मैया मैं नहिं माखन खायो — कक्षा 6 हिंदी (मल्हार)
"मैया मैं नहिं माखन खायो, भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहिं पठायो।" — मीराबाई
1. पाठ के बारे में
यह पद भक्ति काल की महान कवयित्री मीराबाई का अत्यंत प्रिय और प्रसिद्ध पद है। इसमें बालक कृष्ण माँ यशोदा के सामने खड़े हैं — मुँह पर मक्खन लगा है, ग्वाल-बाल शिकायत कर चुके हैं, और कृष्ण अपनी मासूमियत भरी बहानेबाज़ी से माँ को समझाने का प्रयास कर रहे हैं। यह दृश्य वात्सल्य रस का अनुपम उदाहरण है।
यह पाठ क्यों महत्वपूर्ण है
- वात्सल्य रस का पाठ्यपुस्तक में सर्वोत्तम उदाहरण
- मीराबाई — भारत की सबसे प्रसिद्ध कृष्ण-भक्त कवयित्री — से परिचय
- ब्रज भाषा के सौंदर्य का अनुभव
- बाल-मनोविज्ञान का काव्यात्मक चित्रण
2. कवयित्री-परिचय
मीराबाई (लगभग 1498-1546)
- भक्ति काल की सर्वाधिक प्रसिद्ध कवयित्री
- मेवाड़ (राजस्थान) के राजघराने में जन्म
- बचपन से ही श्रीकृष्ण को अपना आराध्य और पति मान लिया
- पति की मृत्यु के बाद राजमहल त्यागकर वृंदावन में कृष्ण-भक्ति में लीन
- प्रमुख रचनाएँ: 'पदावली', 'राग गोविंद', 'गीत गोविंद की टीका'
- भाषा: राजस्थानी, ब्रज और गुजराती का सुंदर मिश्रण
3. पद (NCERT मल्हार पाठ्यपुस्तक से)
मैया मैं नहिं माखन खायो। भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहिं पठायो।
चार पहर बंसी बट भटक्यो, साँझ परे घर आयो। मैं बालक बहियन को छोटो, छीको कैसे पायो।
तेरे मन भरम भयो जैसे, ये ग्वाल-बाल सब मेरे बैरी। जो तू जननी मन विचारौ, करौं तो कैसे चोरी।
माखन बिना रोटी सूखी, दधि बिना स्वाद न आवै। मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, सुनिए मोरी मैया।।
4. भावार्थ
पहला भाग: मासूम बहाने
- "मैया, मैंने मक्खन नहीं खाया!"
- "सुबह-सुबह तुमने ही तो मुझे गायों के पीछे मधुबन भेज दिया था।"
- "मैं तो चार पहर (आठ घंटे) बंसी बजाता वन में भटकता रहा, शाम को ही घर लौटा।"
दूसरा भाग: शिकायत का पलटवार
- "मैं तो छोटा-सा बालक हूँ — इतनी ऊँचाई पर टँगा छीका (मक्खन रखने की टोकरी) मैं कैसे पा सकता हूँ?"
- "तेरे मन में भ्रम है मैया — और ये सब ग्वाल-बाल मुझसे बैर रखते हैं, इसीलिए झूठी शिकायत करते हैं।"
अंतिम भाग: मीरा की भक्ति
- अंतिम पंक्ति में मीराबाई कृष्ण को अपना 'प्रभु गिरिधर नागर' कहकर संबोधित करती हैं — यह कवयित्री की अपनी भक्ति-भावना है
5. वात्सल्य रस
- स्थायी भाव: वत्सलता (स्नेह, ममता)
- आश्रय: माँ यशोदा (जिसके मन में स्नेह है)
- आलंबन: बालक कृष्ण (जिसके प्रति स्नेह है)
- प्रभाव: पाठक के मन में ममता और हास्य का संचार
6. हम क्या सीखते हैं
| मूल्य | पद कैसे दर्शाता है |
|---|---|
| मातृ-प्रेम | यशोदा जानती हैं कि कृष्ण झूठ बोल रहे हैं, फिर भी केवल प्रेम है |
| बाल-मनोविज्ञान | बच्चे जब पकड़े जाते हैं तो बहाने बनाते हैं — यह स्वाभाविक है |
| भक्ति का आनंद | मीरा के लिए कृष्ण की बाल-लीलाएँ भक्ति का विषय हैं |
7. प्रमुख शब्दार्थ (ब्रज → हिंदी)
- माखन: मक्खन
- भोर: सुबह
- गैयन: गायें
- मोहिं: मुझे
- पठायो: भेजा
- बंसी बट: बाँसुरी बजाते हुए
- साँझ: शाम
- बहियन: बाँहों/भुजाओं
- छीको: मक्खन रखने की ऊँची टँगी टोकरी
- भरम: भ्रम — गलतफहमी
- बैरी: दुश्मन, विरोधी
- दधि: दही
- गिरिधर नागर: गोवर्धन पर्वत धारण करने वाले श्रीकृष्ण
8. अभ्यास
- बालक कृष्ण ने माँ यशोदा के सामने क्या-क्या तर्क दिए?
- इस पद में कौन-सा रस प्रमुख है और क्यों?
- मीराबाई के जीवन की दो विशेष बातें लिखिए।
- ब्रज भाषा के पाँच शब्द और उनके हिंदी अर्थ लिखिए।
9. हल किए गए उदाहरण
उदाहरण: वात्सल्य रस की पहचान
प्रश्न: इस पद में वात्सल्य रस है — कैसे?
उत्तर: (1) स्थायी भाव 'वत्सलता' (ममता) है — यशोदा का कृष्ण के प्रति स्नेह। (2) यशोदा जानती हैं कि कृष्ण ने मक्खन चुराया है, पर उनके मन में क्रोध नहीं — केवल प्यार है। (3) कृष्ण की बहानेबाज़ी में बाल-सुलभ मासूमियत है जो पाठक के मन में ममता जगाती है। (4) अंतिम पंक्ति में मीरा की भक्ति भी वात्सल्य का ही एक रूप है।
10. निष्कर्ष
मीराबाई का यह पद सदियों से हर पीढ़ी के चेहरे पर मुस्कान लाता रहा है। बालक कृष्ण की मासूम बहानेबाज़ी, माँ यशोदा का मौन प्रेम, और मीरा की भक्ति — तीनों मिलकर इस पद को अमर बनाते हैं। यह पद सिखाता है कि भक्ति केवल गंभीरता नहीं — प्रेम, हास्य और आनंद भी है।
