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  • 1शरद जोशी और हिन्दी व्यंग्य-परंपरा
  • 2व्यंग्य-निबंध की विशेषताएँ
  • 3'अतिथि देवो भव' की वास्तविकता
  • 4हास्य और गंभीर संदेश का संगम
  • 5आधुनिक मध्यम-वर्ग का चित्रण
💡
Why this chapter matters
हिन्दी के व्यंग्य-सम्राट शरद जोशी का यह चटपटा निबंध 'अतिथि देवो भव' की भारतीय परंपरा पर मधुर व्यंग्य। हास्य के माध्यम से सामाजिक सत्य का सशक्त चित्रण।

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तुम कब जाओगे, अतिथि — कक्षा 9 हिन्दी B (स्पर्श)

"अतिथि देवो भव — पर देवता को भी देर-सबेर अपने धाम लौटना पड़ता है।" — शरद जोशी

1. पाठ-परिचय

'तुम कब जाओगे, अतिथि' शरद जोशी का एक प्रसिद्ध व्यंग्य-निबंध है। यह निबंध 'अतिथि देवो भव' की भारतीय परंपरा पर एक मार्मिक टिप्पणी है। लेखक हास्य के माध्यम से बताते हैं कि कैसे एक अतिथि का चार दिन से अधिक रहना मेज़बान के लिए परीक्षा बन जाता है।

मुख्य भाव

  • 'अतिथि देवो भव' की वास्तविकता
  • मध्यम-वर्गीय जीवन की मजबूरियाँ
  • मानवीय संबंधों की सीमाएँ
  • हास्य के माध्यम से सत्य का चित्रण
  • शिष्टाचार बनाम मजबूरी

व्यंग्य-निबंध की विशेषताएँ

  • हास्य के साथ-साथ गंभीर संदेश
  • दैनिक जीवन के सत्य
  • सामाजिक रूढ़ियों पर तीखा प्रहार
  • सहज भाषा, गहरा अर्थ

2. लेखक-परिचय — शरद जोशी

जीवनवृत्त

  • जन्म: 21 मई 1931, उज्जैन (मध्य प्रदेश)
  • मृत्यु: 5 सितंबर 1991, मुंबई
  • उपाधि: हिन्दी के 'व्यंग्य-सम्राट'
  • पुरस्कार: पद्मश्री (1990)

प्रमुख व्यवसाय

  • पत्रकार, लेखक, व्यंग्यकार, पटकथा-लेखक
  • 'धर्मयुग', 'सारिका' पत्रिकाओं में लेखन
  • 'नवभारत टाइम्स' में 'प्रतिदिन' कॉलम — पाठकों में बहुत लोकप्रिय

मीडिया-योगदान

  • टी.वी. धारावाहिक: 'ये जो है ज़िंदगी' (DD पर) — प्रसिद्ध हास्य-धारावाहिक
  • फ़िल्म पटकथा: 'क्षितिज', 'उत्सव', 'गोधूली'
  • मराठी फ़िल्म: 'सिंहासन'

प्रमुख रचनाएँ

व्यंग्य-संग्रह:

  • परिक्रमा (1976)
  • किसी बहाने (1977)
  • तिलिस्म (1979)
  • रहा किनारे बैठ (1980)
  • दूसरी सतह
  • यथासंभव
  • यथा-प्रसंग

उपन्यास:

  • 'मेरा प्रिय व्यंग्यकार' (कई व्यंग्यकारों पर)

नाटक:

  • 'अंधों का हाथी'

भाषा-शैली

  • सरल खड़ी बोली
  • दैनिक जीवन की भाषा
  • तीखा व्यंग्य के साथ हास्य
  • मार्मिक टिप्पणी
  • सामाजिक चेतना से युक्त

3. पाठ का सारांश

प्रथम दिन — स्वागत

अतिथि का आगमन:

  • एक मित्र-अतिथि घर पधारे
  • लेखक और उनकी पत्नी ने भव्य स्वागत किया
  • 'अहो भाग्य!' — खुशी और गर्व
  • अच्छी मेहमाननवाज़ी

मेज़बान का उत्साह:

  • पत्नी ने मनपसंद व्यंजन बनाए
  • रसोई में विशेष तैयारी
  • लेखक ने अपना कमरा खाली कर दिया
  • हर सुविधा का प्रबंध

पहले दिन का आनंद:

  • पुरानी यादें
  • बातचीत, हँसी-मज़ाक
  • घूमने जाना
  • सुंदर भोजन

द्वितीय दिन — सामान्य

अतिथि का साथ:

  • दूसरे दिन भी आनंद
  • थोड़ी थकान महसूस हुई
  • पर मेज़बानी जारी
  • अभी सब ठीक

सामान्य व्यवहार:

  • नाश्ता, दोपहर का भोजन, रात का खाना
  • कुछ चर्चा
  • अतिथि की रुचियों का ध्यान

तृतीय दिन — चिंता शुरू

मेज़बान की चिंता:

  • 'अतिथि कब जाएगा?'
  • खर्च बढ़ रहा
  • दिनचर्या में बाधा
  • सामान्य काम रुक रहे

पत्नी की प्रतिक्रिया:

  • रसोई में मेहमान-व्यंजन बनाने से थक चुकी
  • घर के काम पीछे पड़ रहे
  • 'और कब तक?' — पति से धीमी आवाज़ में

अतिथि की निरंतर उपस्थिति:

  • पर अतिथि अभी भी आराम से
  • 'कुछ दिन और रहूँगा'
  • 'घर जाने की क्या जल्दी?'

चौथे दिन — असहनीय

मेज़बान की चरम-स्थिति:

  • खर्च बेकाबू
  • पत्नी की मुस्कुराहट जा चुकी
  • नौकर भी थक गए (अगर हो तो)
  • घर की दिनचर्या टूट चुकी

लेखक का मन:

  • 'तुम कब जाओगे, अतिथि?'
  • यह प्रश्न ज़ोर से नहीं पूछ सकते
  • सब कुछ चुपचाप सहना
  • शिष्टाचार की मजबूरी

अतिथि का व्यवहार

अनभिज्ञता:

  • अतिथि स्थिति को भांप नहीं रहा
  • आराम से रह रहा
  • 'मित्र है, क्या फ़र्क पड़ता है?'
  • मेज़बान की पीड़ा से अनजान

या जान-बूझ कर?

  • शायद वह जानता है पर ध्यान नहीं देता
  • घर का खाना, मुफ़्त ठहराव — कौन छोड़े?
  • अपनी सुविधा पहले

पाँचवें दिन — विस्फोट का बिंदु

मेज़बान की मनःस्थिति:

  • 'दैव-समान अतिथि' की भावना खत्म
  • अब वह 'राक्षस-समान' लगने लगा
  • 'अब कोई दया नहीं!'
  • मन ही मन सोचना — 'जाओ! जाओ! कृपया जाओ!'

बातचीत में बदलाव:

  • अब विषय कम होते जा रहे
  • दोनों ओर असहजता
  • मौन समय बढ़ रहा
  • ख़ुशी जा चुकी

अंत — 'अतिथि देवो भव' की वास्तविकता

लेखक का व्यंग्य:

  • 'अतिथि देवो भव' — सिद्धांत में सुंदर
  • पर देवता भी कुछ दिन से अधिक नहीं रुकते
  • मनुष्य की सहनशक्ति की सीमा है
  • कोई भी रिश्ता निरंतर नहीं चलता

व्यंग्य-वाक्य

  • "अतिथि देवो भव — पर देवता को भी देर-सबेर अपने धाम लौटना पड़ता है।"
  • "चार दिन ठीक — पाँचवें दिन से अतिथि आफ़त।"
  • "हर अतिथि की समाप्ति-तिथि (Expiry Date) होनी चाहिए।"

4. केन्द्रीय भाव और संदेश

मुख्य मुद्दे

  1. 'अतिथि देवो भव' की वास्तविकता: सिद्धांत और व्यवहार में अंतर।
  2. मध्यम-वर्गीय मजबूरियाँ: खर्च की सीमाएँ।
  3. मानवीय धैर्य की सीमा: कोई भी 'देवता' सहन-योग्य नहीं अनिश्चित काल।
  4. शिष्टाचार बनाम सत्य: सच कहना मुश्किल।
  5. रिश्तों की वास्तविकता: हर रिश्ते की सीमा।

हास्य का उद्देश्य

  • गंभीर सत्य को हल्के ढंग से कहना
  • पाठक को सोचने पर मजबूर करना
  • सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार
  • मानवीय कमज़ोरियों का चित्रण

5. साहित्यिक विशेषताएँ

विधा

  • व्यंग्य-निबंध (Satirical Essay)
  • आधुनिक हिन्दी निबंध-परंपरा
  • हास्य-व्यंग्य

भाषा

  • सरल खड़ी बोली
  • दैनिक जीवन की भाषा
  • सहज, बोलचाल का अंदाज़
  • तीखे शब्द जब आवश्यक

शैली

  • संवादात्मक: पाठक से सीधा संवाद
  • विश्लेषणात्मक: स्थिति का चरणबद्ध विश्लेषण
  • व्यंग्यात्मक: हर वाक्य में चुटकी
  • मनोवैज्ञानिक: मेज़बान-अतिथि की मानसिकता

अलंकार

  • विरोधाभास: 'अतिथि देवो भव' बनाम 'कब जाओगे?'
  • रूपक: अतिथि = देवता; मेज़बान = देवता का सेवक
  • व्यंग्य: हर वाक्य में चुटकी
  • पुनरुक्ति: 'अतिथि' शब्द का बार-बार प्रयोग

रस

  • हास्य रस — मुख्य
  • करुण रस — मेज़बान की पीड़ा
  • व्यंग्य — समग्र भाव

6. व्यंग्य-निबंध की भारतीय परंपरा

हिन्दी के प्रमुख व्यंग्यकार

  1. हरिशंकर परसाई (1924-95) — 'व्यंग्य का पिता', 'विकलांग श्रद्धा का दौर'
  2. शरद जोशी (1931-91) — 'ये जो है ज़िंदगी', 'तुम कब जाओगे अतिथि'
  3. श्रीलाल शुक्ल (1925-2011) — 'राग दरबारी', 'अंगद का पाँव'
  4. रवींद्रनाथ त्यागी (1930-2009) — व्यंग्य-काव्य
  5. ज्ञान चतुर्वेदी — 'बारामासी', 'नरक यात्रा'

व्यंग्य का उद्देश्य

  • समाज की कमज़ोरियों पर प्रहार
  • रूढ़ियों का खंडन
  • हास्य के साथ गंभीर संदेश
  • मानवीय कमज़ोरियों का चित्रण
  • सुधार की दिशा

7. भारतीय 'अतिथि' संस्कृति

'अतिथि देवो भव' का अर्थ

  • संस्कृत श्लोक (तैत्तिरीय उपनिषद से)
  • "मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव"
  • अर्थ: माँ देवता है, पिता देवता है, गुरु देवता है, अतिथि देवता है

भारतीय परंपरा

  • अतिथि का स्वागत
  • भोजन-निवास की व्यवस्था
  • सम्मान देना
  • अपेक्षित कुछ नहीं
  • 'अतिथि' शब्द: 'अ + तिथि' = बिना तिथि (बिना सूचना के आने वाला)

बदलती संस्कृति

  • आज मध्यम-वर्ग की समस्याएँ
  • छोटे शहर/मेट्रो में सीमित जगह
  • एकल परिवार (Nuclear families)
  • खर्च की चिंता
  • व्यस्त दिनचर्या

8. लेखक का सूक्ष्म अवलोकन

मनोवैज्ञानिक चित्रण

मेज़बान:

  • पहले दिन: उत्साह, खुशी
  • दूसरे दिन: सहनीय
  • तीसरे दिन: चिंता
  • चौथे दिन: थकान
  • पाँचवें दिन: असहनीय
  • 'जाओ! कृपया जाओ!'

अतिथि:

  • अनभिज्ञ या जान-बूझ कर
  • आराम का आनंद
  • 'क्या फ़र्क पड़ता है?'
  • मेज़बान की पीड़ा से अनजान

पत्नी:

  • रसोई के बोझ से थकी
  • मुस्कुराहट जा चुकी
  • घर के काम रुक चुके
  • पति को धीमी आवाज़ में 'कब तक?'

9. आज की प्रासंगिकता

आधुनिक संदर्भ

बदलती संस्कृति:

  • 'अतिथि देवो भव' अब परंपरागत
  • 'पर्यटन-उद्योग' का विकास — होटल, गेस्ट हाउस
  • 'AirBnB', 'OYO', होमस्टे
  • अब अतिथि-स्थान व्यावसायिक

सोशल मीडिया का असर:

  • WhatsApp ग्रुप में 'मेहमान-संख्या' की चर्चा
  • 'अतिथि-घर' की संख्या
  • तुम कब आओगे? बनाम तुम कब जाओगे?

मध्यम-वर्ग की चुनौतियाँ:

  • महँगाई
  • छोटे फ़्लैट्स
  • दोनों कामकाजी
  • समय की कमी

शरद जोशी का संदेश

  • संतुलन बनाएँ — सत्य और शिष्टाचार में
  • मेज़बानी सीमा-योग्य
  • अतिथि की भी ज़िम्मेदारी — जल्दी जाना
  • हास्य से सच्चाई कहो

10. प्रमुख उद्धरण

"अतिथि देवो भव — पर देवता को भी देर-सबेर अपने धाम लौटना पड़ता है।"

"चार दिन ठीक — पाँचवें दिन से अतिथि आफ़त।"

"हर अतिथि की समाप्ति-तिथि होनी चाहिए।"

"मेज़बानी की भी एक सीमा है।"


11. समापन

'तुम कब जाओगे, अतिथि' केवल एक व्यंग्य-निबंध नहीं — यह मानवीय रिश्तों की वास्तविकता पर एक मार्मिक टिप्पणी है। शरद जोशी ने हास्य के माध्यम से एक गंभीर सत्य कहा है — हर रिश्ते की एक सीमा होती है। 'अतिथि देवो भव' की भारतीय परंपरा भी मनुष्य की धैर्य-सहनशक्ति से बंधी है। यह निबंध हमें सिखाता है — हास्य से सत्य कहो, परंपराओं की वास्तविकता पहचानो, और दूसरों की मजबूरियों का ध्यान रखो। कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए यह पाठ — व्यंग्य-कला, सामाजिक चेतना, और हास्य-बोध का अद्भुत स्रोत।

Key formulas & results

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लेखक
शरद जोशी (21 मई 1931 – 5 सितंबर 1991) — व्यंग्य-सम्राट
उज्जैन में जन्म
पुरस्कार
पद्मश्री (1990)
विधा
व्यंग्य-निबंध (Satirical Essay)
प्रसिद्ध टी.वी. सीरियल
'ये जो है ज़िंदगी' (DD पर)
हास्य-धारावाहिक
फ़िल्म पटकथा
क्षितिज, उत्सव, गोधूली
प्रमुख व्यंग्य-संग्रह
परिक्रमा, किसी बहाने, तिलिस्म, यथासंभव
केन्द्रीय मुद्दा
'अतिथि देवो भव' का व्यंग्यात्मक चित्रण
4 दिन ठीक, 5वें दिन आफ़त
श्लोक का स्रोत
तैत्तिरीय उपनिषद — 'मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव'
⚠️

Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

WATCH OUT
शरद जोशी और हरिशंकर परसाई को confuse करना
हरिशंकर परसाई = 'व्यंग्य के पिता', 'विकलांग श्रद्धा का दौर'। शरद जोशी = 'व्यंग्य-सम्राट', 'तुम कब जाओगे अतिथि', 'ये जो है ज़िंदगी' (टी.वी.)। दोनों समकालीन व्यंग्यकार।
WATCH OUT
'अतिथि' शब्द का गलत अर्थ
'अतिथि' = 'अ + तिथि' = बिना तिथि (बिना सूचना के आने वाला)। संस्कृत मूल का शब्द।
WATCH OUT
श्लोक का गलत स्रोत
'अतिथि देवो भव' तैत्तिरीय उपनिषद का श्लोक है — 'मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव'।
WATCH OUT
निबंध को गंभीर मान लेना
यह व्यंग्य-निबंध है — हास्य के साथ-साथ गंभीर सत्य। हास्य परत है, अंदर सामाजिक संदेश।

NCERT exercises

Every NCERT exercise from this chapter — what it covers and how many questions to expect.

मौखिक
मौखिक
लेखक, व्यंग्य-निबंध, मुख्य भाव
4
Questions
लिखित
लिखित
मेज़बान-अतिथि की मनःस्थिति, 'अतिथि देवो भव', व्यंग्य
5
Questions
भाषा
भाषा
व्यंग्य-शैली, मुहावरे, अलंकार
3
Questions

Practice problems

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Readiness check

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5 questions~4 min

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • लेखक: शरद जोशी (21 मई 1931 – 5 सितंबर 1991), उज्जैन
  • उपाधि: 'व्यंग्य-सम्राट'
  • पुरस्कार: पद्मश्री 1990
  • टी.वी. सीरियल: 'ये जो है ज़िंदगी' (DD पर हास्य-धारावाहिक)
  • फ़िल्म पटकथा: क्षितिज, उत्सव, गोधूली
  • प्रमुख संग्रह: परिक्रमा, किसी बहाने, तिलिस्म, यथासंभव
  • विधा: व्यंग्य-निबंध (Satirical Essay)
  • मूल विषय: 'अतिथि देवो भव' का व्यंग्य
  • श्लोक का स्रोत: तैत्तिरीय उपनिषद
  • केन्द्रीय वाक्य: 'देवता को भी देर-सबेर अपने धाम लौटना पड़ता है'
  • मेज़बान की 5-दिवसीय यात्रा: उत्साह → सामान्य → चिंता → थकान → असहनीय
  • 'अतिथि' का अर्थ: 'अ + तिथि' = बिना सूचना आने वाला
  • अन्य व्यंग्यकार: हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, ज्ञान चतुर्वेदी

Uttar Pradesh (UPMSP) marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: 4–5 अंक प्रति बोर्ड पेपर

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
बहुविकल्पीय / अति लघु11–2लेखक; विधा; मुख्य भाव; पुरस्कार
लघु उत्तरीय31मेज़बान की मनःस्थिति; व्यंग्य-वाक्य; अतिथि का व्यवहार
दीर्घ उत्तरीय50–1व्यंग्य-कला; सामाजिक संदेश; आज की प्रासंगिकता
Prep strategy
  • शरद जोशी — 'व्यंग्य-सम्राट', पद्मश्री 1990
  • टी.वी. सीरियल 'ये जो है ज़िंदगी'
  • व्यंग्य-निबंध की विधा-विशेषताएँ
  • मेज़बान की 5-दिवसीय मानसिक यात्रा
  • 'अतिथि देवो भव' का स्रोत — तैत्तिरीय उपनिषद
  • व्यंग्य-वाक्य याद रखें — 'देवता को भी धाम लौटना पड़ता है'

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

Incredible India Campaign

भारत सरकार का पर्यटन-अभियान — 'अतिथि देवो भव' इसका मूल मंत्र।

Hospitality Industry

भारत का होटल-उद्योग ₹2 लाख करोड़ का — व्यावसायिक रूप से 'अतिथि देवो भव' का अनुप्रयोग।

Homestay Movement

केरल, हिमाचल, उत्तराखंड में होमस्टे — परंपरागत आतिथ्य का आधुनिक रूप।

OYO, AirBnB

तकनीक-आधारित अतिथि-सेवा — आधुनिक 'अतिथि' संस्कृति।

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

1
शरद जोशी का परिचय — 'व्यंग्य-सम्राट', पद्मश्री 1990
2
व्यंग्य-निबंध की विधा को परिभाषित करें
3
5-दिवसीय मेज़बान-यात्रा का वर्णन — चरणबद्ध
4
व्यंग्य-वाक्य ज़रूर quote करें
5
'अतिथि देवो भव' का स्रोत (तैत्तिरीय उपनिषद) उल्लेख
6
हास्य-व्यंग्य के अंतर पर 1-2 वाक्य
7
आज की मध्यम-वर्गीय वास्तविकता से जोड़ें

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

STRETCH
हिन्दी व्यंग्य-परंपरा का विकास — भारतेन्दु से आज तक
STRETCH
हरिशंकर परसाई की 'विकलांग श्रद्धा का दौर'
STRETCH
श्रीलाल शुक्ल का 'राग दरबारी' — हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ राजनैतिक व्यंग्य-उपन्यास
STRETCH
टी.वी. सीरियल 'ये जो है ज़िंदगी' का सांस्कृतिक प्रभाव
STRETCH
तैत्तिरीय उपनिषद और भारतीय शिक्षा-दर्शन

Where else this chapter is tested

CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

CBSE Board Class 9उच्च
हिन्दी ओलिंपियाडमध्यम
UGC NET हिन्दीउच्च — व्यंग्य विशेष
CTET हिन्दीमध्यम
हिन्दी पत्रकारिता पाठ्यक्रमउच्च

Questions students ask

The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

हास्य = केवल हँसी पैदा करने वाला। व्यंग्य = हँसी के साथ-साथ गंभीर सामाजिक सत्य/आलोचना। 'तुम कब जाओगे अतिथि' व्यंग्य है — हँसते-हँसते रिश्तों की वास्तविकता पर सोचने को मजबूर करता।

दोनों हिन्दी व्यंग्य के दिग्गज। परसाई (1924-95) = 'व्यंग्य का पिता', तीखे राजनैतिक व्यंग्य ('विकलांग श्रद्धा का दौर')। शरद जोशी (1931-91) = 'व्यंग्य-सम्राट', मधुर हास्य के साथ सामाजिक व्यंग्य, टी.वी./फ़िल्म के लिए भी लिखा।

तैत्तिरीय उपनिषद से — 'मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव' (माँ देवता है, पिता देवता है, गुरु देवता है, अतिथि देवता है)। यह भारतीय संस्कृति का मूल मूल्य-सूत्र।
Verified by the tuition.in editorial team
Last reviewed on 20 May 2026. Written and reviewed by subject-matter experts — read about our process.
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