परीक्षा — कक्षा 6 हिंदी (मल्हार)
"जब कोई देख नहीं रहा होता, तब का आचरण ही असली चरित्र है।" — प्रेमचंद
1. पाठ के बारे में
'परीक्षा' हिंदी के 'उपन्यास सम्राट' प्रेमचंद की एक प्रेरणादायक कहानी है। कहानी का शीर्षक अपने आप में एक पहेली है — 'परीक्षा' से आपको शायद स्कूल के एग्ज़ाम याद आएँ। पर प्रेमचंद की 'परीक्षा' कुछ और ही है: यह चरित्र की परीक्षा है, ईमानदारी की परीक्षा है — और इसकी खास बात यह है कि परीक्षार्थी को पता ही नहीं चलता कि उसकी परीक्षा हो रही है।
यह पाठ क्यों महत्वपूर्ण है
- प्रेमचंद — हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कथाकार — से परिचय
- शीर्षक का दोहरा अर्थ — साक्षात्कार (बाहरी परीक्षा) और चरित्र-परीक्षण (आंतरिक परीक्षा)
- जीवन-मूल्य: ईमानदारी और चरित्र-बल का महत्व
2. लेखक-परिचय
प्रेमचंद (1880-1936)
- वास्तविक नाम: धनपत राय श्रीवास्तव
- हिंदी और उर्दू के महानतम कथाकार — 'उपन्यास सम्राट'
- प्रमुख उपन्यास: गोदान, गबन, निर्मला, कर्मभूमि, रंगभूमि
- प्रमुख कहानियाँ: ईदगाह, पंच परमेश्वर, बड़े भाई साहब, कफ़न, पूस की रात
- विशेषता: आदर्शोन्मुख यथार्थवाद — समाज की सच्चाई + नैतिक संदेश
3. कहानी (NCERT मल्हार पाठ्यपुस्तक से)
एक युवक था — पढ़ा-लिखा, ईमानदार, पर बेरोज़गार। वह नौकरी की तलाश में भटक रहा था। एक दिन उसे पता चला कि शहर का एक बड़ा अधिकारी अपने कार्यालय के लिए एक योग्य व्यक्ति की तलाश कर रहा है। युवक साक्षात्कार देने पहुँचा।
साक्षात्कार स्थल तक पहुँचने के रास्ते में युवक के सामने तीन परिस्थितियाँ आईं:
पहली परीक्षा — रास्ते में पड़े पैसे: रास्ते में कुछ पैसे पड़े थे। कोई देख नहीं रहा था। युवक ने सोचा — "यह किसी का होगा।" उसने पैसे उठाकर पास की दुकान में दे दिए और कहा — "अगर कोई ढूँढ़ता हुआ आए तो दे देना।"
दूसरी परीक्षा — भूला हुआ बटुआ: आगे चलकर उसे एक बटुआ मिला जिसमें काफ़ी पैसे और कुछ ज़रूरी कागज़ थे। बटुए में पता भी लिखा था। युवक ने बिना एक क्षण गँवाए, बटुआ उस पते पर पहुँचा दिया।
तीसरी परीक्षा — असहाय व्यक्ति: रास्ते में एक वृद्ध व्यक्ति गिरा पड़ा था। युवक को साक्षात्कार के लिए देर हो रही थी। फिर भी वह रुका — वृद्ध को उठाया, पानी पिलाया और तब आगे बढ़ा।
जब युवक साक्षात्कार स्थल पर पहुँचा, तो अधिकारी ने मुस्कुराकर कहा — "तुम्हारी परीक्षा तो तुम रास्ते में ही पास कर आए। वे पैसे, वह बटुआ और वह वृद्ध — सब मेरी ही योजना थी। तुमने सिद्ध कर दिया कि तुम ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ हो। नौकरी तुम्हारी है।"
4. पात्र-परिचय
नायक (युवक)
- शिक्षित, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ
- जब कोई नहीं देख रहा, तब भी सही काम करता है
- तीनों परीक्षाओं में अनजाने में खरा उतरता है
अधिकारी
- दूरदर्शी नियोक्ता जो चरित्र को डिग्री से अधिक महत्व देता है
- जानबूझकर युवक के मार्ग में नैतिक परीक्षाएँ रखता है
- साक्षात्कार से पहले ही सही व्यक्ति को चुन लेता है
5. शीर्षक की सार्थकता
'परीक्षा' शब्द के तीन अर्थ इस कहानी में हैं:
| स्तर | अर्थ |
|---|---|
| शाब्दिक | नौकरी का साक्षात्कार (interview) — युवक जिसके लिए जा रहा है |
| नैतिक | चरित्र की परीक्षा — पैसे, बटुआ, वृद्ध — जिसे युवक अनजाने में पास करता है |
| दार्शनिक | जीवन स्वयं एक परीक्षा है — हर क्षण, हर चुनाव, हर निर्णय |
6. हम क्या सीखते हैं
| मूल्य | कहानी कैसे दर्शाती है |
|---|---|
| ईमानदारी | युवक पैसे और बटुआ लौटाता है — जबकि कोई देख नहीं रहा |
| चरित्र-बल | साक्षात्कार की जल्दी में भी वृद्ध की मदद करना |
| कर्तव्यनिष्ठा | हर परिस्थिति में सही काम करना — चाहे नुकसान ही क्यों न हो |
| आत्म-निरीक्षण | क्या हम भी 'जब कोई नहीं देख रहा' तब ईमानदार रहते हैं? |
7. प्रमुख शब्दार्थ
- चरित्र-बल: नैतिक मज़बूती — सही-गलत में अंतर करके सही चुनने की आंतरिक शक्ति
- कर्तव्यनिष्ठा: अपने कर्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पण और ईमानदारी
- साक्षात्कार: आमने-सामने बैठकर बातचीत — interview
- परीक्षा: यहाँ — जीवन की वह कसौटी जो आचरण और चरित्र को परखती है
8. अभ्यास
- युवक को रास्ते में कौन-कौन सी परीक्षाएँ मिलीं और उसने क्या किया?
- 'परीक्षा' शीर्षक की दोहरी सार्थकता समझाइए।
- अधिकारी ने ये गुप्त परीक्षाएँ क्यों रखीं?
- प्रेमचंद की दो प्रमुख रचनाओं के नाम लिखिए।
9. हल किए गए उदाहरण
उदाहरण: शीर्षक की सार्थकता
प्रश्न: 'परीक्षा' शीर्षक कहानी के लिए क्यों उपयुक्त है?
उत्तर: तीन स्तरों पर — (1) शाब्दिक: नायक नौकरी के साक्षात्कार (एक प्रकार की परीक्षा) के लिए जा रहा है। (2) नैतिक: रास्ते में उसके चरित्र की तीन बार परीक्षा होती है। (3) दार्शनिक: कहानी का गूढ़ संदेश — पूरा जीवन ही एक परीक्षा है जहाँ 'जब कोई नहीं देख रहा होता, तब का आचरण' ही असली उत्तर-पुस्तिका है।
10. निष्कर्ष
प्रेमचंद की 'परीक्षा' हर विद्यार्थी को एक असहज प्रश्न देती है: "जब कोई नहीं देख रहा होता, तब तुम कौन होते हो?" यह प्रश्न जीवनभर हमारा पीछा करता है — और इसका उत्तर ही हमारा चरित्र है।
