रहीम के दोहे — कक्षा 6 हिंदी (मल्हार)
"रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।।" — रहीम
1. पाठ के बारे में
यह पाठ मध्यकाल के महान कवि रहीम (अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना) के चुनिंदा दोहों का संकलन है। रहीम अकबर के नवरत्नों में से एक थे — एक मुसलमान होकर ब्रज भाषा में हिंदी कविता लिखना उनके व्यक्तित्व की विशालता को दर्शाता है। उनके दोहे केवल 24 मात्राओं में जीवन का सार समेट देते हैं।
यह पाठ क्यों महत्वपूर्ण है
- दोहा छंद का परिचय — 24 मात्राएँ, 13-11 पर यति
- रहीम की विशेषता: रोज़मर्रा की वस्तुओं (पानी, सुई, तलवार, नमक) से गहन दर्शन
- भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत — मुस्लिम कवि का ब्रज भाषा में हिंदी काव्य
2. कवि-परिचय
रहीम (अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना, 1556-1627)
- अकबर के नवरत्नों में से एक — कवि, सेनापति और विद्वान
- माता-पिता: बैरम ख़ाँ और सुल्ताना बेगम
- हिंदी, फ़ारसी, अरबी, संस्कृत — अनेक भाषाओं के ज्ञाता
- प्रमुख रचनाएँ: 'रहीम सतसई', 'रहीम रत्नावली', 'शृंगार सोरठा', 'मदनाष्टक'
- विशेषता: सरल भाषा में गूढ़ जीवन-दर्शन, दैनिक जीवन की वस्तुओं से उदाहरण
3. दोहे और भावार्थ (NCERT मल्हार पाठ्यपुस्तक से)
दोहा 1: पानी का महत्व
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।।
भावार्थ: रहीम कहते हैं — पानी को सुरक्षित रखो, इसके बिना सब सूना (खाली, अर्थहीन) है। पानी के न रहने पर न मोती बन सकता है (सीप में), न मनुष्य जीवित रह सकता है, न आटा (अन्न) पैदा हो सकता है। जल ही समस्त सृष्टि और जीवन का आधार है।
दोहा 2: लघु की महत्ता
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि। जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि।।
भावार्थ: बड़ी वस्तुओं को देखकर छोटी चीज़ों को फेंक मत दो (तुच्छ मत समझो)। जहाँ सुई काम आती है, वहाँ तलवार क्या कर सकती है? हर चीज़ का अपना स्थान और महत्व है।
दोहा 3: सच्ची मित्रता
रहिमन विपति बिद्यमान, सोई जानै कौन। जो जाको राखै संग, सोई ताको लोन।।
भावार्थ: विपत्ति (मुसीबत) के समय ही पता चलता है कि सच्चा कौन है। जो मुसीबत में साथ दे, वही सच्चा मित्र है — जैसे जिसका नमक खाया, उसके प्रति वफ़ादार रहना चाहिए।
4. दोहा छंद का परिचय
- मात्राएँ: 24 (पहला चरण: 13, दूसरा: 11)
- यति (विराम): 13वीं मात्रा के बाद
- मात्रा गणना नियम: ह्रस्व स्वर = 1 मात्रा, दीर्घ स्वर = 2 मात्राएँ
- उदाहरण: "रहिमन देखि बड़ेन को" = 13 मात्राएँ, "लघु न दीजिए डारि" = 11 मात्राएँ
5. हम क्या सीखते हैं
| मूल्य | दोहा | संदेश |
|---|---|---|
| जल-संरक्षण | "पानी राखिए" | जल के बिना जीवन असंभव |
| सम्मान | "सुई-तलवार" | हर चीज़/व्यक्ति का अपना महत्व |
| सच्ची मित्रता | "विपति" | मुसीबत में साथ देने वाला ही सच्चा |
6. प्रमुख शब्दार्थ
- ऊबरै: बचना, सुरक्षित रहना
- चून: आटा — अन्न का पिसा रूप, भोजन का प्रतीक
- लघु: छोटा — आकार या सामाजिक स्थिति में
- तरवारि: तलवार — बड़ी और शक्तिशाली वस्तु का प्रतीक
- विपति: मुसीबत, संकट, कठिनाई का समय
- लोन: नमक — 'नमक खाना' मुहावरे से: वफ़ादारी का प्रतीक
- बिद्यमान: विद्यमान — मौजूद, उपस्थित
7. अभ्यास
अभ्यास 1: भावार्थ
- "रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून" — भावार्थ लिखिए।
- "जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि" — यह दोहा हमें क्या सिखाता है?
- रहीम के अनुसार सच्चे मित्र की पहचान कैसे होती है?
अभ्यास 2: छंद-अध्ययन
दोहा छंद की परिभाषा लिखिए और किसी एक दोहे में मात्राओं की गणना करके दिखाइए।
अभ्यास 3: चर्चा
"रहीम का 'पानी राखिए' वाला दोहा आज जलवायु-परिवर्तन के युग में कितना प्रासंगिक है?"
8. हल किए गए उदाहरण
उदाहरण: 'जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि' का व्यावहारिक अर्थ
- स्कूल प्रोजेक्ट में: लीडर (तलवार) और सहयोगी (सुई) — दोनों ज़रूरी
- खेल में: स्टार खिलाड़ी और टीम के बाकी सदस्य — सबका योगदान
- समाज में: बड़े पद और छोटे पद — हर काम का अपना सम्मान
9. निष्कर्ष
रहीम के दोहे 400 साल बाद भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उनकी सबसे बड़ी शक्ति है — सरलता में गहराई। पानी, सुई, तलवार, नमक — ये रोज़ की चीज़ें हैं, पर रहीम इनसे जीवन का दर्शन समझा देते हैं। यही एक महान कवि की पहचान है।
