रसखान के सवैये — कक्षा 9 हिन्दी (क्षितिज भाग 1)
"मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।" — रसखान
1. पाठ-परिचय
'रसखान के सवैये' सगुण भक्ति-धारा के मुस्लिम कवि रसखान द्वारा रचित कृष्ण-भक्ति के सवैये हैं। पाठ में 4 सवैये संकलित हैं। रसखान ने ब्रजभूमि, गोकुल, और श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम का चित्रण किया है।
विशेषता
- मुस्लिम होते हुए भी कृष्ण-भक्त
- ब्रज-संस्कृति के अनन्य प्रशंसक
- सगुण-साकार ईश्वर (कृष्ण) के उपासक
2. कवि-परिचय — रसखान
जीवनवृत्त
- जन्म: सन् 1548 के आसपास, दिल्ली (कुछ विद्वान: पठान-वंश)
- मृत्यु: सन् 1628 के आसपास, गोकुल/वृंदावन
- मूल नाम: सैयद इब्राहीम
- जाति: पठान मुस्लिम (राजघराने से संबंध)
- दीक्षा: गोस्वामी विट्ठलनाथ से, पुष्टिमार्ग में
कृष्ण-भक्त बनने की कथा
- रसखान युवावस्था में सांसारिक सुखों में लिप्त थे
- एक दिन वैरागी से कृष्ण की प्रतिमा देखी
- तब से कृष्ण-भक्ति में लीन हो गए
- ब्रजभूमि में निवास करने लगे
प्रमुख रचनाएँ
- 'प्रेम-वाटिका' — काव्य-संग्रह (1614)
- 'सुजान रसखान'
- 'दानलीला'
भाषा
- ब्रजभाषा — कृष्ण-काव्य की सर्वाधिक उपयुक्त भाषा
- मधुर, सरल, भावप्रवण
विधा
- सवैया — काव्य की एक विशेष छंद-विधा
- 22-26 मात्राएँ, 4 चरण
3. चार सवैये — व्याख्या
सवैया 1 — मानुष हौं तो वही रसखानि
मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन। जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन। पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन। जौ खग हौं तो बसेरो करौं मिलि, कालिंदी कूल कदंब की डारन॥
भावार्थ: यदि मनुष्य बनूँ तो वही रसखान बनूँ जो ब्रज के गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच रहता है। यदि पशु बनूँ तो मेरा क्या बस — नंद की गायों के बीच चरता रहूँ। यदि पत्थर बनूँ तो उसी गोवर्धन पर्वत का बनूँ जिसे श्रीकृष्ण ने इंद्र के क्रोध से (पुरंदर = इंद्र) रक्षा के लिए अपने हाथ पर छत्र की तरह उठाया था। यदि पक्षी बनूँ तो यमुना के किनारे कदंब की डाली पर बसेरा करूँ।
विशेषता:
- चार जन्मों की कल्पना — मनुष्य, पशु, पत्थर, पक्षी
- सब में ब्रजभूमि और कृष्ण से जुड़ाव
- 'कालिंदी' = यमुना नदी
सवैया 2 — या लकुटी अरु कामरिया
या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं। आठहुँ सिद्धि नवौ निधि के सुख, नंद की धेनु चराइ बिसारौं। ए रसखानि जबै इन नैनन ते, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं। कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥
भावार्थ: इस लकुटी (छड़ी) और कामरिया (कंबल) पर मैं तीनों लोकों का राज भी न्योछावर करूँ। आठ सिद्धियाँ और नौ निधियों के सुख को नंद की गायों को चराने में भुलाऊँ। हे रसखान! जब इन नेत्रों से ब्रज के बन, बाग, और तालाब निहारता हूँ — तो करोड़ों कलधौत (सोने) के महलों को भी करील के कुंजों पर न्योछावर कर देता हूँ।
विशेषता:
- कृष्ण की लकुटी-कामरिया = साधारण वस्तुएँ, पर अनमोल
- भौतिक सुख का त्याग, ब्रजभूमि का प्रेम
- 'कलधौत' = सोना; 'करील' = ब्रज का प्रसिद्ध पौधा
सवैया 3 — काननि दै अँगुरी रहिहौं
काननि दै अँगुरी रहिहौं, जब काहू टेर सुनैहौं। रसखानि, गड़ी हियरे न अरी, तिनसौं तब कैसी कै आँख मिलैहौं॥ मातु पिता ब्रज के बसिहैं, हरषै रसखानि अली प्रिय जैहौं। गोकुल के बन-वासिनी कौ, सब आजु निहारि के नैन सिरैहौं॥
भावार्थ: यदि कोई पुकारेगा तो कानों पर अँगुली रखकर सुनने से इनकार कर दूँगा। हे रसखान! जिनकी छवि हृदय में बस गई है, उनसे आँख मिलाने का साहस कैसे होगा? ब्रज के माता-पिता (नंद-यशोदा) के पास खुशी से जाऊँगा। आज गोकुल के बन-वासियों (गोपी-ग्वालों) को आँख भर निहार कर ही नेत्र शांत होंगे।
विशेषता:
- गोपियों की प्रेम-व्याकुलता का चित्रण
- 'हियरे' = हृदय; 'अली' = सखी
सवैया 4 — मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं
मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी। ओढ़ि पितंबर लै लकुटी, बन गोधन ग्वारिनी संग फिरौंगी॥ भावतो वोहि मेरो रसखानि सो, तेरे कहे सब स्वांग करौंगी। या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी॥
भावार्थ: (गोपी कह रही है) — मैं अपने सिर पर मोर के पंख रखूँगी, गले में गुंज (फल/मनके) की माला पहनूँगी। पीताम्बर (पीला वस्त्र) ओढ़कर, हाथ में लकुटी लेकर, वन में गायों और ग्वालिनों के साथ घूमूँगी। मुझे जो प्रिय है — रसखान कहो, तेरे कहे अनुसार सब वेश-स्वांग करूँगी। पर इस मुरली को, जिसे मुरलीधर (कृष्ण) के होंठों ने छुआ है, अपने होंठों पर नहीं रखूँगी।
विशेषता:
- गोपी का कृष्ण-वेश धारण करना
- अंतिम पंक्ति में अद्भुत प्रेम — मुरली को छूना पाप जैसा क्योंकि वह कृष्ण के अधरों ने छुआ है
- 'अधर' = होंठ
4. प्रमुख भाव
कृष्ण के प्रति प्रेम
- रसखान कृष्ण के सर्वोत्तम भक्तों में से एक
- मुस्लिम होते हुए हिन्दू देवता की भक्ति
- सांप्रदायिक सद्भाव का अनुपम उदाहरण
ब्रजभूमि-प्रेम
- गोकुल, वृंदावन, यमुना, गोवर्धन
- भौतिक सुख से अधिक मूल्यवान
- 'करोड़ों सोने के महल' से भी बढ़कर
सगुण भक्ति
- साकार ईश्वर (कृष्ण) की उपासना
- कबीर की निर्गुण भक्ति से भिन्न
- मीरा, सूरदास, तुलसीदास जैसे सगुण भक्तों की परंपरा
गोपी-भाव
- गोपियों जैसा सच्चा प्रेम
- आत्म-समर्पण
- भक्ति का चरम रूप
5. साहित्यिक विशेषताएँ
भाषा
- ब्रजभाषा — मधुर, सरस, संगीतमय
- कृष्ण-काव्य की प्रिय भाषा
छंद
- सवैया — 22-26 मात्राएँ प्रति चरण, 4 चरण
- गेय, लयबद्ध
अलंकार
- अनुप्रास: 'काननि दै अँगुरी', 'मोरपखा सिर'
- रूपक: 'अधरान धरी अधरा न धरौंगी'
- उपमा: कृष्ण-छवि की तुलना
- अनुकरण: गोपी का कृष्ण-वेश
रस
- श्रृंगार रस — कृष्ण-गोपी प्रेम
- भक्ति रस — अनन्य कृष्ण-प्रेम
6. हिन्दू-मुस्लिम एकता
रसखान का जीवन भारतीय संस्कृति की महान विशेषता का प्रमाण है:
- एक मुस्लिम पठान कवि कृष्ण-भक्त बना
- हिन्दू देवता पर ब्रजभाषा में काव्य लिखा
- गोकुल/वृंदावन में निवास किया
- गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा ली
- आज भी कृष्ण-भक्तों में पूज्य
7. केन्द्रीय संदेश
- सच्चा प्रेम धर्म-जाति की सीमाओं से ऊपर है।
- भक्ति ही सर्वोच्च जीवन-मूल्य।
- साधारणता में सौंदर्य — लकुटी, कामरिया, कदंब, करील।
- त्याग का महत्व — संसार के सुख त्याग कर ईश्वर-प्रेम।
- सांप्रदायिक सद्भाव — रसखान का जीवन ही संदेश।
8. आज की प्रासंगिकता
- सांप्रदायिक सद्भाव: रसखान आज भी हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक।
- ब्रज-संस्कृति: मथुरा-वृंदावन आज विश्व-प्रसिद्ध तीर्थ।
- साहित्यिक धरोहर: रसखान के सवैये हिन्दी काव्य की अमूल्य निधि।
- मीडिया में: रसखान पर फिल्में, धारावाहिक, गीत।
9. प्रमुख उद्धरण
"मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।"
"या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।"
"या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी।"
10. समापन
रसखान के सवैये हिन्दी काव्य की मधुरतम रचनाएँ हैं। एक मुस्लिम पठान कवि का कृष्ण-प्रेम — भारतीय संस्कृति के 'सर्व धर्म समभाव' का अद्भुत उदाहरण। उनकी रचनाएँ आज भी हमें सिखाती हैं कि प्रेम और भक्ति की भाषा कोई धार्मिक सीमा नहीं मानती।
