By the end of this chapter you'll be able to…

  • 1हरिशंकर परसाई और उनकी व्यंग्य-शैली से परिचय
  • 2प्रेमचंद की सादगी और ईमानदारी समझना
  • 3व्यंग्य-निबंध की पहचान और विशेषताएँ
  • 4रूपकात्मक व्यंग्य कैसे काम करता है यह समझना
  • 5आधुनिक दिखावेबाज़ी पर आलोचनात्मक दृष्टि
  • 6सादगी और मूल्यों का महत्व
💡
Why this chapter matters
हरिशंकर परसाई का यह व्यंग्य-निबंध दिखावेबाज़ी पर तीखा प्रहार करता है और सादगी-ईमानदारी का संदेश देता है। आधुनिक उपभोक्तावादी समाज में बेहद प्रासंगिक।

Before you start — revise these

A 5-minute refresher here will save you 30 minutes of confusion below.

प्रेमचंद के फटे जूते — कक्षा 9 हिन्दी

1. पाठ परिचय

'प्रेमचंद के फटे जूते' हरिशंकर परसाई का व्यंग्य-निबंध है, जिसमें वे प्रेमचंद की एक तस्वीर पर टिप्पणी करते हैं — जिसमें प्रेमचंद के जूते फटे दिख रहे हैं। फटे जूते से शुरू होकर परसाई जी प्रेमचंद की सादगी, ईमानदारी, गरीबी, और साहित्यकार की मानसिकता पर गहन चिंतन करते हैं।

विशेषता

यह निबंध रूपकात्मक व्यंग्य है — फटे जूतों के माध्यम से समाज, साहित्यकारों की स्थिति, और मानवीय मूल्यों पर टिप्पणी।


2. लेखक — हरिशंकर परसाई (1922-1995)

  • जन्म: 22 अगस्त 1922, जमानी (मध्य प्रदेश)
  • मृत्यु: 10 अगस्त 1995
  • हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य-लेखक
  • संपादक: 'वसुधा' पत्रिका
  • प्रमुख रचनाएँ: 'विकलांग श्रद्धा का दौर', 'सदाचार का ताबीज़', 'भूत के पाँव पीछे', 'निठल्ले की डायरी'
  • विशेषता: सरल भाषा, तीखा व्यंग्य, सामाजिक चेतना

3. पाठ का सारांश

पहली टिप्पणी — फोटो पर

लेखक प्रेमचंद के एक चित्र को देखते हैं, जिसमें वे अपनी पत्नी शिवरानी देवी के साथ बैठे हैं। प्रेमचंद के पैर के अंगूठे जूते से बाहर निकले हैं — जूते फटे हुए हैं। यह दृश्य परसाई जी को सोचने पर मजबूर करता है।

प्रेमचंद की सादगी

लेखक प्रेमचंद की सादगी पर विचार करते हैं:

  • प्रेमचंद ने एक फोटोग्राफ खिंचवाने जैसे विशेष अवसर पर भी फटे जूते पहने।
  • वे दिखावे से कोसों दूर थे।
  • गरीबी से नहीं घबराते थे।

व्यंग्यात्मक तुलना

परसाई जी आधुनिक लेखकों, बड़े लोगों से प्रेमचंद की तुलना करते हैं:

  • आधुनिक लेखक चमकदार जूते पहनते हैं।
  • दिखावा करते हैं।
  • प्रेमचंद की ईमानदारी का अभाव।

बेखौफ़ हास्य

प्रेमचंद के चेहरे पर हँसी है — फटे जूते की कोई शर्म नहीं। यह उनका आत्मविश्वास और साहित्यकार-गरिमा दर्शाता है।

अंत

परसाई जी सिखाते हैं कि असली पहचान बाहरी चमक से नहीं, अंदरूनी मूल्यों से होती है। प्रेमचंद के 'फटे जूते' उनकी ईमानदारी और सादगी के प्रतीक हैं — शर्म नहीं, गौरव।


4. व्यंग्य के बिंदु

  1. आधुनिक लोगों की दिखावेबाज़ी पर व्यंग्य।
  2. बाहरी चमक से असली पहचान नहीं होती।
  3. गरीबी शर्मनाक नहीं — बेईमानी शर्मनाक है।
  4. साहित्यकार की प्रतिष्ठा कलम से होती है, कपड़ों से नहीं।
  5. मूल्यों का ह्रास आधुनिक समाज में।

5. पाठ का संदेश

  1. सादगी सर्वोपरि गुण है।
  2. ईमानदारी से बढ़कर कोई सम्पत्ति नहीं।
  3. दिखावा नकली, मूल्य असली।
  4. गरीबी निंदनीय नहीं — दिखावटी अमीरी निंदनीय।
  5. अंदरूनी समृद्धि सबसे बड़ी।

6. व्यंग्य-शैली

परसाई जी की व्यंग्य-शैली की विशेषताएँ:

  • सरल भाषा में गहरी बात
  • हास्य के साथ मार्मिकता
  • आत्म-कथन और निबंध-शैली का मिश्रण
  • आधुनिक समाज की कमज़ोरियों पर चोट
  • मूल्य-शिक्षा के साथ मनोरंजन

7. प्रासंगिकता

आज के युग में जब:

  • दिखावा बढ़ रहा है,
  • सोशल मीडिया पर 'imagery' सर्वोपरि,
  • ब्रांडेड कपड़े-जूते स्टेटस-सिंबल,

…तब प्रेमचंद के फटे जूतों का संदेश और भी प्रासंगिक है। असली मूल्य अंदर हैं, बाहर नहीं।

Key formulas & results

Everything you need to memorise, in one card. Screenshot this for revision.

लेखक
हरिशंकर परसाई (1922-1995) — हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य-लेखक
जमानी, मध्य प्रदेश के
विधा
व्यंग्य-निबंध (रूपकात्मक)
फटे जूतों के माध्यम से व्यंग्य
केंद्रीय बिंदु
प्रेमचंद की एक तस्वीर में फटे जूते — सादगी और ईमानदारी का प्रतीक
व्यंग्य का आधार
व्यंग्य का लक्ष्य
आधुनिक दिखावेबाज़ी + बाहरी चमक + नकली मूल्य
प्रेमचंद की सादगी
विशेष अवसर पर भी फटे जूते — गरीबी से शर्म नहीं
ईमानदारी
परसाई की प्रमुख रचनाएँ
'विकलांग श्रद्धा का दौर', 'सदाचार का ताबीज़', 'भूत के पाँव पीछे'
⚠️

Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

WATCH OUT
इसे केवल जूतों की कहानी समझना
यह व्यंग्य-निबंध है। जूते रूपक हैं — असली बात दिखावेबाज़ी और सादगी पर है।
WATCH OUT
व्यंग्य न पहचानना
पाठ में मज़ाक भर नहीं — गहरी सामाजिक टिप्पणी है। आधुनिक लोगों की चमक-दमक पर तीखा प्रहार।
WATCH OUT
लेखक की मृत्यु-तिथि गलत
जन्म: 22 अगस्त 1922; मृत्यु: 10 अगस्त 1995।

NCERT exercises

Every NCERT exercise from this chapter — what it covers and how many questions to expect.

मौखिक
मौखिक
फटे जूतों का अर्थ; प्रेमचंद की सादगी
3
Questions
लिखित
लिखित
व्यंग्य-विश्लेषण; प्रेमचंद का चित्रण; आधुनिक तुलना
6
Questions
भाषा
भाषा
व्यंग्य की विशेषताएँ; मुहावरे
3
Questions

Practice problems

Work through this chapter's problems as a readiness check — reveal each solution, mark yourself honestly, and get your gap report at the end.

Readiness check

Are you exam-ready for प्रेमचंद के फटे जूते (हरिशंकर परसाई)?

4 problems from this chapter. Try each one, reveal the worked solution, mark yourself honestly — get your gap report at the end.

4 questions~3 min

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • लेखक: हरिशंकर परसाई (1922-1995), हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य-लेखक
  • विधा: व्यंग्य-निबंध (रूपकात्मक)
  • केंद्रीय बिंदु: प्रेमचंद के एक चित्र में फटे जूते
  • फटे जूते = सादगी + ईमानदारी + गरीबी का स्वीकार + साहित्यकार-गरिमा
  • व्यंग्य का लक्ष्य: आधुनिक दिखावेबाज़ी और नकली मूल्य
  • परसाई की प्रमुख रचनाएँ: 'विकलांग श्रद्धा का दौर', 'सदाचार का ताबीज़'
  • संदेश: बाहरी चमक नहीं, अंदरूनी मूल्य महत्वपूर्ण
  • आधुनिक समाज में मूल्यों का ह्रास
  • प्रासंगिकता: आज के 'imagery'-केंद्रित युग में और भी ज़रूरी संदेश

Uttar Pradesh (UPMSP) marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: 5–6 अंक प्रति बोर्ड पेपर

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
बहुविकल्पीय / अति लघु11–2लेखक नाम; विधा; प्रमुख विषय
लघु उत्तरीय31फटे जूतों का प्रतीकात्मक अर्थ; प्रेमचंद की सादगी
दीर्घ उत्तरीय50–1व्यंग्य-विश्लेषण; आधुनिक समाज पर टिप्पणी
Prep strategy
  • हरिशंकर परसाई का परिचय — हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य-लेखक
  • व्यंग्य-निबंध की विशेषताएँ समझें
  • फटे जूतों का पाँच-स्तरीय प्रतीकात्मक अर्थ याद रखें
  • आधुनिक लेखकों पर परसाई का व्यंग्य
  • मूल्य-आधारित: सादगी, ईमानदारी, अंदरूनी समृद्धि

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

आधुनिक उपभोक्तावाद

ब्रांडेड कपड़े, चमकदार जूते — आज की 'imagery'-संस्कृति पर परसाई का संदेश और प्रासंगिक।

सोशल मीडिया दिखावा

Instagram, Twitter पर लोगों की 'perfect life' की झूठी इमेज — परसाई का व्यंग्य आज भी सटीक।

व्यंग्य-साहित्य

हरिशंकर परसाई हिन्दी व्यंग्य के स्तंभ। उनकी शैली आदर्श।

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

1
व्यंग्य-निबंध की पहचान कैसे करें यह समझें
2
फटे जूतों के 5 प्रतीकात्मक अर्थ अलग-अलग बिंदुओं में
3
परसाई बनाम आधुनिक लेखक की तुलना
4
मूल्य-आधारित: सादगी, ईमानदारी, अंदरूनी समृद्धि पर ज़ोर

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

STRETCH
व्यंग्य की परंपरा: कबीर → भारतेन्दु हरिश्चंद्र → हरिशंकर परसाई → शरद जोशी
STRETCH
रूपकात्मक लेखन (allegorical writing) के अन्य उदाहरण
STRETCH
उपभोक्तावाद पर अन्य लेखकों की टिप्पणी: रवींद्रनाथ टैगोर, गाँधी

Where else this chapter is tested

CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

CBSE Board Class 9उच्च
हिन्दी ओलिंपियाडउच्च — परसाई-व्यंग्य आम विषय
UGC NET हिन्दीउच्च — व्यंग्य-साहित्य अध्ययन

Questions students ask

The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

ऐसा निबंध जिसमें मज़ाक के माध्यम से समाज की कमज़ोरियों पर तीखा प्रहार किया जाता है। हास्य के साथ सामाजिक चेतना। उदाहरण: हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल।

साहित्य से कमाई कम थी। प्रेमचंद ने 'सेवासदन', 'गोदान', 'गबन' जैसी अमर रचनाएँ दीं — पर पैसे कम मिलते थे। उन्होंने पैसे के लिए साहित्य से समझौता नहीं किया।
Verified by the tuition.in editorial team
Last reviewed on 18 May 2026. Written and reviewed by subject-matter experts — read about our process.
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