By the end of this chapter you'll be able to…

  • 1कबीरदास का जीवन और काव्य-दर्शन समझना
  • 2साखी (दोहा) और सबद (पद) में अंतर
  • 3निर्गुण भक्ति-धारा का परिचय
  • 4कबीर की सधुक्कड़ी भाषा
  • 5उलटवाँसी और रूपकात्मक शैली
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Why this chapter matters
कबीरदास निर्गुण भक्ति-धारा के सर्वोच्च संत-कवि हैं। उनकी साखियाँ-सबद हिन्दी काव्य की मूल्यवान विरासत — सामाजिक सुधार, हिन्दू-मुस्लिम एकता, आडंबर-विरोध के सशक्त उदाहरण।

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साखियाँ एवं सबद — कक्षा 9 हिन्दी (क्षितिज भाग 1)

"साधो, देखो जग बौराना। साँची कही तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना।" — कबीरदास

1. पाठ-परिचय

'साखियाँ एवं सबद' संत कवि कबीरदास की चुनिंदा रचनाएँ हैं। यह NCERT कक्षा 9 हिन्दी क्षितिज भाग 1 के काव्य खंड का पहला पाठ है। इसमें:

  • 3 साखियाँ (दोहे)
  • 2 सबद (पद)

का संकलन है। कबीर की वाणी ज्ञान, भक्ति, सामाजिक सुधार, हिन्दू-मुस्लिम एकता का संदेश देती है।

विधाएँ

  • साखी = साक्षी / दोहा। ज्ञान का साक्षात रूप।
  • सबद = पद। संत-वाणी का पद्य रूप।
  • दोनों ही मौखिक परंपरा से चलकर लिखित में संकलित हुए।

2. कवि-परिचय — कबीरदास

जीवनवृत्त

  • जन्म: सन् 1398 के आसपास, काशी (वाराणसी)
  • मृत्यु: सन् 1518 के आसपास, मगहर (उत्तर प्रदेश)
  • गुरु: स्वामी रामानंद (वैष्णव संत)
  • माता-पिता: नीरू और नीमा (मुस्लिम जुलाहा दंपत्ति) ने पालन-पोषण किया
  • व्यवसाय: जुलाहा (बुनकर)

विशेषताएँ

  • निरक्षर: कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे — पर उनकी वाणी असाधारण
  • निर्गुण भक्ति-धारा: निर्गुण-निराकार ईश्वर के उपासक
  • समाज-सुधारक: जाति-भेद, मूर्ति-पूजा, कर्मकांड, धार्मिक पाखंड के विरोधी
  • हिन्दू-मुस्लिम एकता: 'राम' और 'रहीम' दोनों एक

रचनाएँ (शिष्यों ने संकलित कीं)

  • बीजक — साखी, सबद, रमैनी का संग्रह
  • कबीर ग्रंथावली
  • रमैनी, सबद, साखी

भाषा

  • सधुक्कड़ी = कई भाषाओं का मिश्रण: अवधी, ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली
  • सरल, मार्मिक, धारदार

3. साखियाँ — दोहे और भावार्थ

साखी 1 — मानसरोवर का प्रेम

मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं। मुक्ताफल मुक्ता चुगैं, अब उड़ि अनत न जाहिं॥

भावार्थ: मानसरोवर के स्वच्छ जल में हंस क्रीड़ा कर रहे हैं। वे मोती चुग रहे हैं। अब वे यहाँ से उड़कर अन्यत्र नहीं जाते।

व्याख्या:

  • मानसरोवर = सत्संग का प्रतीक / ईश्वरीय ज्ञान
  • हंस = साधक / भक्त
  • मुक्ताफल = सत्य का मोती / ज्ञान
  • संदेश: एक बार जो भक्त ईश्वरीय प्रेम का अनुभव कर ले, वह संसार के अन्य आकर्षणों में नहीं बहता।

साखी 2 — भक्त की पहचान

प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरूँ, प्रेमी मिलै न कोइ। प्रेमी कौं प्रेमी मिलै, सब विष अमृत होइ॥

भावार्थ: मैं प्रेमी को ढूँढ़ता फिरता हूँ, पर सच्चा प्रेमी मिलता नहीं। यदि एक प्रेमी को दूसरा प्रेमी मिल जाए, तो सब विष अमृत बन जाता है।

व्याख्या:

  • प्रेमी = सच्चा भक्त, परम-प्रेम का अनुभव करने वाला
  • विष-अमृत = सांसारिक दुख-सुख / निराशा-आशा
  • संदेश: सच्चे भक्त और सच्चे भक्त का मिलन दुर्लभ है, पर जब हो तो जीवन का सब दुख आनंद में बदल जाता है।

साखी 3 — हस्ती चढ़िये ज्ञान कौ

हस्ती चढ़िये ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि। स्वान रूप संसार है, भूँकन दे झख मारि॥

भावार्थ: ज्ञान के हाथी पर सहज (आत्मा) का गद्दा बिछाकर बैठो। यह संसार कुत्ते (स्वान) के समान है — उसे भौंकने दो (नकारात्मक बातें कहने दो), तुम अपना काम करते रहो।

व्याख्या:

  • हस्ती = ज्ञान का प्रतीक (हाथी जैसा बलवान)
  • दुलीचा = गद्दा (सहज स्वभाव)
  • स्वान = कुत्ता (आलोचक, ईर्ष्यालु लोग)
  • संदेश: ज्ञान-मार्ग पर चलने वालों को आलोचना से विचलित नहीं होना चाहिए। आत्म-विश्वास के साथ चलो।

4. सबद (पद) — पद और भावार्थ

सबद 1 — मोको कहाँ ढूँढ़े बंदे

मोको कहाँ ढूँढ़े बंदे, मैं तो तेरे पास में। ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकांत निवास में। ना मंदिर में ना मसजिद में, ना काबे कैलास में। ना मैं जप में ना मैं तप में, ना मैं बरत उपास में। ना मैं किरिया करम में रहता, ना ही जोग सन्यास में। नहिं प्राण में नहिं पिंड में, ना ब्रह्मांड आकास में। ना मैं प्रकृति प्रवार गुफा में, नहिं स्वासों की स्वास में। खोजी होय तुरंते मिलिहौं, इक पल की तलास में। कहैं कबीर सुनो भई साधो, मैं तो हूँ विस्वास में॥

भावार्थ: हे बंदे (साधक)! तू मुझे कहाँ ढूँढ़ रहा है? मैं तो तेरे पास ही हूँ। मैं तीर्थ, मूर्ति, मंदिर, मस्जिद, काबा, कैलास में नहीं। न मैं जप-तप, व्रत-उपवास, कर्मकांड में हूँ। न योग-संन्यास में, न प्राण-पिंड में, न आकाश में। न प्रकृति की गुफा में, न श्वासों में। यदि सच्चे मन से खोजोगे तो तुरंत मिल जाऊँगा — एक पल की तलाश में। कबीर कहते हैं — हे साधो! मैं तो विश्वास में हूँ।

मुख्य संदेश:

  • ईश्वर बाहरी कर्मकांड (तीर्थ, मूर्ति, मंदिर, मस्जिद) में नहीं
  • ईश्वर हमारे विश्वास में, हमारे भीतर है
  • आत्म-खोज के द्वारा ईश्वर मिलते हैं

सबद 2 — संतों, भाई आई ग्यान की आँधी

संतों, भाई आई ग्यान की आँधी रे। भ्रम की टाटी सबै उड़ानी, माया रहै न बाँधी। हिति चित्त की द्वै थूनी गिरानी, मोह बलिंडा तूटा। त्रिस्ना छानि परी घर ऊपरि, कुबुधि का भाँडा फूटा। जोग जुगति करि संतौं बाँधी, निरचू चुवै न पानी। कूड़ कपट काया का निकस्या, हरि की गति जब जानी। आँधी पीछै जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भीना। कहै कबीर भान उगा हरषि, अनिगि कथे मन मानी॥

भावार्थ: हे संतों! ज्ञान की आँधी आ गई है। भ्रम की झोपड़ी का छप्पर उड़ गया, माया का बंधन टूट गया। अहंकार और चित्त की दोनों खंभे गिर गए, मोह का तख्ता टूट गया। तृष्णा का छप्पर घर के ऊपर से गिरा, कुबुद्धि का बर्तन फूट गया। योग की युक्ति से संतों ने ज्ञान-घर बाँध लिया — अब बूँद भर भी पानी नहीं रिसता। शरीर की कूड़-कपट निकल गई, हरि की गति समझ ली। आँधी के बाद जो प्रेम-वर्षा हुई, हरि-भक्त उसमें भीग गए। कबीर कहते हैं — ज्ञान का सूर्य उग गया, मन प्रसन्न है।

मुख्य संदेश:

  • सच्चे ज्ञान की आँधी अज्ञानता के सारे आवरण उड़ा देती है
  • भ्रम, माया, अहंकार, मोह सब समाप्त हो जाते हैं
  • ज्ञान के बाद प्रेम-भक्ति की वर्षा होती है
  • आत्म-ज्ञान ही सर्वोच्च आनंद का स्रोत है

5. केन्द्रीय भाव

कबीर के मुख्य विचार

  1. निर्गुण भक्ति — निराकार ईश्वर की भक्ति
  2. आंतरिक खोज — ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है
  3. समाज-सुधार — मूर्ति-पूजा, कर्मकांड, बाह्य आडंबर के विरोध
  4. हिन्दू-मुस्लिम एकता — मंदिर-मस्जिद, काबा-कैलास सब एक
  5. गुरु का महत्व — सच्चे गुरु से ही ज्ञान मिलता है
  6. आत्म-विश्वास — संसार की आलोचना से न डरें

6. साहित्यिक विशेषताएँ

भाषा

  • सधुक्कड़ी = कई भाषाओं का मिश्रण
  • अवधी, ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली का सम्मिश्रण
  • सरल, सहज, मार्मिक

शैली

  • बेबाक = सीधी, स्पष्ट बात
  • उलटवाँसी = विरोधाभासी कथन (जैसे 'विष अमृत होइ')
  • रूपकात्मक = प्रतीकात्मक (हस्ती, स्वान, हंस)

अलंकार

  • रूपक: 'मानसरोवर' = सत्संग, 'हंस' = साधक
  • उपमा: 'स्वान रूप संसार है'
  • विरोधाभास: 'विष अमृत होइ'
  • अनुप्रास: 'प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरूँ, प्रेमी मिलै न कोइ'

छंद

  • साखी = दोहा (13-11 मात्राएँ)
  • सबद = गेय पद, संगीतमय

7. कबीर का दर्शन

निर्गुण ब्रह्म

  • ईश्वर निराकार, अदृश्य, सर्वव्यापी
  • 'मैं तो हूँ विस्वास में' — विश्वास में निवास

सद्गुरु का महत्व

  • कबीर के गुरु थे स्वामी रामानंद
  • "गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय। बलिहारी गुरु आपने, गोबिंद दियो बताय।"

सामाजिक संदेश

  • जाति-भेद का विरोध
  • स्त्री-समानता का समर्थन
  • कर्मकांड, मूर्ति-पूजा, तीर्थयात्रा का खंडन

8. कबीर की प्रासंगिकता आज

  • सांप्रदायिक सद्भाव: हिन्दू-मुस्लिम एकता का संदेश
  • धार्मिक पाखंड: आज भी प्रासंगिक
  • आंतरिक खोज: भौतिकवाद से ऊपर उठकर आत्म-ज्ञान
  • सामाजिक न्याय: जाति-भेद के विरुद्ध संघर्ष
  • मनोवैज्ञानिक शांति: 'विश्वास' में ईश्वर — भीतर शांति

9. प्रमुख उद्धरण

"मोको कहाँ ढूँढ़े बंदे, मैं तो तेरे पास में।"

"हस्ती चढ़िये ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि। स्वान रूप संसार है, भूँकन दे झख मारि।"

"प्रेमी कौं प्रेमी मिलै, सब विष अमृत होइ।"

"गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय।"


10. समापन

कबीरदास का काव्य हिन्दी साहित्य की निधि है। उनकी साखियाँ और सबद आज भी उतने ही सजीव और प्रासंगिक हैं। उनकी सरल भाषा में गूढ़ दर्शन है। आडंबर-विरोध, समाज-सुधार, और आंतरिक खोज का संदेश सदैव अनमोल। कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए ये रचनाएँ — साहित्य, दर्शन, और जीवन-मूल्यों का त्रिवेणी संगम हैं।

Key formulas & results

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कवि
कबीरदास (1398-1518) — संत-कवि, निर्गुण भक्ति-धारा
जुलाहा परिवार में पले
गुरु
स्वामी रामानंद (वैष्णव संत)
मूल भाषा
सधुक्कड़ी — अवधी, ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली का सम्मिश्रण
प्रमुख ग्रंथ
बीजक (साखी + सबद + रमैनी)
शिष्यों ने संकलित किया
विधा
साखी = दोहा (13+11 मात्राएँ); सबद = गेय पद
मौखिक परंपरा से लिखित में आए
केन्द्रीय भाव
निर्गुण ब्रह्म + आंतरिक खोज + समाज-सुधार + हिन्दू-मुस्लिम एकता
प्रसिद्ध उक्ति
'मोको कहाँ ढूँढ़े बंदे, मैं तो तेरे पास में'
ईश्वर भीतर है
उलटवाँसी
विरोधाभासी कथन; जैसे 'विष अमृत होइ'
कबीर की विशिष्ट शैली
⚠️

Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

WATCH OUT
साखी और सबद को एक मानना
साखी = दोहा (2 पंक्ति, 13+11 मात्राएँ)। सबद = पद (कई पंक्तियाँ, गेय)। दोनों भिन्न विधाएँ।
WATCH OUT
कबीर को सगुण-भक्त मानना
कबीर निर्गुण-भक्ति-धारा के कवि। ईश्वर निराकार, निर्गुण। मूर्ति-पूजा के विरोधी।
WATCH OUT
'सधुक्कड़ी' का अर्थ भूलना
सधुक्कड़ी = साधु-लोगों की भाषा। कई भाषाओं का मिश्रण — अवधी, ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली।
WATCH OUT
'मानसरोवर' का अर्थ गलत
साखी में 'मानसरोवर' = सत्संग का प्रतीक / ईश्वरीय ज्ञान। 'हंस' = साधक / भक्त। रूपक है।

NCERT exercises

Every NCERT exercise from this chapter — what it covers and how many questions to expect.

मौखिक
मौखिक
कवि-परिचय, विधा, भाषा
4
Questions
लिखित
लिखित
साखी-सबद का भावार्थ, संदेश
7
Questions
भाषा
भाषा
मुहावरे, उलटवाँसी, अलंकार
4
Questions

Practice problems

Work through this chapter's problems as a readiness check — reveal each solution, mark yourself honestly, and get your gap report at the end.

Readiness check

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5 problems from this chapter. Try each one, reveal the worked solution, mark yourself honestly — get your gap report at the end.

5 questions~4 min

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • कवि: कबीरदास (1398-1518), काशी में जन्म, मगहर में मृत्यु
  • गुरु: स्वामी रामानंद
  • विधा: साखी (दोहा) + सबद (पद)
  • भाषा: सधुक्कड़ी (अवधी, ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली)
  • धारा: निर्गुण भक्ति
  • मुख्य ग्रंथ: बीजक (शिष्यों द्वारा संकलित)
  • साखी 1: मानसरोवर/हंस — सत्संग का प्रभाव
  • साखी 2: प्रेमी/विष-अमृत — सच्चे प्रेमी का मिलन दुर्लभ
  • साखी 3: हस्ती/स्वान — आलोचना से विचलित न हो
  • सबद 1: 'मोको कहाँ ढूँढ़े बंदे' — ईश्वर भीतर है
  • सबद 2: 'ज्ञान की आँधी' — अज्ञान के आवरण उड़ते हैं
  • अलंकार: रूपक, उपमा, विरोधाभास (उलटवाँसी), अनुप्रास
  • केंद्रीय संदेश: आडंबर-विरोध, हिन्दू-मुस्लिम एकता, आंतरिक खोज

IB marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: 5–7 अंक प्रति बोर्ड पेपर

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
बहुविकल्पीय / अति लघु11–2कवि; गुरु; विधा; भाषा
व्याख्या-आधारित2–31साखी/सबद की पंक्ति की व्याख्या
लघु उत्तरीय31अलंकार; संदेश; भाव
दीर्घ उत्तरीय50–1कबीर का दर्शन; सामाजिक संदेश; प्रासंगिकता
Prep strategy
  • कबीर का जीवन — 1398-1518, काशी, जुलाहा परिवार, गुरु रामानंद
  • साखी = दोहा; सबद = गेय पद — अंतर स्पष्ट
  • तीन साखियों का भावार्थ: मानसरोवर/हंस, प्रेमी/विष-अमृत, हस्ती/स्वान
  • दो सबदों का सार: 'मोको कहाँ ढूँढ़े' और 'ग्यान की आँधी'
  • सधुक्कड़ी, उलटवाँसी, रूपक — कबीर की विशिष्ट शैली
  • निर्गुण ब्रह्म, हिन्दू-मुस्लिम एकता, समाज-सुधार के संदेश

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

कबीर पंथ

कबीर के अनुयायियों का संप्रदाय — आज भी सक्रिय, MP-UP-राजस्थान में लाखों अनुयायी।

सांप्रदायिक सद्भाव

आज भी कबीर के दोहे हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए quoted।

Kabir Project

Shabnam Virmani द्वारा निर्मित — कबीर के संगीत/लोक-गायन का documentation।

Prahlad Tipanya, Mukhtiyar Ali

आज के प्रसिद्ध कबीर-गायक — मालवी-राजस्थानी लोक-शैली में कबीर के पद।

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

1
कबीर का जीवन-परिचय 2-3 वाक्य में दें
2
साखी और सबद की विधा-अंतर स्पष्ट करें
3
व्याख्या-प्रश्न में पहले शाब्दिक अर्थ, फिर भावार्थ, फिर विशेष-संदेश
4
अलंकार (रूपक/उलटवाँसी) पहचानें और उदाहरण दें
5
सामाजिक संदेश पर ज़ोर — हिन्दू-मुस्लिम एकता, समाज-सुधार
6
प्रासंगिकता पर 1-2 वाक्य — आज भी कबीर क्यों relevant

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

STRETCH
निर्गुण-सगुण भक्ति-धारा का अंतर
STRETCH
कबीर बनाम तुलसीदास: निर्गुण बनाम सगुण
STRETCH
कबीर की उलटवाँसी — विरोधाभासी कथन का दार्शनिक उद्देश्य
STRETCH
बीजक की रचना-संरचना (साखी, सबद, रमैनी)
STRETCH
कबीर के समकालीन संत: रैदास, सेन, धना, पीपा
STRETCH
Hazari Prasad Dwivedi की पुस्तक 'कबीर' का अध्ययन

Where else this chapter is tested

CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

CBSE Board Class 9उच्च
हिन्दी ओलिंपियाडउच्च
UGC NET हिन्दीअति-उच्च — कबीर विशेष विषय
CTET हिन्दीमध्यम

Questions students ask

The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे — पर उनकी वाणी मौखिक थी। शिष्यों ने सुनकर लिखा। 'बीजक' का संकलन उनके शिष्य धर्मदास ने किया। मौखिक काव्य-परंपरा भारत में बहुत समृद्ध है।

लोक-विश्वास था कि काशी में मरने पर मोक्ष मिलता है और मगहर में नरक। कबीर इस अंध-विश्वास को तोड़ने मगहर गए और वहीं देह त्यागी — संदेश: मोक्ष स्थान से नहीं, कर्म से मिलता है।

सधुक्कड़ी = साधु-लोगों की भाषा। इसमें कई बोलियाँ मिली होती हैं — अवधी, ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली। कबीर ने इस मिश्रित भाषा का प्रयोग किया जिससे उनकी रचनाएँ हर वर्ग तक पहुँच सकें।
Verified by the tuition.in editorial team
Last reviewed on 19 May 2026. Written and reviewed by subject-matter experts — read about our process.
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