर' नाम का अर्थ दिनकर के अपने शब्दों में समझाना
  • 4पड़ोसी वकील का दृष्टान्त और उससे निकलने वाला केंद्रीय सिद्धांत बताना
  • 5ईर्ष्या और निंदा के संबंध को स्पष्ट करना
  • 6विद्यासागर और नीत्शे के सूत्रों को शब्दशः और संदर्भ सहित उद्धृत करना
  • 7यह बताना कि ईर्ष्या का एक रचनात्मक पक्ष भी हो सकता है, और किस शर्त पर
  • 8चिंता और ईर्ष्या की तुलना, तथा उदार-हृदय और संकीर्ण-दृष्टि व्यक्तियों की निंदा पर भिन्न प्रतिक्रिया समझना
  • 9ईर्ष्या से बचने के व्यावहारिक उपाय (मानसिक अनुशासन) को समझाना
  • 10दिए गए किसी गद्यांश का प्रसंग और आशय बताना
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Why this chapter matters
यह निबंध राष्ट्रकवि दिनकर के गद्य-लेखन का प्रतिनिधि उदाहरण है — बोर्ड जीवन-परिचय में उन्हें केवल कवि नहीं, निबंधकार के रूप में भी पहचानने की अपेक्षा रखता है। निबंध की तर्क-शृंखला (दृष्टान्त → निंदा → दो सूत्र → रचनात्मक पक्ष → समाधान) गद्यांश-आधारित प्रश्नों के लिए स्पष्ट, उद्धरण-योग्य बिंदु देती है। यह अध्याय दिनकर के मूल संग्रह 'अर्धनारीश्वर' (1952) से सीधे लिया गया है।

ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से — रामधारी सिंह दिनकर

"ईर्ष्या का यही अनोखा वरदान है। जिस मनुष्य के हृदय में ईर्ष्या घर बना लेती है, वह उन चीज़ों से आनन्द नहीं उठाता जो उसके पास मौजूद हैं, बल्कि उन वस्तुओं से दुःख उठाता है जो दूसरों के पास हैं।" — रामधारी सिंह दिनकर, 'ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से', अर्धनारीश्वर (1952)

1. इस अध्याय में क्या है

'ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से' यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी के गद्य खण्ड (यूनिट 1 ii) के सात निर्धारित पाठों में से एक है। यूनिट 1 (ii) का कुल भार 11 अंक है, सातों पाठों में साझा — 6 अंक गद्यांश पर (किसी भी पाठ से) और 5 अंक जीवन-परिचय पर (किसी भी एक लेखक का)। पूरी शर्त और शेष पाठों की सूची 'क्या लिखूँ' अध्याय में दी गई है।

शीर्षक की व्याख्या पहले कर लें। यह शीर्षक कोई सामान्य वाक्य नहीं, एक पुकार है — मानो लेखक स्वयं अपने भीतर बैठी ईर्ष्या को संबोधित कर रहे हों, "हे ईर्ष्या, तू मेरे मन से जाती ही नहीं!" यह स्वर पूरे निबंध में बना रहता है — विषय गंभीर होते हुए भी लेखक इसे व्यक्तिगत, आत्म-कथात्मक ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

वर्तनी पर एक टिप्पणी। पाठ्यक्रम में शीर्षक 'न गयी' लिखा है, पर दिनकर के मूल संग्रह अर्धनारीश्वर में यह शीर्षक 'न गई' छपा है। दोनों वर्तनी एक ही शब्द की हैं; परीक्षा में पाठ्यक्रम की वर्तनी ('न गयी') का प्रयोग सुरक्षित है।

2. लेखक-परिचय — रामधारी सिंह दिनकर

  • जन्म-मृत्यु। रामधारी सिंह दिनकर (1908-1974), बिहार के मुंगेर ज़िले के सिमरिया गाँव में जन्म।
  • पहचान। हिन्दी के 'राष्ट्रकवि' कहे जाते हैं — ओज और वीर रस के प्रमुख कवि, पर गद्य-लेखन में भी उतने ही समर्थ।
  • प्रमुख काव्य-कृतियाँ। 'रेणुका', 'हुंकार', 'कुरुक्षेत्र', 'रश्मिरथी', 'परशुराम की प्रतीक्षा', 'उर्वशी' (ज्ञानपीठ पुरस्कार-प्राप्त)।
  • प्रमुख गद्य-कृति — 'अर्धनारीश्वर' (1952)। निबंधों का एक संग्रह, जिसका छठा निबंध यही 'ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से' है। दिनकर स्वयं भूमिका में इस नाम का कारण बताते हैं — "इस संग्रह में ऐसे भी निबन्ध हैं जो मन-बहलाव में लिखे जाने के कारण कविता की चौहद्दी के पास पड़ते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिनमें बौद्धिक चिन्तन या विश्लेषण प्रधान है। इसीलिए मैंने इस संग्रह का नाम 'अर्धनारीश्वर' रखा है।"
  • युग। शुक्लोत्तर युग (1936 ई0 के बाद) के गद्यकार — शुक्ल जी अपनी हिन्दी साहित्य का इतिहास में दिनकर को केवल कवि के रूप में गिनते हैं (स्वच्छंद धारा में, पहली रचना 'प्रणभंग', संग्रह 'रेणुका' व 'हुंकार'), क्योंकि उनकी पुस्तक 1939-40 पर समाप्त हो जाती है — दिनकर का यह गद्य-संग्रह 1952 में, यानी उसके बाद छपा।

3. मुख्य दृष्टान्त — पड़ोसी वकील की कथा

निबंध एक ठोस, रोज़मर्रा के जीवन के दृष्टान्त से आरंभ होता है, गंभीर सिद्धांत से नहीं। लेखक अपने पड़ोस के एक वकील का उदाहरण देते हैं जिनके पास जीवन की हर सुविधा है —

"खाने-पीने से अच्छे हैं, दोस्तों को भी खूब खिलाते हैं... बाल-बच्चों से भरा-पूरा परिवार, नौकर भी लख देनेवाले और पत्नी भी अत्यन्त सुभाषिणी। भला एक सुखी मनुष्य को और क्या चाहिए?"

पर वकील साहब सुखी नहीं हैं, क्योंकि उनके बगल में रहने वाले एक बीमा-एजेंट की बढ़ती संपत्ति उनका कलेजा जलाती रहती है। लेखक इसी से निबंध का केंद्रीय सिद्धांत निकालते हैं —

"ईर्ष्या का यही अनोखा वरदान है। जिस मनुष्य के हृदय में ईर्ष्या घर बना लेती है, वह उन चीज़ों से आनन्द नहीं उठाता जो उसके पास मौजूद हैं, बल्कि उन वस्तुओं से दुःख उठाता है जो दूसरों के पास हैं।"

4. ईर्ष्या की संतान — निंदा

लेखक अगला कदम एक तीखे रूपक से उठाते हैं — ईर्ष्या की एक संतान भी है।

"ईर्ष्या की बड़ी बेटी का नाम निंदा है। जो व्यक्ति ईर्ष्यालु होता है, वही व्यक्ति बुरे किस्म का निंदक भी होता है।"

निंदक सोचता है कि दूसरों को गिराकर वह स्वयं ऊँचा उठ जाएगा, पर लेखक इसे असंभव बताते हैं — "दूसरों को गिराने की कोशिश तो अपने को बढ़ाने की कोशिश नहीं कही जा सकती।" कोई भी मनुष्य निंदा से नहीं गिरता; उसके पतन का कारण उसके अपने भीतर के सद्गुणों का ह्रास होता है, बाहर की निंदा नहीं।

ईर्ष्या पहले स्वयं को जलाती है। लेखक इस विरोधाभास पर ज़ोर देते हैं कि ईर्ष्या का काम जलाना है, पर सबसे पहले वह उसी को जलाती है जिसके हृदय में उसका जन्म होता है — निंदक "ग्रामोफोन" की तरह हर श्रोता के सामने अपना दुखड़ा बजाता है, पर स्वयं अपनी उन्नति के लिए कुछ नहीं करता।

5. ईर्ष्या और चिंता की तुलना

लेखक एक और तुलना करते हैं, जो निबंध की गहराई दिखाती है। हिन्दी में एक कहावत है कि "चिंता" ही "चिता" है — जो चिंता में डूब जाता है, उसका जीवन नष्ट हो जाता है। पर लेखक इससे भी आगे जाकर लिखते हैं —

"किन्तु, ईर्ष्या, शायद, चिन्ता से भी बदतर चीज़ है, क्योंकि वह मनुष्य के मौलिक गुणों को ही कुंठित बना डालती है।"

फिर वे एक चौंकाने वाली तुलना करते हैं — चिंता से घुला हुआ मनुष्य समाज की दया का पात्र होता है, पर ईर्ष्या से जला हुआ आदमी एक अलग ही खतरा है —

"मृत्यु, शायद, फिर भी श्रेष्ठ है बनिस्बत इसके कि हमें अपने गुणों को कुंठित बनाकर जीना पड़े... ईर्ष्या से जला-भुना आदमी जहर की एक चलती-फिरती गठरी के समान है, जो हर जगह वायु को दूषित करती फिरती है।"

इसी तुलना से लेखक ईर्ष्या का एक और दुष्परिणाम बताते हैं — यह मनुष्य के आनंद-ग्रहण की क्षमता को ही नष्ट कर देती है। जिस हृदय में ईर्ष्या का उदय होता है, उसके लिए सूर्य मद्धिम, पक्षियों का गीत बेसुरा, और फूल भी देखने योग्य नहीं रह जाते।

6. दो प्रामाणिक सूत्र — विद्यासागर और नीत्शे

निबंध का सबसे प्रभावशाली भाग वह है जहाँ लेखक दो भिन्न विचारकों — एक भारतीय, एक पाश्चात्य — के अनुभव-सिद्ध सूत्र उद्धृत करते हैं।

ईश्वरचंद्र विद्यासागर का सूत्र। निंदा से आहत होकर विद्यासागर ने कहा —

"तुम्हारी निंदा वही करेगा, जिसकी तुमने भलाई की है।"

नीत्शे का सूत्र। नीत्शे इसी अनुभव से गुज़रकर हँस पड़े और निंदकों को "बाजार की मक्खियाँ" कहा, जो अकारण भिनभिनाती रहती हैं। नीत्शे का निचोड़ लेखक इस रूप में देते हैं —

"आदमी में जो गुण महान् समझे जाते हैं, उन्हीं के चलते लोग उससे जलते भी हैं।"

नीत्शे का समाधान भी उतना ही तीखा है — "बाजार की मक्खियों को छोड़कर एकान्त की ओर भागो। जो कुछ भी अमर तथा महान है, उसकी रचना और निर्माण बाजार तथा सुयश से दूर रहकर किया जाता है।"

निबंध की बनावट — दृष्टान्त से समाधान तक दृष्टान्त पड़ोसी वकील — सब कुछ, फिर भी दुःखी संतान ईर्ष्या की बेटी — निंदा दो सूत्र विद्यासागर — भलाई ही निंदा का कारण बनती है नीत्शे — बाजार की मक्खियाँ समाधान मानसिक अनुशासन ईर्ष्या का दुहरा पक्ष हानिकारक पक्ष — निंदा, आनन्द-नाश, चरित्र-दोष रचनात्मक पक्ष — स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता (नेपोलियन-सीज़र-सिकंदर शृंखला) भेद इस पर है कि प्रेरणा विनाशात्मक है या रचनात्मक

7. उदार हृदय बनाम संकीर्ण दृष्टि — निंदा पर दो प्रतिक्रियाएँ

लेखक एक और सूक्ष्म अवलोकन जोड़ते हैं — शरीफ़ (भले) लोग प्रायः यह सोचकर परेशान होते हैं कि "फलाँ आदमी मुझसे क्यों जलता है, मैंने तो उसका कुछ नहीं बिगाड़ा।" वे मानते हैं कि उन्होंने किसी के लिए दुर्भावना नहीं रखी, फिर भी लोग उनकी निंदा में लगे रहते हैं।

इसके आगे लेखक दो प्रकार के लोगों की प्रतिक्रिया में अंतर दिखाते हैं —

स्वभावनिंदा पर प्रतिक्रिया
उन्नत चरित्र, विशाल हृदय"इन बेचारों को बातों से क्या चिढ़ना? ये तो खुद ही छोटे हैं।"
संकीर्ण दृष्टि, छोटा दिलमानते हैं कि बड़ी हस्तियों की निंदा होना स्वाभाविक और उचित है

सबसे मार्मिक बात यह है कि संकीर्ण दृष्टि वाले लोग उदारता को भी अहंकार समझ बैठते हैं — जब हम उनके प्रति उदार व्यवहार करते हैं, तब भी वे इसे घृणा मानते हैं, और चुप्पी को भी अहंकार। यही कारण है कि नीत्शे का सुझाव इन्हीं दो प्रकार के लोगों के बीच से निकलता है — जिनका हृदय विशाल है, उन्हें निंदकों की परवाह ही नहीं होती।

8. ईर्ष्या का एक रचनात्मक पक्ष भी है

निबंध की सबसे सूक्ष्म बात यह है कि लेखक ईर्ष्या को पूरी तरह नकारते नहीं — वे स्वीकार करते हैं कि इसका एक पक्ष लाभदायक भी हो सकता है, क्योंकि ईर्ष्या का संबंध प्रतिद्वंद्विता से होता है — "भिखमंगा करोड़पति से ईर्ष्या नहीं करता।" प्रतिद्वंद्विता से मनुष्य का विकास भी होता है। लेखक रसेल के हवाले से एक रोचक ऐतिहासिक शृंखला देते हैं —

"अगर आप संसार-व्यापी यश चाहते हैं तो आप, रसेल के मतानुसार, शायद नेपोलियन से स्पर्धा करें। मगर याद रखिए कि नेपोलियन भी सीज़र से स्पर्धा करता था, और सीज़र सिकंदर से, तथा सिकंदर हरकूलिस से।"

पर शर्त है — प्रेरणा रचनात्मक होनी चाहिए। अक्सर ईर्ष्यालु व्यक्ति केवल यह महसूस करता है कि "कोई चीज़ है जो उसके भीतर नहीं है", पर यह नहीं समझ पाता कि उसे प्राप्त कैसे किया जाए — तब वह गुस्से में अपने पड़ोसी या मित्र से जलने लगता है, जबकि वे स्वयं भी अपने-आप से असंतुष्ट हो सकते हैं।

9. ईर्ष्या से बचने का उपाय — मानसिक अनुशासन

निबंध का समापन एक व्यावहारिक समाधान के साथ होता है। लेखक स्पष्ट भेद करते हैं — ईर्ष्यालु लोगों से बचने का उपाय अलग है (नीत्शे का सुझाव — एकांत की ओर जाना), और ईर्ष्या से स्वयं बचने का उपाय अलग —

"ईर्ष्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है। जो व्यक्ति ईर्ष्यालु स्वभाव का है, उसे फालतू बातों के बारे में सोचने की आदत छोड़ देनी चाहिए। उसे यह भी पता लगाना चाहिए कि जिस अभाव के कारण वह ईर्ष्यालु बन गया है, उसकी पूर्ति का रचनात्मक तरीका क्या है। जिस दिन उसके भीतर यह जिज्ञासा जगेगी, उसी दिन से वह ईर्ष्या करना कम कर देगा।"

अर्थात् समाधान बाहर नहीं, भीतर है — अपने अभाव को पहचानना, और उसकी पूर्ति के लिए दूसरों को गिराने की बजाय स्वयं को सुधारने का रचनात्मक मार्ग खोजना।

10. गद्यांश-आधारित अभ्यास

गद्यांश। "ईर्ष्या का यही अनोखा वरदान है। जिस मनुष्य के हृदय में ईर्ष्या घर बना लेती है, वह उन चीज़ों से आनन्द नहीं उठाता, जो उसके पास मौजूद हैं, बल्कि उन वस्तुओं से दुःख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं।"

शब्दार्थ। वरदान (यहाँ व्यंग्यात्मक अर्थ में) — विशेष गुण, प्रभाव। मौजूद — उपस्थित, विद्यमान।

प्रश्न 1 (2 अंक)। यह पंक्ति किस दृष्टान्त के बाद आती है, और उससे क्या सिद्ध होता है? उत्तर संकेत — यह पड़ोसी वकील के दृष्टान्त के बाद आती है, जिसके पास जीवन की हर सुविधा होते हुए भी वह बीमा-एजेंट पड़ोसी की संपत्ति देखकर दुखी रहता है। इससे सिद्ध होता है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने पास मौजूद सुखों का आनंद नहीं ले पाता।

प्रश्न 2 (2 अंक)। लेखक के अनुसार ईर्ष्या की 'बड़ी बेटी' किसे कहा गया है, और क्यों? उत्तर संकेत — निंदा को, क्योंकि ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों को नीचा दिखाकर स्वयं ऊँचा उठने की कोशिश करता है, और यही प्रवृत्ति निंदा को जन्म देती है।

प्रश्न 3 (2 अंक)। ईर्ष्या से बचने का उपाय निबंध के अनुसार क्या है? उत्तर संकेत — मानसिक अनुशासन — अपने अभाव को पहचानना और उसकी पूर्ति का रचनात्मक तरीका खोजना, न कि दूसरों से जलना।

सारांश

'ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से' रामधारी सिंह दिनकर के संग्रह 'अर्धनारीश्वर' (1952) का छठा निबंध है, और यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी के गद्य खण्ड (यूनिट 1 ii, 11 अंक, सात पाठों में साझा) में निर्धारित है।

निबंध एक पड़ोसी वकील के दृष्टान्त से आरंभ होता है, जिसके पास जीवन की हर सुविधा है फिर भी वह बीमा-एजेंट पड़ोसी की संपत्ति देखकर जलता रहता है — इसी से लेखक ईर्ष्या की मूल प्रकृति निकालते हैं: यह मनुष्य को अपने पास मौजूद सुखों से वंचित कर देती है।

आगे लेखक इसकी 'बेटी' निंदा की चर्चा करते हैं, और दिखाते हैं कि निंदा से कोई गिरता नहीं, गिरने का कारण अपने ही सद्गुणों का ह्रास होता है। ईश्वरचंद्र विद्यासागर और नीत्शे — दोनों के अनुभव-सिद्ध सूत्र उद्धृत करते हुए लेखक बताते हैं कि निंदा प्रायः किसी के गुणों के कारण ही होती है।

निबंध ईर्ष्या को पूरी तरह नहीं नकारता — प्रतिद्वंद्विता के रूप में इसका एक रचनात्मक पक्ष भी हो सकता है (नेपोलियन-सीज़र-सिकंदर की शृंखला), बशर्ते प्रेरणा रचनात्मक हो। अंत में समाधान दिया जाता है — मानसिक अनुशासन, यानी अपने अभाव को पहचानकर उसकी पूर्ति का रचनात्मक मार्ग खोजना।

परिशिष्ट — क्या इस अध्याय का नहीं है

  • गद्यांश के प्रश्न किसी भी पाठ से आ सकते हैं। यह अध्याय केवल एक पाठ (ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से) कवर करता है। मित्रता, ममता, भारतीय संस्कृति, अजन्ता, क्या लिखूँ, पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी इसमें नहीं हैं।
  • 'अर्धनारीश्वर' के अन्य निबंध। संग्रह में 'खड्ग और वीणा', 'महाकाव्य की वेला', 'कविता का भविष्य' जैसे अन्य निबंध भी हैं, पर पाठ्यक्रम में केवल यही एक निर्धारित है।
  • दिनकर की काव्य-कृतियों का विश्लेषण। 'कुरुक्षेत्र', 'रश्मिरथी', 'उर्वशी' जैसी काव्य-कृतियाँ जीवन-परिचय में नाम लेने के लिए पर्याप्त हैं; उनकी विषय-वस्तु इस पाठ का विषय नहीं है।

Key formulas & results

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निबंध का स्रोत
'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' = 'अर्धनारीश्वर' (1952) का छठा निबंध
रामधारी सिंह दिनकर — मूल पुस्तक की विषय-सूची में क्रमांक 6
'अर्धनारीश्वर' नाम का कारण
आधे निबंध कविता के निकट, आधे बौद्धिक चिन्तन प्रधान
दिनकर की अपनी भूमिका से, शब्दशः
केंद्रीय सिद्धांत
ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने पास मौजूद वस्तुओं से आनंद नहीं लेता, दूसरों के पास की वस्तुओं से दुःखी होता है
पड़ोसी वकील के दृष्टान्त से निकलता है
ईर्ष्या की संतान
ईर्ष्या की बड़ी बेटी = निंदा
निंदा से कोई नहीं गिरता; पतन का कारण अपने ही सद्गुणों का ह्रास
दो प्रामाणिक सूत्र
विद्यासागर — 'तुम्हारी निंदा वही करेगा, जिसकी तुमने भलाई की है' · नीत्शे — 'जो गुण महान् समझे जाते हैं, उन्हीं के चलते लोग जलते हैं'
एक भारतीय, एक पाश्चात्य विचारक — दोनों एक ही निष्कर्ष पर
ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्विता-शृंखला
नेपोलियन ← सीज़र ← सिकंदर ← हरकूलिस
रसेल के हवाले से — ईर्ष्या के रचनात्मक पक्ष (स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता) का उदाहरण
ईर्ष्या से बचने का उपाय
मानसिक अनुशासन = अभाव पहचानना + पूर्ति का रचनात्मक तरीका खोजना
नीत्शे का उपाय (एकांत) ईर्ष्यालु लोगों से बचने का है; यह उपाय ईर्ष्या से स्वयं बचने का
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Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

WATCH OUT
यह मान लेना कि यह पूरे गद्य खण्ड के 11 अंक इसी एक पाठ से आते हैं
11 अंक सातों पाठों में साझा हैं — 6 अंक गद्यांश के (किसी भी पाठ से) और 5 अंक जीवन-परिचय के (किसी भी एक लेखक का)।
WATCH OUT
दिनकर को केवल कवि के रूप में जीवन-परिचय में लिखना
जीवन-परिचय में उनकी गद्य-कृति 'अर्धनारीश्वर' का भी उल्लेख करना चाहिए — बोर्ड 'प्रमुख रचना' पूछता है, और यह पाठ स्वयं उनके गद्य-लेखन का प्रमाण है।
WATCH OUT
निबंध को ईर्ष्या के विरुद्ध पूर्ण निषेध मान लेना
लेखक स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि ईर्ष्या का एक रचनात्मक पक्ष भी है (स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता, नेपोलियन-सीज़र-सिकंदर शृंखला), बशर्ते प्रेरणा रचनात्मक हो।
WATCH OUT
विद्यासागर और नीत्शे के सूत्रों को उलट देना
विद्यासागर का सूत्र है — 'तुम्हारी निंदा वही करेगा, जिसकी तुमने भलाई की है।' नीत्शे का सूत्र है — 'जो गुण महान् समझे जाते हैं, उन्हीं के चलते लोग जलते हैं।' दोनों अलग व्यक्ति, अलग शब्द, पर एक ही निष्कर्ष की ओर इशारा करते हैं।
WATCH OUT
ईर्ष्यालु लोगों से बचने के उपाय (नीत्शे — एकांत) और ईर्ष्या से स्वयं बचने के उपाय (मानसिक अनुशासन) को एक समझना
निबंध दोनों को अलग-अलग प्रश्नों के उत्तर के रूप में देता है — 'ईर्ष्यालु लोगों से बचने का क्या उपाय है?' का उत्तर नीत्शे का एकांत है; 'ईर्ष्या से आदमी कैसे बच सकता है?' का उत्तर मानसिक अनुशासन है।

Practice problems

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Readiness check

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8 questions~6 min

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' — रामधारी सिंह दिनकर, संग्रह 'अर्धनारीश्वर' (1952) का छठा निबंध
  • पाठ्यक्रम में वर्तनी 'न गयी', मूल पुस्तक में 'न गई'
  • गद्य खण्ड (यूनिट 1 ii) कुल 11 अंक, सात पाठों में साझा
  • दिनकर (1908-1974) — राष्ट्रकवि; काव्य — रेणुका, हुंकार, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी (ज्ञानपीठ)
  • 'अर्धनारीश्वर' नाम — आधे निबंध कविता-निकट, आधे बौद्धिक चिन्तन-प्रधान (दिनकर की अपनी भूमिका से)
  • शुक्ल जी दिनकर को केवल कवि (स्वच्छंद धारा) मानते हैं — उनकी पुस्तक 1939-40 पर समाप्त, 'अर्धनारीश्वर' 1952 का
  • मुख्य दृष्टान्त — पड़ोसी वकील, जो सब कुछ होते हुए भी बीमा-एजेंट पड़ोसी की संपत्ति देख जलता है
  • केंद्रीय सिद्धांत — ईर्ष्यालु व्यक्ति मौजूद वस्तुओं से आनंद नहीं लेता, दूसरों की वस्तुओं से दुःखी होता है
  • ईर्ष्या की बड़ी बेटी — निंदा; निंदा से कोई नहीं गिरता, पतन का कारण अपने सद्गुणों का ह्रास
  • विद्यासागर का सूत्र — 'तुम्हारी निंदा वही करेगा, जिसकी तुमने भलाई की है'
  • नीत्शे का सूत्र — 'जो गुण महान् समझे जाते हैं, उन्हीं के चलते लोग जलते हैं'; निंदकों को 'बाजार की मक्खियाँ' कहना
  • ईर्ष्या का रचनात्मक पक्ष — स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता; रसेल के हवाले से नेपोलियन-सीज़र-सिकंदर-हरकूलिस शृंखला
  • शर्त — प्रेरणा रचनात्मक होनी चाहिए, विनाशात्मक नहीं
  • ईर्ष्यालु लोगों से बचने का उपाय (नीत्शे) — एकांत की ओर जाना
  • ईर्ष्या से स्वयं बचने का उपाय — मानसिक अनुशासन: अभाव पहचानना + पूर्ति का रचनात्मक तरीका

Uttar Pradesh (UPMSP) marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: यूनिट 1 (ii) गद्य खण्ड — कुल 11 अंक, सात पाठों में साझा। किसी एक पाठ के लिए निश्चित अंक-विभाजन नहीं है।

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
गद्यांश पर आधारित (खण्ड-ब, प्रश्न 1)23गद्यांश का प्रसंग, आशय, भाषा-सौंदर्य — किसी भी एक निर्धारित पाठ से लिया जा सकता है
जीवन परिचय एवं प्रमुख रचना (खण्ड-ब, प्रश्न 6-क)3+21किसी भी एक लेखक का जीवन-वृत्त और उनकी प्रमुख रचना का नाम
बहुविकल्पीय (खण्ड-अ, प्रश्न 6-11 क्षेत्र में)10-2लेखक-कृति मिलान, विधा-पहचान
Prep strategy
  • पहले दिनकर का जीवन-परिचय कंठस्थ कीजिए — काव्य और गद्य दोनों कृतियाँ साथ रखिए
  • निबंध की तर्क-शृंखला (दृष्टान्त → निंदा → दो सूत्र → रचनात्मक पक्ष → समाधान) को एक फ्लो-चार्ट की तरह याद रखिए
  • विद्यासागर और नीत्शे के सूत्र शब्दशः याद रखिए — गद्यांश-प्रश्न में यही सबसे अधिक पूछा जाएगा
  • यह मत भूलिए कि यह सात पाठों में से एक ही है — शेष पाठों की जीवन-परिचय तालिका भी बनाइए

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

गद्यांश-आधारित प्रश्नों के लिए एक तैयार

गद्यांश-आधारित प्रश्नों के लिए एक तैयार, प्रामाणिक उदाहरण

जीवन-परिचय प्रश्न के लिए तैयार सामग्री

जीवन-परिचय प्रश्न के लिए तैयार सामग्री — दिनकर, उनकी काव्य एवं गद्य कृतियाँ, और शुक्लोत्तर युग से जुड़ाव

मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि

मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि — ईर्ष्या और निंदा के बीच के संबंध की व्यावहारिक समझ, आज के सोशल-मीडिया युग में भी प्रासंगिक

यूनिट 1 (i) के 'शुक्लोत्तर युग' से सीधा जुड़ाव

यूनिट 1 (i) के 'शुक्लोत्तर युग' से सीधा जुड़ाव — जीवन-परिचय के उत्तर में दोनों यूनिट का ज्ञान एक साथ काम आता है

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

1
जीवन-परिचय में दिनकर को केवल कवि न लिखें — 'अर्धनारीश्वर' का उल्लेख करके गद्यकार के रूप में भी पहचान दिखाएँ
2
गद्यांश आधारित प्रश्न में सबसे पहले प्रसंग (पाठ, लेखक) लिखिए, फिर आशय
3
विद्यासागर और नीत्शे के सूत्रों को उद्धरण-चिह्न में, शब्दशः लिखने का अभ्यास कीजिए — इससे उत्तर की प्रामाणिकता बढ़ती है
4
समय कम हो तो निबंध के पाँच बिंदु क्रम से लिखिए — दृष्टान्त, निंदा, दो सूत्र, रचनात्मक पक्ष, समाधान

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

STRETCH
विद्यासागर और नीत्शे के सूत्रों की तुलना कीजिए — एक भारतीय समाज-सुधारक, एक पाश्चात्य दार्शनिक, फिर भी निष्कर्ष लगभग एक जैसा। इससे क्या पता चलता है मानव-स्वभाव की सार्वभौमिकता के बारे में?
STRETCH
नीत्शे के 'बाजार की मक्खियाँ' रूपक की तुलना हिन्दी की किसी लोकोक्ति या मुहावरे से कीजिए जो निंदकों का वर्णन करता हो
STRETCH
रसेल की नेपोलियन-सीज़र-सिकंदर-हरकूलिस शृंखला को आगे बढ़ाइए — क्या यह अनंत शृंखला है, या कहीं एक 'मूल' प्रतिद्वंद्विता-रहित व्यक्ति है?
STRETCH
'मानसिक अनुशासन' की तुलना आधुनिक मनोविज्ञान की 'cognitive reframing' (संज्ञानात्मक पुनर्गठन) तकनीक से कीजिए — क्या दिनकर का समाधान इसी सिद्धांत का पूर्वाभास है?

Where else this chapter is tested

CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

यू0पी0 बोर्ड हाईस्कूल परीक्षा — हिन्दी (विषय कोड 901), खण्ड-ब गद्यांश एवं जीवन-परिचय प्रश्न
यू0पी0 बोर्ड कक्षा-9 हिन्दी — समान गद्य-खण्ड ढाँचा
अन्य राज्य बोर्डों की हिन्दी परीक्षाएँ जहाँ दिनकर के निबंध पाठ्यक्रम में हों

Questions students ask

The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

नहीं। गद्यांश के प्रश्न किसी भी एक पाठ से आ सकते हैं, और जीवन-परिचय भी किसी भी एक लेखक का। यह अध्याय सात में से एक — दिनकर का 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' — मूल स्रोत से पूरी तरह कवर करता है।

नहीं। लेखक स्पष्ट स्वीकार करते हैं कि ईर्ष्या का एक रचनात्मक पक्ष भी है — स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता के रूप में यह विकास का साधन बन सकती है, जैसा रसेल के हवाले से नेपोलियन-सीज़र-सिकंदर की शृंखला दिखाती है। भेद इस पर है कि इससे मिलने वाली प्रेरणा रचनात्मक है या केवल विनाशात्मक।

विद्यासागर कहते हैं कि निंदा भलाई का ही परिणाम है — 'तुम्हारी निंदा वही करेगा, जिसकी तुमने भलाई की है।' नीत्शे इसी तथ्य को दूसरे ढंग से कहते हैं — 'जो गुण महान् समझे जाते हैं, उन्हीं के चलते लोग जलते हैं' — और निंदकों को 'बाजार की मक्खियाँ' कहकर उनसे दूर, एकांत में जाने की सलाह देते हैं। दोनों एक ही निष्कर्ष तक अलग-अलग रास्तों से पहुँचते हैं।

मूल पुस्तक से — रामधारी सिंह दिनकर के संग्रह 'अर्धनारीश्वर' (1952, archive.org पर उपलब्ध digital संस्करण, in.ernet.dli.2015.481205) से सीधे, जिसमें यह निबंध छठे स्थान पर है।
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